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ऑटिज्म के पूरक उपचार के लिए उडुपी के आयुर्वेद संस्थान का रुख कर रहे लोग

उडुपी/नयी दिल्ली. तेजस के माता-पिता ने जब उसके देर से बोलने, ठीक से आंख न मिला पाने और लोगों के बीच कम घुलने-मिलने सरीखी जैसी बातों पर गौर किया किया और उसे चिकित्सक के पास ले गए तो पता चला कि उनका तीन वर्षीय बच्चा 'ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर' (एएसडी) नामक रोग से पीड़ित है। इसके बाद बेंगलुरु निवासी तेजस के माता-पिता ने उसके लिए 'वाक् एवं कर्मोपचार' (स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी) शुरू की। लेकिन तेजस के माता-पिता ने सोचा कि जारी इलाज के साथ आयुर्वेद चिकित्सा भी उनके बच्चे के लिए लाभकारी साबित हो सकती है और इसी उम्मीद में वे उडुपी के एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय पहुंचे। इसके बाद अगले ढाई सालों में तेजस धीरे-धीरे अपने तरीके से अपनी बात कहने लगा और संस्थान में 'बालपंचकर्म' चिकित्सा के दौरान श्लोक भी पढ़ने लगा। माता-पिता के लिए तेजस की हर छोटी-मोटी कामयाबी उनके लिए जश्न का वजह बन गई। तेजस के परिवार की तरह ही, पूरे भारत में ऐसे माता-पिता की संख्या बढ़ रही है जो अपने बच्चों की जिंदगी को बेहतर बनाने की उम्मीद में वैज्ञानिक रूप से साबित चिकित्सा पद्धित के साथ-साथ आयुर्वेद का भी सहारा ले रहे हैं। समुद्र के किनारे बसी मंदिर की नगरी उडुपी में स्थित एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय, ऑटिज्म और तंत्रिका-विकास संबंधी व्याधि से पीड़ित बच्चों के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सा का सहारा लेने वाले परिवारों के लिए एक पसंदीदा केंद्र बन गया है। एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. ममता के.वी. ने कहा कि मरीजों की बढ़ती संख्या इस बात को दिखाती है कि लोगों में यह जागरूकता बढ़ रही है कि आयुर्वेद पारंपरिक चिकित्सा की जगह लेने के बजाय उसके साथ मिलकर काम कर सकता है। एएसडी एक तंत्रिका-विकास संबंधी विकार है, जिसका बच्चों की बातचीत, सामाजिक मेलजोल और उनके व्यवहार पर असर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में हर 100 में से लगभग एक बच्चे को ऑटिज्म होने का अनुमान है, हालांकि अलग-अलग देशों में इसकी दर अलग-अलग हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटिज्म वाले हर बच्चे की अपनी खूबियां और चुनौतियां होती हैं, इसलिए शुरुआती पहचान और हर बच्चे के हिसाब से इलाज करना सबसे प्रमुख चीज है। एसडीएम आयुर्वेद महाविद्यालय के बालरोग विभाग (आयुर्वेद पीडियाट्रिक्स) के प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. पृथ्वीराज पुराणिक ने कहा कि आयुर्वेद में 'ऑटिज्म' को केवल एक बीमारी नहीं माना जाता है। पुराणिक ने बताया, ''इसके बजाय, इलाज की योजना बनाने से पहले डॉक्टर शारीरिक बनावट, पाचन, सोने के तरीके, व्यवहार और विकास के क्रम को ध्यान में रखते हुए हर बच्चे की अलग-अलग जांच करते हैं।'' बालरोग विभाग (आयुर्वेद पीडियाट्रिक्स) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. चित्रलेखा ने कहा कि बीमारी को पूरी तरह ठीक करने का दावा करने के बजाय बच्चे की समग्र कार्यक्षमता को बेहतर बनाने पर ज़ोर दिया जाता है। उन्होंने कहा, ''हमारा मकसद बच्चे की विकास की क्षमता को बढ़ावा देना है। हर बच्चे की अलग-अलग ज़रूरतों के आधार पर, इलाज में खान-पान में बदलाव, दवाएं, ज़रूरत पड़ने पर पंचकर्म प्रक्रियाएं, जीवनशैली में बदलाव और माता-पिता की काउंसलिंग शामिल हो सकती है।'' उन्होंने कहा, ''हमारा लक्ष्य बच्चे की नींद, पाचन, ध्यान लगाने की क्षमता, भावनाओं पर नियंत्रण और जीवन की समग्र गुणवत्ता को बेहतर बनाना है, जबकि बच्चे का पारंपरिक इलाज भी जारी रहता है।'' आयुर्वेद से जुड़ी जन्म से पहले की पारंपरिक प्रक्रिया 'गर्भ संस्कार' का जिक्र करते हुए डॉ. ममता ने कहा कि गर्भधारण से पहले, अगर दंपति अच्छी तरह से योजना बनाएं और 'गर्भाधान संस्कार' की रस्म निभाएं, तो वे इस तरह की बीमारियों की आशंका को दूर कर सकते हैं। उन्होंने कहा, ''गर्भ संस्कार के जरिए जन्म लेने वाले बच्चे अधिक सक्रिय होते हैं, उनकी प्रतिरक्षा क्षमता अच्छी होती है और उनका तंत्रिकातंत्र संबंधी विकास भी बेहतर होता है। आयुर्वेद मां और बच्चे, दोनों के समग्र आरोग्य को बढ़ावा देने के मकसद से, गर्भावस्था से पहले और उसके दौरान मां की सेहत, संतुलित पोषण और स्वस्थ जीवनशैली पर भी काफी जोर देता है।''

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