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29 जुलाई पुण्यतिथि पर विशेष
आलेख - प्रशांत शर्माहिंदी फिल्मों में जब भी अच्छे कॉमेडियन की बात चलती है तो उनमें जॉनी वॉकर का नाम प्रमुखता से शामिल किया जाता है। अपनी फिल्मों के जरिए वे आज भी हमें हंसाते और गुदगुदाते रहते हैं।जॉनी वॉकर वास्तव में हिंदी फिल्म जगत के हास्य सम्राट थे। जॉनी को फिल्म में लाने का श्रेय बलराज साहनी को जाता है। जब वे फिल्म बाजी की कहानी लिख रहे थे, तब एक ऐसे हास्य कलाकार की जरूरत महसूस हुई, जो एक विशेष चरित्र में पटकथा के साथ सही मायनों में न्याय कर सके। एक दिन उनकी नजर एक बस कंडक्टर बदरुद्दीन पर पड़ी, जो यात्रियों को हंसाने में लगा था। बस फिर क्या था, वे उसे लेकर गुरु दत्त के पास पहुंचे। गुरु दत्त ने उन्हें तुरंत अपनी फिल्म के लिए फाइनल कर लिया। बाजी फिल्म से ही गुरुदत्त और जॉनी वॉकर की जोड़ी हिट हुई थी और दोनों ने इस दोस्ती को आखिरी दम तक बनाए रखा। जॉनी कहा करते थे कि अगर गुरु दत्त नहीं होते, तो मैं बस कंडक्टर ही रह जाता। जॉनी वाकर के आदर्श थे चार्ली चैपलिन और नूर मोहम्मद।जॉनी वॉकर का जन्म 1925 में इंदौर में हुआ था और उनका वास्तविक पूरा नाम बदरुद्दीन काजी था। वे 1942 में इंदौर से मुंबई आ गए थे और बतौर बस कंडक्टर काम करने लगे। हिंदी फिल्म उद्योग में बाजी फिल्म से स्थापित होने के बाद उन्होंने मधुमती, प्यासा, नया दौर, सीआईडी और मेरे महबूब में अपने अभिनय का लोहा मनवाया था। उन्हें फिल्म शिकार के लिए 1968 में फिल्मफेयर का बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड भी मिला था। उनकी अभिनय क्षमता के सभी कायल थे और उस समय के निर्माताओं और निर्देशकों में उन्हें अपनी फिल्म में लेने की जैसे होड़ मची रहती थी। जॉनी वाकर की सफलता और लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें फिल्म में लेने के लिए विशेष तौर पर उन पर फिल्माए जाने वाले गीत बनाए जाते थे। उन पर फिल्माए गए वे दो गीत- सर जो मेरा चकराए या दिल डूबा जाए और ये है मुंबई मेरी जान आज भी लोगों की जुबान पर है। लेकिन उनका सबसे पसंदीदा गाना था- जीना यहां मरना यहां.. जो राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर, का था।कुछ बातें कुछ यादेंजॉनी वॉकर फिल्मों में काम करते-करते एकाएक फिल्मों से दूर हो गए थे, मगर लंबे अरसे बाद उन्हें कमल हसन निर्देशित फिल्म चाची-420 में देखा गया था। फिल्म के प्रदर्शन के पहले उन्होंने एक पत्रिका को इंटरव्यू दिया था, पेश है उसके कुछ अंश-उनके मुताबिक मैं अपने समय में सभी फिल्में साइन नहीं करता था, बल्कि जिस भूमिका में मुझे अपनापन दिखता था, मैं उसे झट से साइन कर लेता था। हमारे समय में फिल्मों में काम करना आसान नहीं था। माहौल आज की तरह नहीं था, बल्कि बहुत मेहनत करनी होती थी। यदि आपका रोल सिर्फ दो दिनों के लिए है, तो पांच दिनों के लिए साइन किया जाता था और पांचों दिन मैकअप करके सेट पर बैठे रहना होता था। फिल्मों से एकाएक दूर होने के बारे में उन्होंने बताया- एक तो फिल्मों में अश्लीलता आ गई है। दूसरा मैं अपने परिवार से दूर होता जा रहा था। एक बार तो हद हो गई जब मैं शूटिंग से लौटा तो बच्चों ने पहचानने से इनकार कर दिया। तब अहसास हुआ कि फिल्मों ने मुझे परिवार से दूर कर दिया है। फिर क्या था फिल्मों से मैंने अपना किट पैक किया और फिल्मों को टाटा-बाय-बाय कह कर घर में सुकून की जिंदगी जीने का फैसला किया। फिल्मों के चक्कर में मैंने अपने बच्चों को बड़े होते नहीं देखा, मगर अब अपने नाती-पोती को बड़ा होते देखने का मोह नहीं छोड़ सकता। उन्होंने बताया कि युवावस्था में पैसा कमाने के अलावा उनका और कोई सपना नहीं था। जॉनी वाकर के अनुसार फिल्मों में मसखरे और चालबाज जैसे काम करते-करते लोग उन्हें चाचा 420 कहने लगे थे। उनके मुताबिक उन्हें दोस्तों के बीच हंसी मजाक पसंद था और फुर्सत के समय में बीते दिनों को याद करना उनका शौक था। - पुण्यतिथि 28 जुलाई पर विशेषआलेख -प्रशांत शर्मा50- 60 के दशक में हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में बला की खूबसूरत एक अभिनेत्री हुआ करती थी, जिनका नाम था लीला नायडू। एक ऐसी एक्ट्रेस जिनके चेहरे से लोगों की नजरें नहीं हटती थीं तभी वेे 10 साल तक दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं की लिस्ट में शामिल रहीं। पूर्व मिस इंडिया और फिल्म अनुराधा और द हाउस होल्डर जैसी फिल्मों में सशक्त अभिनय करने वाली अदाकारा लीला नायडू का निधन 28 जुलाई 2009 हुआ था।लीला नायडू वर्ष 1954 में फेमिना मिस इंडिया का खिताब जीतकर चर्चा में आई। उस वक्त उनकी उम्र मात्र 14 की थी। उसी दौरान वोग मैग्जीन की दुनियाभर में 10 सबसे ज्यादा खूबसूरत महिलाओं की लिस्ट में भी लीला नायडू का नाम शामिल किया गया। इस लिस्ट में रानी गायत्री देवी भी शामिल थीं।उन्होंने काफी कम फिल्में की , लेकिन अपने अभिनय और खूबसूरती से सबको प्रभावित किया। राजकपूर तो उन्हें अपनी फिल्म में लेने के लिए बार- बार कोशिश करते रहे, लेकिन उन्हें 3 बार नाकामी हाथ लगी।कहा जाता है कि राजकपूर लीला नायडू की खूबसूरती के कायल हो गए थे और उन्हें लेकर फिल्म बनाने वाले थे। फिल्म की कहानी मुल्कराज आनंद ने लिखी। जब लीला स्क्रीन टेस्ट के लिए पहुंची को उन्हें पता चला कि फिल्म की कहानी गांव की पृष्ठभूमि की है। जेनेवा और स्विटजरलैंड में पली बढ़ी लीला गांव की जिंदगी से नावाकिफ थी। उसी दौरान राजकपूर ने लीला को बताया कि वे उन्हें अपनी चार फिल्मों के लिए साइन करना चाहते हैं। लेकिन लीला तो गांव की जिंदगी पर बनी राजकपूर की पहली फिल्म में अपने आप को एडजस्ट नहीं कर पा रही थीं। लीला को लगा कि वे इस फिल्म की भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पाएंगी। आखिरकार उन्होंने फिल्म से हाथ खींच लिया। इसतरह से राजकपूर की एक नहीं बल्कि चार-चार फिल्में उनके हाथ से निकल गईं। इसी दौरान लीला ने विदेश का रास्ता पकड़ा और फिर पांच साल बाद उनकी वापसी फिल्म अनुराधा से हुई। दरअसल लीला का जन्म भले ही मुंबई में हुआ था, लेकिन उनकी दीक्षा-शिक्षा जेनेवा और स्विटजरलैंड में हुई थी। उनके पिता पट्टीपति रामैया नायड़ू परमाणु भौतिकविद थे और नोबेल पुरस्कारर विजेता मैरी क्यूरी के लिए काम कर चुके थे। .बाद में उन्होंने यूनेस्को से लेकर टाटा कंपनी में सलाहकार के पद पर भी काम किया।वर्ष 1960 में लीला नायडू विदेश से लौटी और मशहूर फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म अनुराधा से बॉलीवुड में कदम रखा। फिल्म में उन्होंने अभिनेता बलराज साहनी की पत्नी का किरदार निभाया था। इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया था। इस फिल्म का संगीत मशहूर सितारवादक रविशंकर ने तैयार किया था। जिसके गाने काफी लोकप्रिय हुए थे। फिल्म के लता मंगेशकर के गाए दो गाने काफी मशहूर हुए- हाय रे वो दिन क्यूं न आए... और जाने कैसे सपनों में खो गई अंखिया...। दोनों ही गाने लीला नायडू पर फिल्माए गए थे।लीला को वास्तविक पहचान वर्ष 1963 में रिलीज हुई फिल्म ये रास्ते हैं प्यार के , से मिली। फिल्म में उनके साथ अभिनेता सुनील दत्त हीरो थे। फिल्म की कहानी चर्चित नानावटी कांड पर आधारित थी। लीला ने बहुत कम फिल्में कीं। उन्होंने वही फिल्में स्वीकार की जिसके लिए उनका मन गवाही देता था। लीला ने मर्चेंट आइवोरी प्रोडक्शन द्वारा निर्मित फिल्म द हाउसहोल्डर में भी उन्होंने अभिनय किया, जिसका निर्देशन जेम्स आइवोरी ने किया था। फिल्म में उनकी जोड़ी शशिकपूर के साथ काफी पसंद की गई। वर्ष 1969 में द गुरू फिल्म में काम करने के बाद लीला ने फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।लीला ने मात्र 17 साल की उम्र में होटल व्यवसायी तिलक राज ओबराय (टिक्की ओबराय) से शादी कर ली, जो उनसे 16 साल बड़े थे। तिलक राज मशहूर होटल ओबेराय के मालिक थे। उनकी जुड़वा बेटियां हुईं माया और प्रिया। बाद में दोनों में तलाक हो गया। ओबेराय ने दोनों बेटियों की कस्डटी ली। कुछ समय बाद उन्होंने अपने बचपन के मित्र और साहित्यकार डॉम मॉरिस से शादी कर ली एवं हांगकांग चली गईं। दस वर्ष वहां बिताने के बाद वे फिर भारत वापस आ गईं। 1985 में श्याम बेनेगल की फिल्म त्रिकाल से इन्होंने हिंदी फिल्मी दुनिया में फिर प्रवेश किया। 1992 में प्रदीप कृष्णन द्वारा निर्देशित फिल्म इलेक्ट्रिक मून में इन्होंने आखिरी बार अभिनय किया था।लीला नायडू की निजी जिंदगी उथल-पुथल भरी रही। अपने आखिरी दिनों में उन्होंने खुद को सभी से अलग कर लिया और गुमनाम जिंदगी बिताने लगीं। आर्थरायटिस की बीमारी के कारण उनका चलने-फिरना भी लगभग बंद हो गया था। इसी दौरान आर्थिक तंगी से भी वे परेशान रहीं। आखिरकार उन्हें अपने घर में किराएदार रखने पड़े। 2009 में उन्हें इन्फ्लूएंजा की बीमारी हुई जिसकी वजह से उनके फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। 28 जुलाई 2009 को उन्होंने इस संसार को गुमनामी में ही अलविदा कह दिया।
- पुण्यतिथि - 27 जुलाईआलेख प्रशांत शर्माआज भी जब हास्य फिल्मों की बात होती है, तो इसमें फि़ल्म जाने भी दो यारो का नाम भी होता है। इसी फिल्म के एक कलाकार रवि वासवानी की 27 जुलाई को पुण्यतिथि है। वर्ष 2010 को दिल का दौरा पडऩेे से उनका निधन हो गया। उस वक्त वे 64 साल के थे।उन्होंने 1981 में फि़ल्म चश्मेबद्दूर से अपने फि़ल्मी कॅरिअर की शुरुआत की थी। जाने भी दो यारो और चश्मेबद्दूर जैसी फि़ल्मों में रवि वासवानी के अभिनय को काफी सराहा गया। रवि का जब निधन हुआ, वे एक फिल्म पर काम कर रहे थे। वे अपनी ही फिल्म जाने भी दो यारो जैसी महान ऐतिहासिक फि़ल्म की अगली कड़ी बनाने के लिए वो हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में पहुंचे थे। इसके अलावा रवि वासवानी हिमाचल में अपनी पहली फि़ल्म का निर्देशन करने के लिए भी आए थे, लेकिन 27 जुलाई 2010 को शिमला से दिल्ली लौटते हुए उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे अपना काम अधूरा छोडक़र ही इस दुनिया से चले गए।चश्मे के पीछे वो लंबूतरा चेहरा, बड़ी और हैरानी से फैली हुई सी आंखें, लंबा कद और व्यक्तित्व का ऐसा निरालापन की उनमें लोगों को हमेशा एक आम इंसान ही नजर आया। यही उनके अभिनय की सहजता भी थी।रवि वासवानी सिनेमा में हास्य और विद्रूप और विडंबना और मार्मिकता के अभिनय की उस महान कलाकार बिरादरी का हिस्सा थे जो चार्ची चैप्लिन से शुरू होती थी। वे हिंदी सिनेमा में अपने ढंग के चैप्लिन थे। उन्होंने बेशुमार ताबड़तोड़ फि़ल्में नहीं की, लेकिन जितनी की और जैसी भी भूमिका निभाई उसमें अपनी छाप छोड़ दी। किरदार की जटिलता तनाव और ऊंच-नीच को रवि वासवानी जज़्ब कर लेने के माहिर अभिनेता थे।जाने भी दो यारो फिल्म में अपने हास्य किरदार के लिए उन्हें 1984 में फि़ल्म फ़ेयर पुरस्कार भी मिला था।‘जाने भी दो यारों’ में रवि वासवानी ने नसीरुद्दीन शाह के साथ और ‘चश्मे बद्दूर’ में फारुख शेख के साथ काम किया। नसीरुद्दीन शाह और फारुख शेख इस बीच कहां से कहां पहुंच गए, लेकिन रवि वासवानी उस तेजी से आगे नहीं बढ़े। उन्होने जिस तरह की कॉमेडी फिल्मों में प्रस्तुत की, वह स्तरीय कॉमेडी कही जा सकती है। यानी असरानी, जगदीप आदि की कॉमेडी से अलग हटकर कुछ सार्थक देने की कोशिश। अच्छे कलाकार होने के बाद भी रवि वासवानी बाद में भीड़ में कहीं खो से गए।वासवानी को उनके विनोदी स्वभाव और बेहतरीन कॉंमिक टाइमिंग के लिए जाना जाता था। दिल्ली स्थित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र रहे वासवानी ने कभी घर नहीं बसाया। उन्होंने 30 से भी ज़्यादा फि़ल्मों के साथ-साथ कुछ टीवी धारावाहिकों में भी काम किया था।रवि का व्यक्तित्व बंजारा किस्म का था। वे हमेशा ख़ुश रहने वाले और दूसरों की मदद के लिए तैयार रहने वाले इंसान के रूप में पहचाने जाते थे। रवि वासवानी ने बंटी और बबली , प्यार तूने क्या किया जैसी कई सफल हिंदी फि़ल्मों में चरित्र अभिनेता के रूप में भी काम किया।
- छत्तीसगढ़ का परंपरागत तिहार हरेलीविशेष लेख- छगन लाल लोन्हारे,उप संचालक जनसंपर्कप्रदेश सरकार किसानों के आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। गांव, गरीब और किसान सरकार की पहली प्राथमिकता में हैं। देश की जीडीपी में कृषि का बड़ा योगदान है, छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी कृषि ही है और छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है। मुख्यमंत्री श्री साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार की इन डेढ़ साल के अवधि में किसानों के हित में लिए गए नीतिगत फैसलों से खेती किसानी को नया संबल मिला है। बीते खरीफ विपणन वर्ष में किसानों से समर्थन मूल्य पर 144.92 लाख मीेट्रिक टन धान की खरीदी कर रिकॉर्ड कायम किया है। छत्तीसगढ़ में हरेली त्यौहार का विशेष महत्व है। हरेली छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहार है। इस त्यौहार से ही राज्य में खेती-किसानी की शुरूआत होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह त्यौहार परंपरागत् रूप से उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन किसान खेती-किसानी में उपयोग आने वाले कृषि यंत्रों की पूजा करते हैं और घरों में माटी पूजन होता है। गांव में बच्चे और युवा गेड़ी का आनंद लेते हैं। इस त्यौहार से छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोक पर्वों की महत्ता भी बढ़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में गेड़ी के बिना हरेली तिहार अधूरा है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार द्वारा पंजीकृत किसानों से समर्थन मूल्य पर प्रति एकड़ 21 क्विंटल 3100 रूपए प्रति क्विंटल की मान से धान खरीदीकर न सिर्फ किसानों को मान बढ़ाया, बल्कि किसानों को उन्नति की ओर ले जाने में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। साथ ही किसानों के खाते में रमन सरकार के पिछले दो वर्ष का बकाया धान के बोनस 3716.38 करोड़ रूपए अंतरित कर किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत कर दी है। मुख्यमंत्री का मानना है कि भारत गांवों में बसता है। जब किसान खुशहाल होंगे तो प्रदेश का व्यापार, उद्योग बढे़गा।परंपरा के अनुसार वर्षों से छत्तीसगढ़ के गांव में अक्सर हरेली तिहार के पहले बढ़ई के घर में गेड़ी का ऑर्डर रहता था और बच्चों की जिद पर अभिभावक जैसे-तैसे गेड़ी भी बनाया करते थे। हरेली तिहार के दिन सुबह से तालाब के पनघट में किसान परिवार, बड़े बजुर्ग बच्चे सभी अपने गाय, बैल, बछड़े को नहलाते हैं और खेती-किसानी, औजार, हल (नांगर), कुदाली, फावड़ा, गैंती को साफ कर घर के आंगन में मुरूम बिछाकर पूजा के लिए सजाते हैं। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ के चीला का भोग लगाया जाता है। अपने-अपने घरों में अराध्य देवी-देवताओं की साथ पूजा करते हैं। गांवों के ठाकुरदेव की पूजा की जाती है।हरेली पर्व के दिन पशुधन के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए औषधियुक्त आटे की लोंदी खिलाई जाती है। गांव में यादव समाज के लोग वनांचल जाकर कंदमूल लाकर हरेली के दिन किसानों को पशुओं के लिए वनौषधि उपलब्ध कराते हैं। गांव के सहाड़ादेव अथवा ठाकुरदेव के पास यादव समाज के लोग जंगल से लाई गई जड़ी-बूटी उबाल कर किसानों को देते हैं। इसके बदले किसानों द्वारा चावल, दाल आदि उपहार में यादवों को भेंट करने की परंपरा रही हैं।सावन माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को हरेली पर्व मनाया जाता है। हरेली का आशय हरियाली ही है। वर्षा ऋतु में धरती हरा चादर ओड़ लेती है। वातावरण चारों ओर हरा-भरा नजर आने लगता है। हरेली पर्व आते तक खरीफ फसल आदि की खेती-किसानी का कार्य लगभग हो जाता है। माताएं गुड़ का चीला बनाती हैं। कृषि औजारों को धोकर, धूप-दीप से पूजा के बाद नारियल, गुड़ का चीला भोग लगाया जाता है। गांव के ठाकुर देव की पूजा की जाती है और उनको नारियल अर्पण किया जाता है।हरेली तिहार के साथ गेड़ी चढ़ने की परंपरा अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग सभी परिवारों द्वारा गेड़ी का निर्माण किया जाता है। परिवार के बच्चे और युवा गेड़ी का जमकर आनंद लेते है। गेड़ी बांस से बनाई जाती है। दो बांस में बराबर दूरी पर कील लगाई जाती है। एक और बांस के टुकड़ों को बीच से फाड़कर उन्हें दो भागों में बांटा जाता है। उसे नारियल रस्सी से बांध़कर दो पउआ बनाया जाता है। यह पउआ असल में पैर दान होता है जिसे लंबाई में पहले कांटे गए दो बांसों में लगाई गई कील के ऊपर बांध दिया जाता है। गेड़ी पर चलते समय रच-रच की ध्वनि निकलती हैं, जो वातावरण को औैर आनंददायक बना देती है। इसलिए किसान भाई इस दिन पशुधन आदि को नहला-धुला कर पूजा करते हैं। गेहूं आटे को गूँथ कर गोल-गोल बनाकर अरंडी या खम्हार पेड़ के पत्ते में लपेटकर गोधन को औषधि खिलाते हैं। ताकि गोधन को रोगों से बचाया जा सके। गांव में पौनी-पसारी जैसे राऊत व बैगा हर घर के दरवाजे पर नीम की डाली खोंचते हैं। गांव में लोहार अनिष्ट की आशंका को दूर करने के लिए चौखट में कील लगाते हैं। यह परम्परा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यमान है।पिहले के दशक में गांव में बारिश के समय कीचड़ आदि हो जाता था उस समय गेड़ी से गली का भ्रमण करने का अपना अलग ही आनंद होता है। गांव-गांव में गली कांक्रीटीकरण से अब कीचड़ की समस्या काफी हद तक दूर हो गई है। हरेली के दिन गृहणियां अपने चूल्हे-चौके में कई प्रकार के छत्तीसगढ़ी व्यंजन बनाती है। किसान अपने खेती-किसानी के उपयोग में आने वाले औजार नांगर, कोपर, दतारी, टंगिया, बसुला, कुदारी, सब्बल, गैती आदि की पूजा कर छत्तीसगढ़ी व्यंजन गुलगुल भजिया व गुड़हा चीला का भोग लगाते हैं। इसके अलावा गेड़ी की पूजा भी की जाती है। शाम को युवा वर्ग, बच्चे गांव के गली में नारियल फेंक और गांव के मैदान में कबड्डी आदि कई तरह के खेल खेलते हैं। बहु-बेटियां नए वस्त्र धारण कर सावन झूला, बिल्लस, खो-खो, फुगड़ी आदि खेल का आनंद लेती हैं।
- -इस तरह हुए सुपरहिट-24 जुलाई -जयंती पर विशेष-आलेख प्रशांत शर्माशानदार अभिनेता मनोज कुमार ने इसी साल 4 अप्रैल को 87 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। यदि वे जीवित होते तो आज अपना 88 वांं जन्मदिन मना रहे होते।भारत कुमार कहे जाने वाले इस अभिनेता ने अपनी देशभक्ति पूर्ण फिल्मों के जरिए काफी लोकप्रियता अर्जित की। मनोज कुमार अपने दौर में जनता के साथ नेताओं के भी फेवरेट अभिनेता थे। मनोज कुमार ने बहुत सी भूमिकाएं निभाई, रोमांटिक रोल भी किए , लेकिन उनकी देशभक्ति वाली भूमिकाओं के सामने सब फीके पड़ गए।1937 में जन्मे अभिनेता ने 20 वर्ष की आयु में बॉलीवुड में फिल्म फैशन से डेब्यू किया था, जिसे वे स्वयं अपनी पसंदीदा फिल्म मानते हैं। मनोज कुमार राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर में भी गजब का अभिनय किया है। फिल्म कांच की गुडिय़ा में उन्होंने पहली बार मुख्य भूमिका निभाई है। मनोज कुमार न सिर्फ एक अच्छे अभिनेता हैं बल्कि निर्देशक एवं फिल्म निर्माता के रूप में भी उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है। फिल्म उपकार के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया था।एक समय ऐसा था जब लोग मनोज कुमार को भारत कुमार ही कहने लगे थे, इसके पीछे वजह यह थी कि अधिकतर फिल्मों में उनके किरदार का नाम भारत था। हालांकि, उनका वास्तविक नाम हरिकृष्णा गिरी गोस्वामी था लेकिन वह दिलीप कुमार और अशोक कुमार से प्रेरित थे , इसलिए उन्होंने अपना नाम मनोज कुमार रखा।मनोज कुमार का जन्म पाकिस्तान के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। दस वर्ष की आयु में वे परिवार के साथ एबटाबाद, पाकिस्तान छोडक़र भारत विभाजन के समय भारत आए। कुछ समय परिवार के साथ विजय नगर के किंग्सवे कैंप में शरणार्थियों के रूप में रहे और बाद में दिल्ली आ गए।मनोज कुमार ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके नेताओं से अच्छे संबंध रहे । लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी उनकी फिल्मों को पसंद किया करते थे। उपकार फिल्म की प्रेरणा उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे 'जय जवान-जय किसान' से मिली थी। वर्ष 1965 में मनोज कुमार ने स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह के जीवन पर आधारित फिल्म शहीद में काम किया था, जिसके बाद उनकी छवि एक देशभक्त की बन गई थी।मिल चुके हैं इतने अवॉड्र्सबॉलीवुड में देशभक्ति का दौर लाने वाले का श्रेय मनोज कुमार को जाता है। फिल्म उपकार के लिए 1968 में नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला था। 1972 में बेईमान के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। 1992 में कला में योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया। साल 1999 में फिल्मफेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला। उन्हें साल 2016 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी मिला।इन फिल्मों को अपने दम पर कराया है हिटफिल्मों की बात करें तो 'हरियाली और रास्ता', 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन', 'सावन की घटा', 'पत्थर के सनम', 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'वो कौन थी', 'रोटी कपड़ा और मकान' और 'क्रांति' जैसी मूवीज में काम किया। निजी जिंदगी की बात करें तो मनोज कुमार और शशि के दो बेटे हैं, जिनका नाम विशाल और कुणाल हैं। मनोज कुमार ने जिसतरह से साफ- सुधरी फिल्में की, उनकी निजी जिंदगी भी साफ थी। उन्होंने अपने दौर की टॉप नायिकाओं के साथ काम किया, लेकिन उनका नाम कभी किसी हीरोइन के साथ अफेयर या फिर स्कैंडल में नहीं जुड़ा। उन्हें एक आइडियल फैमिली मैन के रूप में देखा जाता था। मनोज कुमार ने अपनी जिंदगी बिल्कुल वैसे ही जी जैसे देशभक्ति और आदर्श से भरी वो फिल्में किया करते थे- साफ-सीधे और ईमानदार।
- विशेष लेख - जी.एस. केशरवानी, उप संचालक, सुनील त्रिपाठी, सहायक संचालकराजधानी रायपुर और उसके आस-पास का एरिया, स्टेट कैपिटल रीजन (एससीआर) के रूप में विकसित होने जा रहा है। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का नया ग्रोथ ईंजन बनेगा। विधानसभा में इस संबंध में विधेयक को मंजूरी मिलने के साथ ही स्टेट कैपिटल रीजन‘ ने रफ्तार पकड़ ली है। राजधानी रायपुर सहित दुर्ग-भिलाई और नवा रायपुर अटल नगर के क्षेत्र कैपिटल रीजन में शामिल किया गया है। यह पूरा क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की तर्ज पर विकसित होगा।भौगोलिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ देश के केन्द्र में स्थित होने के साथ-साथ व्यापार, वाणिज्य और उद्योग के प्रमुख केन्द्र के रूप में उभर रहा है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की यह पहल पर स्टेट कैपिटल रीजन में योजनाबद्ध और शहरी विकास की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए, स्टेट कैपिटल रीजन को विकसित करने की योजना बनाई गई है। इससे राजधानी और आसपास के शहरों का प्लान्ड डेव्हलपमेंट होगा। साथ ही शहरी सुविधाएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और वाणिज्य के लिए बेहतर और अनुकूल वातावरण तैयार होगा। इस क्षेत्र में ट्रांसपोर्ट की बेहतर कनेक्टिविटी और आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी सुविधाएं बढ़ेंगी।स्टेट कैपिटल रीजन में शामिल शहरों में वर्ष 2031 तक 50 लाख से अधिक की आबादी रहने का अनुमान है। बढ़ते शहरीकरण और आबादी के दबाव को कम करने तथा बेहतर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए यहां राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण का गठन करने का प्रावधान रखा गया है। यह प्राधिकरण, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, हैदराबाद महानगर विकास प्राधिकरण, मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण आदि के अनुरूप होगा।राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष मुख्यमंत्री होंगे। इसके साथ ही आवास एवं पर्यावरण, नगरीय प्रशासन एवं विकास, लोक निर्माण विभाग के मंत्री, राज्य के मुख्य सचिव सहित विभिन्न विभागों के सचिव, राज्य शासन द्वारा नामित सदस्यों में राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण का प्रतिनिधित्व करने वाले चार विधायक, स्थानीय प्राधिकरण का प्रतिनिधित्व करने वाले चार निर्वाचित सदस्य होंगे। मुख्य कार्यपालन अधिकारी, राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण इसके सदस्य संयोजक होंगे।यह प्राधिकरण भूमि का प्रभावी उपयोग और पर्यावरण अनुकूल योजनाबद्ध विकास सुनिश्चित करेगा। वर्ष 2024-25 के बजट में स्टेट केपिटल रीजन कार्यालय की स्थापना के लिए सर्वेक्षण एवं डीपीआर बनाने के लिए भी 5 करोड़ का प्रावधान किया गया है। रायपुर से दुर्ग तक मेट्रो रेल सुविधा के सर्वे कार्य के लिए भी 5 करोड़ का प्रावधान किया गया है।राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण का उद्देश्य राजधानी और आसपास के शहरों के व्यापक विकास के लिए योजना बनाने के साथ नियामक और समन्वय सस्थान के रूप में कार्य करना है। इसके प्रमुख कार्यों में स्थानीय स्तर पर योजनाएं बनाना, निवेश, आर्थिक योजनाओं और इनका कार्यान्वयन, विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी हितधारकों के बीच समन्वय, आर्थिक और अधोसंरचनात्मक विकास को बढ़ावा देना भी है।प्राधिकरण की एक कार्यकारी समिति होगी, जिसके अध्यक्ष मुख्य कार्यपालन अधिकारी होंगे। इसके अलावा नगर तथा ग्राम निवेश के संचालक, नगरीय प्रशासन विभाग के विकास संचालक, शहरी योजनाकार, अभियंता, वित्त, संपदा, पर्यावरण नामांकित सदस्य होंगे। इसके अलावा राजधानी क्षेत्र में शामिल सभी जिलों के कलेक्टर इसके सदस्य होंगे।स्टेट कैपिटल रीजन के विकास के लिए राज्य सरकार द्वारा राजधानी क्षेत्र विकास निधि बनाई जाएगी। इसके साथ ही एक पुनरावृत्ति निधि भी होगी। इसे राजधानी अवसंरचना परियोजनाओं के लिए विशेष उपकर लगाने की शक्ति भी होगी। यह वार्षिक बजट भी तैयार करेगा तथा राज्य सरकार को प्रत्येक वर्ष वार्षिक योजना एवं प्रतिवेदन भी प्रस्तुत करेगा।
- -अमर गायक मुकेश की जयंती पर विशेषफिल्म फेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे मुकेशआलेख- प्रशांत शर्माआज हिन्दी फिल्मों में गाने वाले कलाकारों की फेहरिश्त इतनी लंबी हो चुकी है कि उन्हें उंगलियों में गिनना मुश्किल हो गया है। रोज एक नया कलाकार नई आवाज के साथ नजर आ जाता है। जिनकी आवाज कुछ समय के बाद गुम सी हो जाती है। लेकिन हिन्दी फिल्मों ने के. एल. सहगल, लता मंगेशकर, रफी साहब, मुकेश, किशोर कुमार जैसे महान कलाकारों का भी दौर देखा है। जिनके गाने आज भी एक छोटा बच्चा दिल से गुनगुना लेता है।आज हम बात कर रहे हैं ऐसे ही महान गायक मुकेश चंद माथुर यानी मुकेश की। मुकेश की आवाज़ बहुत खूबसूरत थी। अभिनेता बनने का सपना देखने वाले मुकेश को उनके रिश्तेदार अभिनेता मोतीलाल गायक बनाने के लिए बम्बई ले गये और अपने घर में रहने दिया। यही नहीं उन्होंने मुकेश के लिए रियाज़ का पूरा इंतजाम किया। 'निर्दोष' फि़ल्म में मुकेश ने अदाकारी करने के साथ-साथ गाने भी खुद गाए। इसके अतिरिक्त उन्होंने 'माशूका', 'आह', 'अनुराग' और 'दुल्हन' में भी बतौर अभिनेता काम किया। पाश्र्व गायक के तौर पर उन्हें अपना पहला काम 1945 में फि़ल्म पहली नजऱ में मिला। मुकेश ने हिन्दी फि़ल्म में जो पहला गाना गाया, वह था दिल जलता है तो जलने दे ....जिसमें अदाकारी मोतीलाल ने की। इस गीत में मुकेश के आदर्श गायक के एल सहगल के प्रभाव का असर साफ़-साफ़ नजऱ आता है। बाद में उन्होंने अपना पेटर्न बदला और फिर तो जैसे वे छा ही गए। अभिनेता राजकपूर पर उनकी आवाज सबसे ज्यादा पसंद की गई। फिर राजकपूर की फिल्मों में मुकेश मुख्य गायक होने लगे।60 के दशक में मुकेश का करिअर अपने चरम पर था और अब मुकेश ने अपनी गायकी में नये प्रयोग शुरू कर दिये थे। उस वक्त के अभिनेताओं के मुताबिक उनकी गायकी भी बदल रही थी। जैसे कि सुनील दत्त और मनोज कुमार के लिए गाये गीत। 70 के दशक का आगाज़ मुकेश ने जीना यहां मरना यहां गाने से किया। यह फिल्म भी राजकपूर ने बनाई थी।इस दौर में मुकेश ज़्यादातर कल्याणजी-आंनदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर. डी. बर्मन जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम कर रहे थे। अपने उत्कृष्ट गायन के लिये ऐसा कौन सा पुरस्कार है जिसे मुकेश ने प्राप्त न किया हो। वे फिल्मफेयर पुरस्कार पाने वाले पहले पुरुष गायक थे। वे उस ऊंचाई पर पहुंच गए थे कि पुरस्कारों कि गरिमा उनसे बढऩे लगी थी, लोकप्रियता के उस शिखर पर विद्यमान थे जहां पहुंच पाना किसी के लिए एक सपना होता है। करोड़ों भारतवासियों के हृदयों पर मुकेश का अखंड साम्राज्य था और रहेगा।मुकेश ने अपने करिअर का आखिरी गाना अपने दोस्त राज कपूर की फि़ल्म के लिए ही गाया था। मुकेश की राजकपूर के साथ अच्छी दोस्ती थी, लेकिन उन्होंने दिलीप कुमार के लिए सबसे अधिक गाने गाए।अपने करीब 35 साल के कॅरिअर में मुकेश ने हजारों कर्णप्रिय और लोकप्रिय गाने गाए जो आज भी उतने ही हसीन लगते हैं जितने पहली बार लोगों ने इन्हें सुना था। मुकेश रियाज़ से सन्तुष्ट होने पर ही रिकार्डिंग की सहमति देते थे। मेरा नाम जोकर का कालजयी गीत, जाने कहां गए वो दिन, उन्होंने सत्रह दिनों के अभ्यास के बाद रिकार्ड कराया था। मुकेश को अपने दो गीत बेहद पसंद थे- "जाने कहां गए वो दिन...." और "दोस्त-दोस्त ना रहा..।"मुकेश का निधन 27 अगस्त, 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पडऩे से हुआ। उस समय वह गा रहे थे, एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल, जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल । उस कार्यक्रम का लता मंगेशकर और नितिन मुकेश भी हिस्सा थे।मुकेश साहब के गाए 15 लोकप्रिय गाने..1. दिल जलता है, तो जलने दे2. जाने कहां गए वो दिन3. सावन का महीना4. चंदन सा बदन चंचल चितवन5. कहीं दूर जब दिन ढल जाए6. कभी कभी मेरे दिल में खयाल आता है7. ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना8. जीना यहां मरना यहां9. तारो में सजके अपने सूरज से10. कई बार यूं भी देखा है11. मेरा जूता है जापानी12. मेहबूब मेरे13. आवारा हूं14. दुनिया बनाने वाले15. डम डम डिगा डिगा
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23 जुलाई : महमूद की पुण्यतिथि पर विशेष
आलेख - प्रशांत शर्मा
-कॉमेडी को भारतीय फिल्मों के कथानक का बनाया अंतरंग हिस्सा
लोगों को हंसाने की विलक्षण प्रतिभा के धनी प्रख्यात हास्य कलाकार महमूद को कॉमेडी को भारतीय फिल्मों का अभिन्न अंग बनाने का श्रेय जाता है। हंसी-मजाक में बड़ी खूबसूरती से जिंदगी का फलसफा बयान करने का हुनर रखने वाले इस कलाकार ने हास्य भूमिका को नए आयाम और मायने दिये।
महमूद ने भारतीय फिल्मों में महज औपचारिकता मानी जाने वाली कॉमेडी को एक अलग और विशेष स्थान दिलाया। उन्होंने कॉमेडी को एक नया स्तर और ऊंचाई देने के साथ-साथ यह भी साबित किया कि फिल्म का हास्य कलाकार उसके नायक पर भी भारी पड़ सकता है।
महमूद को भारतीय फिल्मों में कॉमेडी के नए युग की शुरुआत करने वाला कलाकार माना जाता है। इस फनकार ने कॉमेडी को भारतीय फिल्मों के कथानक का अंतरंग हिस्सा बनाया। उन्हीं के प्रयासों का नतीजा था कि 60 के दशक में फिल्मों पर कॉमेडी हावी होने लगी थी और महमूद अभिनय की इस विधा के बेताज बादशाह बन गए थे। महमूद ने 60 के दशक में अपने अभिनय की विशिष्ट शैली के जादू से हिन्दी फिल्मों में कॉमेडियन की भूमिका को विस्तार दिया और एक वक्त ऐसा भी आया जब महमूद दर्शकों के लिये अपरिहार्य बन गए। महमूद का जन्म 29 सितम्बर 1932 को मुम्बई में हुआ था। महमूद अभिनेता और नृत्य कलाकार मुम्ताज़ अली की नौ संतानों में से एक थे। महमूद ने शुरुआत में बाल कलाकार के तौर पर कुछ फि़ल्मों में काम किया था।
बॉलीवुड में कदम रखने के लिए महमूद सभी तरह के प्रयास करते थे। महमूद ने इसके लिए ड्राइविंग तक सीख ली और निर्माता ज्ञान मुखर्जी के ड्राइवर बन गए। महमूद ने सोचा की अब उन्हें कलाकारों और निर्माता, निर्देशक के करीब जाने का मौका मिलेगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। यहीं से खुली महमूद की किस्मत और उन्हें दो बीघा जमीन , प्यासा जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल मिल गए। 1958 में आई फिल्म परवरिश से महमूद को बड़ा ब्रेक मिला। इस फिल्म में उन्होंने राजकपूर के भाई की भूमिका निभाई थी। महमूद के अभिनय को हर किसी ने पसंद किया। इसके बाद छोटी बहन फिल्म उनके कॅरिअर की अहम फिल्म साबित हुई। इन फिल्मों की सफलता के बाद तो महमूद के लिए बॉलीवुड के दरवाजे पूरी तरह से खुल गए। महमूद ने फिल्म गुमनाम में एक दक्षिण भारतीय रसोइये का कालजयी किरदार अदा किया। उसके बाद उन्होंने प्यार किये जा, प्यार ही प्यार, ससुराल, लव इन टोक्यो और जिद्दी जैसी हिट फिल्में दीं।
बॉलीवुड में महमूद की धाक का अंदाज आप इस तरह से लगा सकते हैं कि उन्होंने अमिताभ बच्चन को पहला सोलो रोल दिया था। ये वही महमूद हैं जिन्होंने आर.डी बर्मन यानी पंचम दा जैसे संगीत के धुरंधरों को पहला ब्रेक दिया था। अपनी अनेक फिल्मों में महमूद नायक के किरदार पर भारी नजर आए। यह उनके अभिनय की खूबी थी कि परदे पर उनके कदम रखते ही दर्शक उनसे जुड़ जाते थे।
फिल्मों में अपनी बहुविविध कॉमेडी से दर्शकों को दीवाना बनाने के बाद महमूद ने अपनी फिल्म निर्माण कम्पनी पर ध्यान देने का फैसला किया। उनकी पहली होम प्रोडक्शन फिल्म छोटे नवाब थी। बाद में उन्होंने बतौर निर्देशक सस्पेंस-कॉमेडी फिल्म भूत बंगला बनाई। जिसमें उन्होंने अपने दोस्त और संगीतकार आर. डी. बर्मन को भी अभिनय करने का मौका दिया। उसके बाद उनकी फिल्म पड़ोसन 60 के दशक की जबरदस्त हिट कॉमेडी फिल्म साबित हुई। पड़ोसन को हिंदी सिने जगत की श्रेष्ठ हास्य फिल्मों में गिना जाता है। इसमें सुनील दत्त भी एक अच्छे कॉमेडी कलाकार बनकर उभरे।
आई एस जौहर के साथ उनकी जोड़ी काफ़ी मशहूर हुई थी और दोनों ने जौहर महमूद इन गोवा और जौहर महमूद इन हाँगकाँग के नाम से फि़ल्में भी कीं। निर्देशक के रूप में महमूद की अंतिम फि़ल्म थी दुश्मन दुनिया का। 1996 में बनी इस फि़ल्म में उन्होंने अपने बेटे मंज़ूर अली को पर्दे पर उतारा था। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही। अपने जीवन के आखिरी दिनों में महमूद का स्वास्थ्य काफी खराब हो गया। उन्हें अनेक बीमारियां हो गई थीं। वह इलाज के लिये अमेरिका गए जहां 23 जुलाई 2004 को उनका निधन हो गया। उनकी बीमारी का एक कारण उनका अत्यधिक धूम्रपान करना भी था।
महमूद ने अभिनेत्री मीना कुमारी की बहन मधु से शादी की थी। आठ संतानों के पिता महमूद के दूसरे बेटे लकी अली जाने-माने गायक और अभिनेता हैं।
- ग़ज़ल-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)कभी फूल पढ़ना कभी खार पढ़नालिखा जिंदगी में वही सार पढ़ना ।चुराती नजर में छुपा प्यार पढ़ना ।।प्रभावित करें बाहरी रंग रोगन ।टिकाकर रखे नींव आधार पढ़ना ।।किनारे सदा बैठ कर मौज करते ।नदी को नहीं नदी-धार पढ़ना ।।सभी देखते हैं चमक रोशनी की ।अँधेरी निशा भी कई बार पढ़ना ।।रहें पागलों की तरह घूमते वे ।नहीं आशिकों को गुनहगार पढ़ना ।।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)जब भी घर जाओ,चूम लेतीं हैं हथेली।ले लेतीं हैं बच्चों की,सौ-सौ बलैंया।माँ ने पाले पोसेअपने बच्चे।फिर देखभाल की अपनेनाती, पोते, पोतियों की।सबकी खुशियों का रखा ध्यान,जीवन भर।सबके लिए अचार, बड़ियोंकी व्यवस्था।त्यौहारों पर आटे,तिल के लड्डूदही-बड़े,पीड़िया।जन्मदिवस पर खीर,थोड़ा-थोड़ा सबके हिस्से,बँटती रही माँ ।सबकी पसंद, नापसंद को लेकरखटती रही माँ ।बच्चों की सफलता परगर्वित होतीं।दुहरातीं कई-कई बारउनके बचपन के किस्से।शरारतों को याद करआती मधुर मुस्कान।वर्तमान में अतीत को जीतींमाँ के बाईस्कोप मेंचलती रहती हैं स्मृतियोंकी तस्वीरें खटाखट।पुरानी बातें याद करते अक्सरवह खो जातीं हैं ,समय की भूल-भुलैया में।।
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-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
साथी बनकर रहें हमेशा , बातें क्यों जीत-हार के ।
जाओ न मुझे छोड़ पिया जी , तोड़ो मत तार प्यार के ।
मेरे मन में बसे हुए हो , मुझसे कैसी दूरी है ।
आसमान में छिटक रहे क्यों , जानूँ क्या मजबूरी है ।
बिना तेल के जले न बाती , स्याही बिन क्या करे कलम ।
भूल हुई क्या ऐसी मुझसे , जरा बता दो मुझे बलम ।
बढ़ा न मेरी मुश्किल प्रियतम , दुख छोड़िए तकरार के ।।
तुम्हीं चाँद मेरे आँगन के , गायब हुए अमावस -से ।
अंतर्मन की धरा सूखती , झूमो बरसो पावस-से ।
कली भ्रमर की बाट जोहती , बेचैनी है खिलने की ।
कैद पंखुड़ी बीच कमलिनी , आकुल रवि से मिलने की ।
नीलांबर में मेघ पधारे , आओ प्रिय हास् धार के ।।
नयन बंद कर तुझे निहारूँ , बसे सीप में मोती से ।
भासित हो अंतस में ऐसे , जलती हूँ दीपज्योति से ।
नहीं पास तू मन उदास है , पुष्पहार मुरझाए हों ।
फैला कजरा बिखरा गजरा ,आया पतझर मधुवन ज्यों ।
रूखी अलकें सूनी पलकें , वन हुए बिना बहार के ।। - -संभाग के नक्सल प्रभावित जिलों में भी लोगों की पहुंच में हैं स्वास्थ्य सुविधाएं-चिकित्सक स्टाफ की नियुक्ति से बस्तर संभाग में मजबूत हुई है व्यवस्था-बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की दिशा में ठोस प्रयास लगातार जारीः स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवालविशेष लेख, मनोज कुमार सिंह, सहायक संचालकरायपुर / मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सुशासन और स्वास्थ्य योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से न केवल सामान्य क्षेत्रों में, बल्कि नक्सल प्रभावित जिलों में भी स्वास्थ्य सुविधाएं लोगों की पहुंच में आ रही हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS), राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन अभियान और मलेरिया मुक्त अभियान जैसे कार्यक्रमों ने इस क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को नया आयाम दिया है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि बस्तर में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हमारी सरकार की जन-केंद्रित सोच और समर्पित प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि बस्तर जैसे क्षेत्र में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों, मितानिनों तथा स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मेहनत से बेहतर परिणाम देखने को मिल रहे हैं।स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा कि सरकार का लक्ष्य पूरे छत्तीसगढ़ में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है और इस दिशा में ठोस प्रयास लगातार जारी हैं। बस्तर में घर-घर जाकर जांच, त्वरित उपचार और जागरूकता गतिविधियों के माध्यम से मलेरिया के प्रसार को नियंत्रित किया गया है। राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) के तहत बस्तर सहित पूरे छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य संस्थानों ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (NQAS) के तहत उल्लेखनीय उपलब्धि1 जनवरी 2024 से 16 जून 2025 तक बस्तर संभाग में कुल 130 स्वास्थ्य संस्थाओं को क्वालिटी सर्टिफिकेशन प्राप्त हुआ है। इनमें 1 जिला अस्पताल, 16 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 113 उप स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं। इसके अलावा, 65 अन्य संस्थाओं का सर्टिफिकेशन कार्य प्रक्रियाधीन है। विशेष रूप से नक्सल प्रभावित जिलों—कांकेर (8), बीजापुर (2), सुकमा (3) और दंतेवाड़ा (1)—में 14 संस्थानों को गुणवत्ता प्रमाणपत्र प्रदान किया गया है, जो क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार का प्रमाण है।नियद नेल्लानार योजना के अंतर्गत बस्तर संभाग में 62,466 राशन कार्ड बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि एक वर्ष में ही 36,231 आयुष्मान कार्ड पंजीकृत किए जा चुके हैं। इसके अंतर्गत अब तक 52.6 प्रतिशत आयुष्मान कार्ड का कवरेज इन पांच जिलों में हो चुका है, जिसमें 6,816 लोगों को लाभ मिला है और इन पर 8 करोड़ 22 लाख रुपये की राशि क्लेम की गई है।चिकित्सक स्टाफ की नियुक्ति से मजबूत हुई व्यवस्थापिछले डेढ़ वर्षों में बस्तर संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं को और सुदृढ़ करने के लिए 33 मेडिकल स्पेशलिस्ट, 117 मेडिकल ऑफिसर और 1 डेंटल सर्जन की नियुक्ति की गई है। इसके साथ ही राज्य स्तर से 75 तथा जिला स्तर से 307 स्टाफ एवं प्रबंधकीय पदों पर भर्ती की गई है, जबकि 291 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया चल रही है। यह कदम क्षेत्र में चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता और गुणवत्ता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंचनक्सल प्रभावित जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार सरकार की प्राथमिकता रहा है। कांकेर, बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ अब आम लोगों तक पहुंच रहा है। यह विष्णु देव साय के सुशासन का परिणाम है, जिसने बस्तर संभाग में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है।बस्तर संभाग में स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे ये सुधार न केवल स्थानीय निवासियों के जीवन स्तर को ऊंचा उठा रहे हैं, बल्कि यह भी साबित कर रहे हैं कि सुशासन और समर्पित प्रयासों से सबसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी सकारात्मक बदलाव संभव है।
- कहानी-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)आज संडे को कहाँ जा रही हो ? शिवी को आलमारी से कपड़े निकालते देख प्रतीति ने पूछा ।हताशा और गुस्से में सिर हिलाते हुए शिवी ने जवाब दिया , "क्या मॉम , संडे तो एक दिन होता है मजे से घूमने का ।"वही एक संडे हमारे लिए भी तो होता है न बेटा कि हम अपने बच्चे से दो बातें करें , उसके साथ लंच करें…प्रतीति यही कहना चाहती थी , लेकिन शिवी का तड़ाकेदार जवाब और उपेक्षा भरा चेहरा देखकर उसने कहा , ' हाँ तो कुछ कैम्पस के लिए तैयारी ही कर लो । ढंग की जॉब मिल जाएगी । पूरे दिन अपने फालतू दोस्तों के साथ बिताने से वो तैयारी तो होने से रही । 'शिवी तमककर बोली , ' मॉम, मेरे दोस्त फालतू नहीं हैं और मुझे पता है कैसी तैयारी करनी है ।' पंद्रह मिनट बाद शिवी अपनी गाड़ी उठा कर जा चुकी थी और दरवाजे पर प्रतीति 'कहाँ जा रही, कब तक आएगी ' के अपने सवाल लिए खड़ी रह गई ।घर से भुनभुनाती निकली शिवी आधे घंटे बाद अपने दोस्तों के साथ खिलखिला रही थी । पूरे दिन अपने दोस्तों के संग हँसी-ठट्ठा करते, बाजार में घूमती रही । इस बीच तीन बार आया माँ का फोन शिवी काट चुकी थी । रात होते-होते यश ने सुझाया, - “'चलो आज बाइक रेसिंग करेंगे । नए शहर के बाहर एक बिल्डिंग बन रही है, वहाँ रात को बहुत कम ट्रैफिक होता है, वहाँ से शुरू करेंगे ।' सारे दोस्तों ने हे..ए…..की टेर लगा दी । शिवी सोच में पड़ गई थी.. ' मॉम को काॅल करके बताऊँ कि नहीं ? पर वह फिर टोकेंगी और हो सकता है तुरंत घर आने को कह दें। उसका मन कल्पनाओं में झूम गया था..बाइक रेस में हर बाइक पर एक कपल । अहा! कितना रोमांचक होगा ।'अब एक तरफ लगातार माँ का फोन आ रहा था और दूसरी तरफ सारे दोस्त अपनी-अपनी बाइक की तरफ बढ़ रहे थे । मन की सारी उलझनों को एक तरफ झटक कर शिवी उनकी ओर बढ़ ही रही थी कि अचानक सौरभ के पैर से वहीं सोए एक कुत्ते के पिल्ले को पैर लग गया । उसके बाद न जाने कहाँ से आकर उसकी मरियल-सी माँ आक्रामक हो उठी । अपने बच्चे को खतरे में जानकर भौंक-भौंक कर उसने आसमान सिर पर उठा लिया ।शुभम चिल्लाया - " अबे ! सौरभ…चुपचाप वहीं खड़ा हो जा , वह माँ है यार, अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए चिंतित होगी ही…वह निश्चिंत हो जाए कि उसके बच्चों को हमसे कोई खतरा नहीं है, फिर वह चुपचाप चली जाएगी । थोड़ी देर बाद सचमुच वह शांत होकर अपने पिल्लों को साथ लिए चली गई । " वह माँ है यार…" ये शब्द शिवी के सिर पर मानो हथौड़े की तरह बजने लगे । वह भी तो माँ है जो सदैव अपनी बेटी को सुरक्षित और आगे बढ़ते देखना चाहती है और इसीलिए रोक-टोक करती है , सावधान रहना सिखाती है कि उसकी बेटी को कोई चोट मत लगे । कहाँ जा रही है , कब तक घर आएगी जैसे प्रश्न जो उसे बेकार लगते थे , आज उसके मायने समझ में आ रहे हैं ।ओह ! वह कितने रूखे ढंग से पेश आई आज माँ के साथ । मालूम है वह अब भी दरवाजे पर चिंतित खड़ी होगी , उसकी राह देखते । अचानक शिवी ने अपने कदम पीछे किए और दोस्तों के साथ रेस लगाने की बात छोड़ कर घर जाने का फैसला कर लिया ।
- आलेख - जी.एस केशरवानीभारत के मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में छत्तीसगढ़ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। नवा रायपुर अटल नगर में 1100 करोड़ रुपये की लागत से छत्तीसगढ़ की पहली सेमीकंडक्टर यूनिट का भूमिपूजन किया जा चुका है। देश की प्रसिद्ध सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनी पोलीमैटेक इलेक्ट्रॉनिक्स प्राइवेट लिमिटेड के प्लांट की आधारशिला रखकर विकसित छत्तीसगढ़ की तरक्की को नई गति दी गई है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में नई उद्योग नीति और इज ऑफ डुईंग बिसनेस के तहत् राज्य द्वारा दी जा रही सुविधाओं और सहुलियतों से राज्य में निवेश का नया वातावरण तैयार हुआ है। सेमीकंडक्टर बनाने वाली कंपनी पॉलीमैटेक ने भी दिल्ली में आयोजित इन्वेस्टमेंट समिट में छत्तीसगढ़ में निवेश की इच्छा जताई थी और मात्र तीन महीने के भीतर ही भूमिपूजन का कार्य संपन्न हुआ। यह छत्तीसगढ़ में ईज ऑफ डूईंग बिजनेस की सफलता को दर्शाती है।छत्तीसगढ़ में सेमीकंडक्टर प्लांट की स्थापना से जहां एक ओर बड़े पैमाने पर चिप्स का निर्माण होगा, वहीं तकनीकि शिक्षा प्राप्त युवाओं को बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर भी सुलभ होंगे। राज्य सरकार द्वारा न केवल सेमीकंडक्टर निर्माण पर ध्यान दिया जा रहा है बल्कि सेमीकंडक्टर के लिए पूरे इको सिस्टम तैयार करने की भी योजना पर भी काम किया जा रहा है, जिसमें चिप डिजाईन से लेकर मेनुफेक्चरिंग और पैकेजिंग की पूरी व्यवस्था होगी। राज्य सरकार द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डाटा सेंटर जैसे नए और तकनीकि उद्योगों को बढ़ावा देने से राज्य में तकनीकि शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा साथ ही रोजगार के नए-नए अवसर भी बढ़ेंगे।प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने यह मंत्र दिया है कि दुनिया के कम्प्यूटर में लगने वाले चिप में कम से कम एक चिप भारत में बना हो। उन्होंने वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में वर्ष 2030 तक 10 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सेमिकंडक्टर मिशन की शुरूआत की है। सेमीकंडक्टर की महत्ता और उपयोगिता को सरल शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है। वाहनों का जिस प्रकार ईंधन पेट्रोल है, ठीक उसी प्रकार सेमीकंडक्टर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का मस्तिष्क और संचालक है। मोबाइल, लैपटॉप, ऑटोमोबाइल, रक्षा उपकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, ड्रोन और स्मार्ट डिवाइस इन सभी में सेमीकंडक्टर की केंद्रीय भूमिका होती है।छत्तीसगढ़ सरकार ने कुछ महीने पहले ही नई औद्योगिक नीति लागू की है, जिसके परिणामस्वरूप महानगरों में आयोजित इन्वेस्टर समिट से अब तक साढ़े 5 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। राज्य सरकार निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष अनुदान के साथ ही कई प्रकार की सुविधाएं दे रही है। सिर्फ सेमीकंडक्टर ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आईटी सेक्टर में भी राज्य सरकार निवेश को प्रोत्साहन दे रही है। देश का पहला एआई डेटा सेंटर पार्क नवा रायपुर में बनाया जा रहा है, जिससे छत्तीसगढ़ एक प्रमुख तकनीकी हब के रूप में उभरेगा।( प्रतीकात्मक फोटो)
- आलेख- हीरा देवांगन, संयुक्त संचालकमुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ डिजिटल इंडिया के सपने को साकार कर रहा है। राज्य सरकार की दूरदर्शी नीतियों और तकनीकी नवाचारों के बल पर छत्तीसगढ़ डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। मंत्रालय से लेकर ग्राम पंचायतों तक डिजिटल तकनीक ने शासकीय कामकाज को आसान एवं प्रभावी बनाया है। प्रदेश के 1460 ग्राम पंचायतों में अटल डिजिटल सेवा केंद्र के माध्यम से बुजुर्ग पेंशनरों, महतारी वंदन योजना की लाभार्थी महिलाओं को नगद आहरण की सुविधा दी जा रही है। विभिन्न योजनाओं की डीबीटी की राशि का ग्राम पंचायतों में ही नगद भुगतान की सुविधा होने से ग्रामीणों को बैंक शाखाओं तक नहीं जाना पड़ रहा है।छत्तीसगढ़ सरकार ने मंत्रालय और संचालनालयों में ई-ऑफिस प्रणाली को सफलतापूर्वक संचालित करने के बाद अब जिलों में भी ई-ऑफिस का क्रियान्वयन किया जा रहा है। कार्यालयीन कामकाज में कागजी कार्यवाही को न्यूनतम करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है। इससे कार्यालयीन कामकाज में तेजी आई है एवं प्रक्रिया और पारदर्शी हुई है। इस पहल से फाईलों के निपटारे में अनावश्यक लेटलतीफी दूर हुई है त्वरित निर्णय हो रहे हैं। 10 डिजिटल सेवाओं की शुरुआत से जमीन की रजिस्ट्री आसान और पारदर्शी हो रही है। आधार प्रमाणीकरण से अपाईमेंट लेकर घर बैठे जमीन एवं मकान की रजिस्ट्री कराई जा रही है। रजिस्ट्री के बाद नामांतरण की प्रक्रिया स्वतः पूरी हो जाती है।राजस्व प्रशासन को दुरूस्त करने छत्तीसगढ़ के 14 हजार 490 गांवों का जियो रिफ्रेंसिंग का महत्वाकांक्षी कार्य पूरा हो चुका है। इस तकनीक से भूमि संबंधी विवाद दूर होंगे। खरीफ वर्ष 2025-26 में डिजिटल फसल सर्वेक्षण हेतु 14 हजार से अधिक गांवों का चयन किया गया है। ई-कोर्ट के माध्यम से राज्य में राजस्व प्रकरणों का समयबद्ध एवं त्वरित निराकरण किया जा रहा है। साथ ही, अटल मॉनिटरिंग पोर्टल के माध्यम से शासकीय योजनाओं और कार्यक्रमों की रीयल-टाइम निगरानी की जा रही है। शासकीय खरीदी में पारदर्शिता के लिए जेम पोर्टल को अनिवार्य किया गया है, जिससे शासकीय खरीद प्रक्रिया में निष्पक्षता और जवाबदेही बढ़ी है।प्रदेश के पेंशनरों के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल और सुलभ बनाया गया है। पेंशनरों और कर्मचारियों के लिए डिजीलॉकर के माध्यम से महत्वपूर्ण दस्तावेज जैसे ई-पीपीओ, जीपीएफ स्टेटमेंट, अंतिम भुगतान आदेश और पेंशन प्रमाण पत्र उपलब्ध कराए जा रहे हैं। एम्प्लाई कॉर्नर मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल के माध्यम से शासकीय कर्मचारियों की सेवा जानकारी को अद्यतन करने की प्रक्रिया को डिजिटल बनाया गया है।छत्तीसगढ़ एआई के क्षेत्र में दुनिया से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है। नवा रायपुर में देश का पहला एआई डेटा सेंटर पार्क स्थापित होने से प्रदेश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। इससे आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस आधारित सेवाओं के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की नई पहचान बनेगी। छत्तीसगढ़ सरकार हर वर्ग तक डिजिटल सुविधाओं का लाभ पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। सीजीएमएससीएल द्वारा ऐप के माध्यम से राज्य की दवा आपूर्ति श्रृंखला को रीयल-टाइम में ट्रैक किया जा रहा है। विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में समय पर दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर यह ऐप स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बना रहा है।खनिज विभाग द्वारा ऑनलाइन ट्रांजिट पास की सुविधा ने खनिजों के परिवहन को और अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाया है। सीएमओ पोर्टल की शुरुआत ने नागरिकों और सरकार के बीच संवाद को और मजबूत किया है। छत्तीसगढ़ सरकार की ये डिजिटल सेवाएं प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के साथ ही नागरिकों के जीवन को भी आसान बना रही हैं। इससे गांवों से लेकर शहरों तक हर वर्ग को डिजिटल क्रांति का लाभ मिल रहा है।
- -लेखक : श्री गिरिराज सिंह, वस्त्र मंत्री, भारत सरकारएक राष्ट्र की प्रगति केवल उसके आर्थिक सूचकांकों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि उस विकास से आम जनजीवन में कितनी गरिमा, अवसर और आत्मबल का संचार हुआ है। जब हम आज भारत की ओर देखते हैं, तो यह केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि एक जाग्रत समाज की तस्वीर है, जो आगे बढ़ना जानता है, जो अपने अतीत से सीखता है और अपने भविष्य को स्वयं गढ़ रहा है।मेरे लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर, जो वित्त वर्ष 2024-25 की अंतिम तिमाही में 7.4% रही, एक आकंड़ा मात्र नहीं है। यह उस किसान की मेहनत का सम्मान है, जिसने आधुनिक तकनीक को अपनाकर पैदावार बढ़ाई। यह उस महिला उद्यमी की कहानी है, जिसने स्वयं सहायता समूह से यात्रा शुरू कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपने उत्पाद दुनिया तक पहुंचाए। यह उस युवा इंजीनियर का आत्मविश्वास है, जिसने मेक इन इंडिया के अंतर्गत नौकरी ढूंढ़ने के बजाय नौकरी देने वाला बना।आज भारत की औसत विकास दर 6.5% है, और नॉमिनल जीडीपी 330 ट्रिलियन को पार कर चुकी है। GST संग्रह लगातार दो महीने 2 लाख करोड़ से ऊपर रहा है। यह आर्थिक आत्मबल अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह गाँवों, छोटे कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुँचा है।डिजिटल क्रांति ने भारत के सामाजिक ताने-बाने में एक ऐतिहासिक परिवर्तन लाया है। गाँव का एक युवा अब मोबाइल से भुगतान करता है, सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे खाते में प्राप्त करता है और ऑनलाइन पढ़ाई के माध्यम से अपने सपनों को साकार करता है। आज UPI के जरिए 25 ट्रिलियन से अधिक ट्रांजैक्शन हो चुके हैं। यह डिजिटल समावेशन केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं है, यह सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण का नया अध्याय है।भारत ने वैश्विक व्यापार में भी अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज की है। केवल अप्रैल 2025 में ही भारत से 3 मिलियन आईफोन iPhone एक्सपोर्ट हुए, चीन से तीन गुना ज़्यादा। यह दर्शाता है कि भारत अब केवल बाज़ार नहीं, ग्लोबल वैल्यू चेन का प्रमुख स्तंभ बन चुका है। बीते दशक में भारत में 500 बिलियन से अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आया है, जो इनोवेशन, रोज़गार और आत्मनिर्भरता के नए द्वार खोल रहा है।हमारे किसान भी इस बदलाव के सशक्त भागीदार बने हैं। आज 51 मिलियन किसानों के पास डिजिटल किसान ID है, जिससे उन्हें उनकी भूमि, फसल और योजनाओं का सीधा लाभ मिलता है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, डिजिटल मंडियाँ, और आत्मनिर्भर कृषि मिशन जैसे प्रयासों ने उन्हें सहयोगी नहीं, सहभागी बनाया है।भारत में गरीबी दर 2011-12 के 29.5% से घटकर आज 9.4% रह गई है। यह केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का विस्तार है। विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि अत्यंत गरीबी अब मात्र 5.3% रह गई है। इस परिवर्तन में उस ग्रामीण परिवार की कहानी छिपी है, जिसके बच्चे पहली बार स्कूल गए, जिसने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को नज़दीक पाया, और जिसने आत्मनिर्भरता को अपनी पहचान बनाया।इंफ्रास्ट्रक्चर में भी भारत ने नई ऊँचाइयाँ छुई हैं। आज भारत एक साल में 1,600 इंजन बनाकर विश्व का सबसे बड़ा लोकोमोटिव निर्माता है। ऊर्जा क्षेत्र में 49% क्षमता अब नवीकरणीय स्रोतों से है। भारत अब सस्टेनेबल विकास की राह पर तेज़ी से अग्रसर है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे क्षेत्रों में भी भारत की क्षमता को वैश्विक मान्यता मिल रही है। OpenAI जैसी संस्थाओं ने भारत में अपना पहला अंतरराष्ट्रीय AI अकादमी शुरू की है, यह हमारे युवाओं की प्रतिभा और संभावनाओं में भरोसे का प्रमाण है।नए भारत की विकास यात्रा में टेक्सटाइल सेक्टर भी एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। तकनीकी वस्त्रों को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए नेशनल टेक्निकल टेक्सटाइल मिशन (NTTM) और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना एक-दूसरे के पूरक बनकर कार्य कर रही हैं। NTTM के तहत ₹510 करोड़ की सहायता से 168 नवाचार आधारित प्रोजेक्ट्स को मंज़ूरी दी गई है। वहीं, टेक्सटाइल इंफ्रास्ट्रक्चर को वैश्विक मानकों पर लाने के लिए देशभर में 7 पीएम मित्रा पार्क स्थापित किए जा रहे हैं, जहां पूरी वैल्यू चेन को ‘प्लग-एंड-प्ले’ मॉडल पर काम करने की सुविधा मिलेगी। यह क्षेत्र अब केवल परंपरा नहीं, बल्कि तकनीक, नवाचार और निर्यात का नया प्रतीक बन चुका है।आज भारत को WTO और WEF जैसे वैश्विक संस्थान केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि ग्रोथ इंजन के रूप में देख रहे हैं। यह उस समर्पित प्रयास का परिणाम है, जो आदरणीय प्रधानमंत्री जी की नीतियों, योजनाओं और नागरिकों की सहभागिता से संभव हुआ है।मैं दृढ़ता से मानता हूँ कि यह यात्रा केवल सरकार की नहीं, हर भारतीय की है। हमारे सामने आज जो उपलब्धियाँ हैं, वे उस संकल्प का परिणाम हैं जिसने हर गाँव, हर परिवार और हर नागरिक को जोड़ा। भारत आज एक विकल्प नहीं, एक प्रेरणा है, आत्मनिर्भरता की, समावेशिता की और वैश्विक नेतृत्व की। जब हम अमृतकाल में विकसित भारत @2047 की परिकल्पना करते हैं, तो वह केवल एक सपना नहीं, एक साझा संकल्प है और मुझे विश्वास है इस संकल्प की सिद्धि का समय अब दूर नहीं।
- आलेख- गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री, भारत सरकारपिछले दशक में, भारत की पवित्र भूमि को सिर्फ़ देखा ही नहीं गया है - बल्कि इसे फिर से खोजा गया है। पहाड़ अब सिर्फ़ परिदृश्य नहीं रह गए हैं; वे जीवित अभयारण्य हैं। केदारनाथ और बद्रीनाथ के बर्फ से ढके मंदिरों से लेकर बोधगया की ध्यानपूर्ण शांति और सारनाथ की सुनहरी नीरवता तक, भारत की आध्यात्मिक आत्मा ने एक-एक तीर्थयात्री की भावना को उद्वेलित किया है। इस युग में पर्यटन, विवरण पुस्तिका (ब्रोशर) के ज़रिए नहीं, बल्कि भक्ति, स्मृति और फिर से जुड़ने की सभ्यतागत प्रेरणा के ज़रिए तैयार किया गया था।2014 और 2024 के बीच, इस आध्यात्मिक जागृति ने देश के सांस्कृतिक मानचित्र को नया स्वरुप दिया। केदारनाथ, जो कभी त्रासदी का प्रतीक था, फ़ीनिक्स की तरह उभरा - 2024 में यहां 16 लाख से ज़्यादा तीर्थयात्री आये, जबकि एक दशक पहले यह संख्या केवल 40,000 थी। उज्जैन को महाकाल के शहर के रूप में पुनर्जीवित किया गया, इसने 2024 में 7.32 करोड़ आगंतुकों का स्वागत किया। प्रकाश और पवित्रता में पुनर्जन्म लेने वाली काशी ने 11 करोड़ लोगों को अपनी पवित्र गलियों में भ्रमण करते देखा। बोधगया और सारनाथ की गूंज कई महाद्वीपों में सुनायी दी, दोनों तीर्थस्थलों ने 2023 में 30 लाख से ज़्यादा साधकों को आकर्षित किया।और फिर एक ऐसा क्षण आया, जो आंकड़ों से पार चला गया —जनवरी 2024 में अयोध्या में राम लला की प्राण प्रतिष्ठा। यह कोई उद्घाटन नहीं था; यह सभ्यता की धड़कन का जीर्णोद्धार था। महज छह महीनों में, 11 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं का आगमन हुआ —न सिर्फ देखने के लिए, बल्कि इससे जुड़ने के लिए। लगभग इतना ही ऐतिहासिक था, महाकुंभ 2025, जो दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक समागम था, जिसमें 65 करोड़ से ज्यादा तीर्थयात्री आस्था और उत्कृष्टता के संगम पर पहुंचे। अयोध्या और प्रयागराज, साथ मिलकर, भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण के दो प्रकाश स्तंभ बन गए।यह पर्यटन नहीं था—यह घर वापसी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस वापसी को आकार, अवसंरचना और आत्मा दी गई। अब पर्यटन एक जांच सूची (चेकलिस्ट)-संचालित उद्योग नहीं रहा, बल्कि पवित्र ‘स्व’ को फिर से खोजने का एक राष्ट्रीय मिशन बन गया। प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी मंत्र - "भारत में विवाह करें, भारत की यात्रा करें, भारत में निवेश करें" - ने पर्यटन को एक सांस्कृतिक आह्वान में बदल दिया।मोदी सरकार ने प्रारंभ से ही पर्यटन को राष्ट्रीय पुनरुत्थान की ताकत के रूप में देखा है। स्वदेश दर्शन और इसके उन्नत रूप, स्वदेश दर्शन 2.0 के माध्यम से, पर्यटन मंत्रालय ने रामायण, बौद्ध, तटीय और आदिवासी जैसे विषयगत सर्किट के तहत 110 परियोजनाएँ विकसित कीं। 2014-15 में शुरू की गई मूल योजना में कुल 5,287.90 करोड़ रूपये की लागत से 76 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। स्वदेश दर्शन 2.0 में, स्थाई गंतव्यों को विकसित करने के लिए 2,106.44 करोड़ रूपये के साथ 52 परियोजनाएँ जोड़ीं गईं।चुनौती आधारित गंतव्य विकास (सीबीडीडी) उप-योजना के तहत, 623.13 करोड़ रूपये की 36 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जबकि एसएएससीआई योजना के अंतर्गत राज्य के नेतृत्व में पर्यटन अवसंरचना के विस्तार के लिए 3,295.76 करोड़ रूपये की 40 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गयी।इसके साथ ही, प्रसाद योजना के जरिये उन्नत सुविधाओं, प्रकाश व्यवस्था और स्वच्छता के साथ 100 तीर्थ शहरों को पुनर्जीवित किया गया। इन प्रयासों से भारत में 2023 में 250 करोड़ से अधिक घरेलू पर्यटकों की यात्रा दर्ज की गयी - जो अब तक का सबसे अधिक है।2024-25 के केंद्रीय बजट में एक ऐतिहासिक घोषणा के तहत 50 पर्यटन स्थलों को विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया, उन्हें निवेश और वित्तपोषण को आसान बनाने के लिए अवसंरचना सामंजस्य मास्टर सूची (आईएचएमएल) में जोड़ा गया।पुनरुद्धार केवल पवित्र स्थानों तक सीमित नहीं था। 2018 में अनावरण की गई स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, देश के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्मारकों में से एक बन गई, जिसे 2023 में 50 लाख से अधिक आगंतुक देखने आये। इसके चारों ओर इको-टूरिज्म पार्क, टेंट सिटी और आदिवासी संग्रहालय विकसित हुए हैं - जो सम्मान को अवसर में बदल रहे हैं।भारत का सभ्यतागत आत्मविश्वास इसकी कूटनीति में परिलक्षित होने लगा। फ्रांस, जापान, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के राजनेताओं का, न केवल दिल्ली में, बल्कि वाराणसी, उदयपुर, अयोध्या और महाबलीपुरम में भी स्वागत हुआ। सॉफ्ट पावर अब सॉफ्ट नहीं रही - यह 3डी अनुभव हो गयी। रिवर क्रूज़, दीपोत्सव, आध्यात्मिक भ्रमण और सांस्कृतिक प्रदर्शन ने राजकौशल को आत्मा के शिल्प में बदल दिया।इस बीच, अतुल्य भारत 2.0 ने देश को स्मारकों की भूमि से बदलकर बदलाव की भूमि बना दिया। ऋषिकेश में योग, केरल में आयुर्वेद, पूर्वोत्तर में जनजातीय त्योहार और कच्छ में शिल्प ने पर्यटन इकोसिस्टम को जीवंत व विशिष्ट स्थान प्रदान किया। विपणन को अब स्मृति से अलग करना मुश्किल था।इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति भी बहुत प्रभावशाली रही। अप्रैल 2000 से दिसंबर 2023 के बीच, भारत ने पर्यटन में 18 बिलियन डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया। प्रमुख आतिथ्य अवसंरचना परियोजनाओं में 2014-22 के दौरान 9 बिलियन डॉलर का निवेश हुआ। केवल 2023 में, भारत ने 9.52 मिलियन विदेशी पर्यटकों के साथ 2.31 लाख करोड़ रूपये (28.7 बिलियन डॉलर) की विदेशी मुद्रा अर्जित की, जिसमें पिछले वर्ष की तुलना में 47.9% की वृद्धि दर्ज की गयी। इस क्षेत्र ने 2023-24 में 84.63 मिलियन नौकरियों का सृजन किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.46 मिलियन अधिक थीं – इस प्रकार पर्यटन क्षेत्र भारत के विकास और रोज़गार की आधारशिला के रूप में उभरा।पर्यटन एक संपूर्ण आयाम वाले मिशन के रूप में विकसित हुआ। ‘एक विरासत अपनाएँ’ योजना के तहत प्रमुख स्थलों का कॉर्पोरेट प्रबंधन शुरू हुआ, जबकि उड़ान योजना ने शिरडी, जीरो और मिनिकॉय जैसे दूर-दराज के स्थानों को हवाई मार्ग से जोड़ा। राष्ट्रीय डिजिटल पर्यटन मिशन ने टिकट बुकिंग, डेटा और यात्रा कार्यक्रमों का एक एकीकृत प्लेटफ़ॉर्म में एकीकरण करना शुरू किया।पूर्वोत्तर- जो कभी उपेक्षित था- मुकुट के एक रत्न के रूप में उभरा। एक्ट ईस्ट नीति और अवसंरचना पर विशेष ध्यान की वजह से अरुणाचल, सिक्किम और मेघालय जैसे राज्यों में पर्यटकों का आगमन 2014 और 2022 के बीच दोगुना हो गया। जीवंत गांव कार्यक्रम ने किबिथु और माना जैसे दूरदराज के इलाकों को ऐसे गंतव्यों में बदल दिया, जहाँ देशभक्ति का मिलन प्रकृति और विरासत से होता है।पर्यटन का विचार भी आकांक्षापूर्ण हो गया। “भारत में विवाह”, राजस्थान और गोवा जैसे विवाह केंद्रों के लिए प्रोत्साहन, अभियान और अवसंरचना के समर्थन में तब्दील हो गया। इस बीच, चिकित्सा और कल्याण पर्यटन के लिए 2022 में 6 लाख से अधिक विदेशी मरीज आये, जिससे भारत दुनिया के अग्रणी उपचार स्थलों में से एक बन गया।2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता, सांस्कृतिक कूटनीति का एक उत्कृष्ट प्रदर्शन था। दिल्ली तक सीमित रहने के बजाय, खजुराहो से कुमारकोम तक 60 से अधिक गंतव्यों में वैश्विक कार्यक्रमों की मेजबानी हुई, जिनमें से प्रत्येक को स्थानीय कला, खान-पान और विरासत के साथ तैयार किया गया था। दुनिया भारत के साथ सिर्फ़ संवाद नहीं कर रही थी - बल्कि इसे अनुभव भी कर रही थी।लेकिन आंकड़ों के पीछे, असली परिवर्तन आध्यात्मिक था। भारत ने दुनिया से अपने स्मारकों को देखने के लिए अनुरोध करना बंद कर दिया। देश ने अपनी यादों को महसूस करने, अपनी शांति में स्वस्थ होने और अपनी विविधता का जश्न मनाने के लिए पूरी दुनिया को आमंत्रित किया।इस नए भारत में, पर्यटन मौसमी नहीं है - यह सभ्यतागत है। यह वह स्थल है, जहाँ दर्शन का विकास से, जहाँ तीर्थयात्रा का प्रगति से और जहाँ त्योहार का अवसंरचना से मिलन होता है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, भारत ने दुनिया का सिर्फ़ स्वागत नहीं किया – बल्कि उसे गले लगाया।जैसे भिक्षु बोधि वृक्ष की परिक्रमा करते हैं, जैसे तीर्थयात्री केदारनाथ की ठंडी हवा में मंत्रोच्चार करते हैं, जैसे दुल्हनें महलनुमा गुंबदों के नीचे विवाह करती हैं और जैसे सीमावर्ती गाँव उत्सुक यात्रियों की मेजबानी करते हैं, एक सच्चाई हर पवित्र मार्ग और शांत गलियारे में गूंजती है: भारत केवल एक गंतव्य नहीं है, जहाँ की आप यात्रा करते हैं - यह एक ऐसा देश है, जहाँ आप कुछ शाश्वत की तलाश में बार-बार वापस आते हैं।**
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सावन गीत
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)
सावन में झूलों का उत्सव ,खुशियाँ लेकर आया है ।
बूँदें छेड़े भीगे तन को , पावस मन को भाया है ।।
मोती की लड़ियाँ मनभावन , याद दिलाती हैं प्रिय की।
हाथों में थामो जब इनको , प्यास बढ़ाती है हिय की।
विरहा के प्यासे अंबर में , सुख का बादल छाया है ।
लौट रहे घर साजन मेरे , यह संदेशा लाया है ।।
सुधियों की बारिश में भीगा , मन-मयूर मेरा झूमा ।
चुपके से उस छली भ्रमर ने , फूलों के मुख को चूमा ।
मदमस्त पवन के झोंकों ने , अलकों को सहलाया है ।
खुशियाँ पाकर नाच उठा तन , झूम-झूम मन गाया है ।।
मधुर मिलन की याद दिलाती , मुझको भाती यह बारिश।
बाँहों में प्रियतम के झूलूँ , बस इतनी-सी है ख्वाहिश ।
मन की इस महकी बगिया में , प्रेम-पुष्प मुस्काया है ।
बारिश की छम-छम बूँदों में , प्यार पिया का पाया है ।।
वसुधा का शृंगार कर रही , उमड़-घुमड़ वारिद माला ।
रंग-बिरंगे पुष्प मनोहर , मोती से सजती बाला ।
खुशबू आई प्रथम मिलन की , प्रिय की यादें लाया है ।
संग सजन के झूला झूलूँ , सोच जिया हरषाया है ।। - आलेख- डॉ. सुनिता जैन, योग चिकित्सक, आयुष योग वेलनेस सेंटर, शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय अस्पताल, रायपुरमानसिक स्वास्थ्य एक ऐसा विषय है, जिसे अब गंभीरता से लेना समय की मांग है। योग एक ऐसा माध्यम है जो बिना किसी दुष्प्रभाव के व्यक्ति को मानसिक शांति और संतुलन प्रदान करता है। यदि हम रोज़ाना कुछ समय योग और ध्यान को दें, तो न केवल हम मानसिक बीमारियों से बच सकते हैं, बल्कि एक सकारात्मक, आनंदमय और संतुलित जीवन की ओर अग्रसर हो सकते हैं।आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद जैसे मानसिक रोग आम होते जा रहे हैं। काम का दबाव, सामाजिक प्रतिस्पर्धा, रिश्तों में तनाव और अनियमित जीवनशैली हमारे मानसिक स्वास्थ्य को गहरे रूप से प्रभावित कर रही है। ऐसे समय में योग एक प्राकृतिक, सुलभ और प्रभावी उपाय के रूप में सामने आया है, जो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक संतुलन को भी मज़बूती प्रदान करता है।योग: केवल शारीरिक व्यायाम नहींबहुत से लोग योग को केवल शरीर को लचीला बनाने का साधन मानते हैं, परंतु वास्तव में योग एक सम्पूर्ण जीवनशैली है। पतंजलि योगसूत्र में योग को "चित्तवृत्ति निरोधः" कहा गया है, अर्थात योग मन की चंचलता को नियंत्रित करने का माध्यम है। योग के विभिन्न अंग — जैसे कि प्राणायाम, ध्यान (मेडिटेशन), और आसन — व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।तनाव को कम करने में योग की भूमिका -आज का मनुष्य हर पल किसी न किसी तनाव से घिरा रहता है। प्राणायाम जैसे गहरी सांस लेने की विधियाँ तंत्रिका तंत्र को शांत करती हैं और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के एक अध्ययन के अनुसार, नियमित योगाभ्यास से कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम होता है।इससे मानसिक हल्कापन महसूस होता है और सोचने-समझने की शक्ति बेहतर होती हैचिंता और अवसाद से राहत -ध्यान (मेडिटेशन) और योग निद्रा जैसी विधियाँ मस्तिष्क में सकारात्मक न्यूरोट्रांसमीटर — जैसे कि सेरोटोनिन और डोपामिन — के स्राव को बढ़ावा देती हैं। ये रसायन मूड को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं और अवसाद व चिंता से लड़ने में मदद करते हैं। नियमित योगाभ्यास करने वालों में आत्मविश्वास, भावनात्मक स्थिरता और मानसिक स्पष्टता देखने को मिलती है।। Deep breathing (प्राणायाम) और mindfulness meditation से मस्तिष्क में GABA (Gamma Aminobutyric Acid) का स्तर बढ़ता है, जो चिंता और अवसाद को कम करता हैअनेक वैश्विक और भारतीय शोधों में यह सिद्ध हुआ है कि योग का नियमित अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। कुछ अध्ययन यह भी बताते हैं कि योग थेरेपी, मानसिक रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के उपचार में दवाओं के साथ-साथ सहायक भूमिका निभा सकती है।. नींद की गुणवत्ता में सुधार - अनियमित नींद या अनिद्रा, मानसिक विकारों का बड़ा कारण है। योग निद्रा, शवासन, और ध्यान के माध्यम से नींद की गुणवत्ता में सुधार होता है। AIIMS (नई दिल्ली) के एक अध्ययन में यह पाया गया कि नियमित योग से अनिद्रा से ग्रसित व्यक्तियों की नींद की अवधि और गहराई दोनों में सुधार हुआ।ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में वृद्धि - योगाभ्यास से मस्तिष्क के prefrontal cortex और hippocampus जैसे क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ती है, जो ध्यान और स्मृति से संबंधित हैं। यह विशेषकर छात्रों, प्रोफेशनलों और बुजुर्गों के लिए अत्यंत लाभकारी है।कोविड-19 और मानसिक स्वास्थ्य में योग की भूमिका - महामारी के दौरान जब मानसिक स्वास्थ्य एक वैश्विक चुनौती बन गया, तब WHO और आयुष मंत्रालय ने योग को मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने का एक प्रभावी उपाय माना। "Common Yoga Protocol" के माध्यम से लाखों लोगों ने मानसिक शांति पाई।सरकारी प्रयास और नीति - भारत सरकार ने ‘फिट इंडिया मूवमेंट’, ‘आयुष मंत्रालय’, और ‘अंतरराष्ट्रीय योग दिवस’ जैसे अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से योग को जन-जन तक पहुँचाया है। wellness centers NCDs and life style clinic ke madhyam se abhi Chhattisgarh me nihsulk yogabhyas n roganusar yogparamarsh sabhi jilo me diya jar raha hai मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता में योग को एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया गया है।निष्कर्षयोग मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में एक सरल, सुलभ और सशक्त उपाय है। वैज्ञानिक शोधों और अनुभवों से यह सिद्ध हो चुका है कि योग न केवल तनाव और चिंता को कम करता है, बल्कि संपूर्ण जीवन को संतुलन प्रदान करता है। आज के तनावग्रस्त समाज में योग को अपनाना केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन चुका है।
- लेखक - डॉ. जितेन्द्र सिंह, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार); पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्रीकेरल के थुंबा में मछली पकड़ने वाले शांत गाँव के चर्चयार्ड से साउंडिंग रॉकेट के प्रक्षेपण के साथ शुरू हुई भारत की अंतरिक्ष यात्रा के बारे में शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि एक दिन देश कितनी ऊँचाईयों को छूएगा। यह समय दृढ़ संकल्प का था, जब सितारों तक पहुँचने का सपना सीमित साधनों, लेकिन असीम महत्वाकांक्षा के साथ परवान चढ़ा।आज, वह सपना विकसित होकर एक राष्ट्रीय मिशन का रूप अख्तियार कर चुका है, और जब हम नरेन्द्र मोदी सरकार के ग्यारह वर्षों को चिन्हित कर रहे हैं, तो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में आमूल-चूल बदलाव आ चुका है – यह साहसपूर्ण, समावेशी और आम नागरिकों के जीवन से गहराई से संबद्ध है।यह परिवर्तन केवल रॉकेट और उपग्रहों से ही संबंधित नहीं है, अपितु यह लोगों के बारे में है। यह दर्शाता है कि दूरदराज के गाँव के किसान से लेकर डिजिटल कक्षा के छात्र तक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी किस प्रकार रोजमर्रा की जिंदगी की लय में खामोशी से शामिल हो चुकी है । प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और अंतरिक्ष विभाग के रणनीतिक नेतृत्व में, भारत ने विकास, सशक्तिकरण और अवसर के उपकरण के रूप में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की नए सिरे से परिकल्पदना की है।साल 2014 से शुरू किए गए सुधारों ने नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। 2020 में इन-स्पे स की स्थारपना ने निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में भाग लेने का अवसर प्रदान किया, जिससे नवाचार की लहर उठी। आज, 300 से अधिक अंतरिक्ष-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप उपग्रह बना रहे हैं, प्रक्षेपण वाहन डिजाइन कर रहे हैं तथा कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और नेविगेशन के क्षेत्र में सेवाएं देने वाले अनुप्रयोग विकसित कर रहे हैं। ये स्टार्टअप केवल प्रौद्योगिकी ही सृजित नहीं कर रहे हैं - वे खासकर टियर 2 और टियर 3 शहरों में युवा इंजीनियरों और उद्यमियों के लिए रोजगार के अवसरों का भी सृजन कर रहे हैं। उदारीकृत अंतरिक्ष नीति ने अंतरिक्ष सेवाओं को अधिक किफायती और सुलभ बना दिया है, जिससे उन्नत प्रौद्योगिकी का लाभ जमीनी स्तर पर पहुंच रहा है।भारत के उपग्रह अब मौसम पूर्वानुमान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिनकी बदौलत किसानों को अपनी बुवाई और कटाई के चक्रों की योजना अधिक सटीकता से बनाने में मदद मिलती है। बाढ़-ग्रस्त क्षेत्रों में, उपग्रह डेटा प्रारंभिक चेतावनी और आपदा प्रतिक्रिया को सक्षम बनाता है, जिससे जीवन और आजीविका की रक्षा होती है। चक्रवातों और सूखे के दौरान रिमोट सेंसिंग के कारण अधिकारियों को तैयार रहने और नुकसान को कम करने में मदद मिलती है। ग्रामीण क्लीनिकों में, उपग्रह कनेक्टिविटी द्वारा संचालित टेलीमेडिसिन की बदौलत शहरी केंद्रों के डॉक्टरों द्वारा दूरदराज के क्षेत्रों में रोगियों को परामर्श मुमकिन हो पाता है, जिससे स्वास्थ्य सेवा से संबंधित खाई पाटना संभव होता है। सैटेलाइट बैंडविड्थ द्वारा समर्थित ई-लर्निंग प्लेटफ़ॉर्म यह सुनिश्चित करते हुए कि भूगोल अब सीखने में बाधा नहीं रहा है, दूर-दराज के गाँवों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हैं।भारत के स्वदेशी जीपीएस नेटवर्क-नाविक प्रणाली का इस्तेमाल अब वाहनों में नेविगेशन, ट्रेनों और जहाजों पर नज़र रखने और मछुआरों को किनारे पर सुरक्षित वापस लाने के लिए किया जाता है। कृषि में, उपग्रह परामर्श से किसानों को मिट्टी की नमी, फसल की सेहत और कीटों के संक्रमण की निगरानी करने में मदद मिलती है, जिससे उचित निर्णय लेने और बेहतर पैदावार प्राप्त करने में मदद मिलती है। ये काल्पैनिक लाभ नहीं हैं, बल्कि - ये लाखों लोगों के जीवन में आया वास्तविक, उल्ले खनीय सुधार हैं।बीते दशक में शुरू किए गए मिशनों ने दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। मंगलयान भारत की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता प्रदर्शित करते हुए अपने पहले ही प्रयास में मंगल पर पहुँच गया। चंद्रयान-3 चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट उतरा, ऐसा क्षेत्र जहां बर्फ होने का अनुमान है, और इसके रोवर ने ऐसे प्रयोग किए जो भविष्य के चंद्र मिशनों को जानकारी प्रदान करेंगे। आदित्य-एल1 अब सौर तूफानों का अध्ययन कर रहा है, जिससे वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष के मौसम तथा संचार प्रणालियों और बिजली ग्रिड पर इसके प्रभाव को समझने में मदद मिल रही है।साल 2027 के लिए निर्धारित गगनयान मिशन भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजेगा। लेकिन चालक दल की उड़ान से पहले ही, यह मिशन नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहा है। अंतरिक्ष यात्रियों का प्रशिक्षण, सुरक्षा प्रणालियों का विकास और चालक दल रहित परीक्षण उड़ानें व्याजपक प्रभाव उत्पन्ने कर रही हैं - अनुसंधान को बढ़ावा दे रही हैं, प्रतिभाओं को आकर्षित कर रही हं और राष्ट्रीय गौरव का निर्माण कर रही हैं।भविष्य पर गौर करते हुए, भारत 2035 तक अपना स्वायं का अंतरिक्ष स्टेशन- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन- बनाने की योजना बना रहा है। पहला मॉड्यूल 2028 में लॉन्च होने की उम्मीद है, और अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग की हाल की सफलता ने इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के लिए आवश्यक तकनीकों की पुष्टि की है। यह स्टेशन दीर्घकालिक निवास और अनुसंधान का अवसर देगा, जिससे गहन अंतरिक्ष अन्वेषण और अंतरग्रहीय मिशनों के लिए द्वार खुलेंगे।इन बढ़ती महत्वाकांक्षाओं में सहायता देने के लिए, भारत अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण यान (एनजीएलवी) का विकास कर रहा है, जो पृथ्वी की निचली कक्षा में 30,000 किलोग्राम वजन ले जाने में सक्षम है। इसमें पुन: प्रयोज्य चरण और मॉड्यूलर प्रणोदन प्रणाली होगी, जिससे अंतरिक्ष तक पहुँच अधिक किफायती और टिकाऊ हो जाएगी। लॉन्च की बढ़ती बारंबारता को संभालने और वाणिज्यिक मिशनों की सहायता करने के लिए श्रीहरिकोटा में एक तीसरा लॉन्च पैड और तमिलनाडु में एक नया स्पेसपोर्ट बनाया जा रहा है।भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम बेहद सहयोगपूर्ण भी है। नासा के साथ निसार मिशन पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक खतरों की निगरानी करेगा। जापान के साथ लूपेक्सप मिशन भारी रोवर के साथ चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों का पता लगाएगा। ये साझेदारियां एक विश्वसनीय वैश्विक अंतरिक्ष भागीदार के रूप में भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा को दर्शाती हैं।लेकिन अंतरिक्ष सिर्फ़ अन्वे षण के बारे में नहीं है - यह ज़िम्मेदारी के बारे में भी है। हज़ारों उपग्रहों के पृथ्वी की परिक्रमा करने के कारण अंतरिक्ष मलबा एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। इसरो का अंतरिक्ष परिस्थिति जागरूकता कार्यक्रम मलबे की रियल-टाइम निगरानी करता है, टक्क र होने से बचने और अंतरिक्ष गतिविधियों की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए रणनीति विकसित करता है।देश के कोने-कोने में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का प्रभाव दिखाई दे रहा है। हिमालयी राज्यों में, उपग्रह डेटा भूस्खलन और हिमनदों की गतिविधियों की निगरानी में मदद करता है। तटीय क्षेत्रों में, यह समुद्री संरक्षण और आपदा की तैयारी में सहायता करता है। जनजातीय और दूरदराज के क्षेत्रों में, यह उपग्रह इंटरनेट के माध्यम से डिजिटल समावेशन को सक्षम बनाता है। खामोशी से हो रही ये क्रांतियाँ - परिवर्तन हैं, जो बिना किसी दिखावे के जीवन को प्रभावित करते हैं।हम अगले दशक पर गौर करें, तो लक्ष्य स्पष्ट हैं: 2040 तक चालक दल के साथ चंद्रमा पर उतरना, पूरी तरह से चालू अंतरिक्ष स्टेशन, और वैश्विक अंतरिक्ष नवाचार में नेतृत्व की भूमिका। ये केवल सपने नहीं हैं - ये ऐसे राष्ट्र के लिए रणनीतिक अनिवार्यताएँ हैं, जिसने हमेशा समाज को बदलने के लिए विज्ञान की शक्ति में विश्वास किया है।थुंबा के साइकिल शेड से लेकर कक्षा में डॉकिंग मेन्यु वर तक, भारत की अंतरिक्ष यात्रा दृढ़ता, कल्पनाशीलता और अथक प्रयास की दास्तायन है। यह एक ऐसी दास्ता्न है जिसका ताल्लुंक हर नागरिक, हर वैज्ञानिक, हर स्वतपनदृष्टा से है। और अब, जबकि हम परिवर्तनकारी शासन के ग्यारह वर्षों का जश्न मना रहे हैं, तो हम एक ऐसे राष्ट्र का भी कीर्तिगान कर रहे हैं जो वास्तव में सितारों तक जा पहुँचा है - और उनकी रोशनी को वापस घर ले आया है।
- लेखक:- श्री गिरिराज सिंह, केंद्रीय कपड़ा मंत्रीकुछ साल पहले, तकनीकी वस्त्रों को एक सीमित खंड के रूप में देखा जाता था। इसका दायरा सीमित था, इसमें कम निवेश किया जाता था और आयात पर यह बहुत अधिक निर्भर था लेकिन आज, यह भारत के औद्योगिक परिवर्तन के केंद्र में हैं। यह बदलाव आकस्मिक नहीं है। यह माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व में आत्मनिर्भर भारत के अनुरूप अपनाई गई रणनीति, नीतिगत दूरदर्शिता और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का परिणाम है। चाहे कोविड-19 संकट के दौरान पीपीई उत्पादन को बढ़ाना हो, स्वदेशी सुरक्षात्मक गियर के साथ सशस्त्र बलों को सुसज्जित करना हो या ऑपरेशन सिंदूर जैसी कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण सामग्रियों की आपूर्ति करना हो, तकनीकी वस्त्रों ने राष्ट्रीय तैयारियों और औद्योगिक प्रगति के कारक के रूप में अपनी भूमिका का प्रदर्शन किया है।श्रेष्ठ से रणनीतिक तक: नीतिगत अनिवार्यताराष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (एनटीटीएम) की समीक्षा बैठक के दौरान एक महत्वपूर्ण क्षण तब आया, जब मुझे इसरो के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. एस. सोमनाथ से बातचीत करने का अवसर मिला। उन्होंने कार्बन फाइबर, अल्ट्रा-हाई मॉलिक्यूलर वेट पॉलीइथिलीन (UHMWPE) और नायलॉन 66 जैसे उच्च प्रदर्शन वाले एयरोस्पेस अनुप्रयोगों के लिए आवश्यक सामग्री की बढ़ती आवश्यकता को रेखांकित किया। उनका संदेश स्पष्ट था: भारत को इस क्षेत्र में दूसरों पर निर्भरता को कम करने के लिए और हमारी वैज्ञानिक उन्नति के अगले स्तर के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए इन क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमताओं का निर्माण करना चाहिए। इस बातचीत के दौरान प्रयोगशालाओं से लेकर लॉन्चपैड तक भारत की विकास गाथा में तकनीकी वस्त्रों के रणनीतिक महत्व को भी रेखांकित किया गया।लैब से लेकर लॉन्चपैड व युद्ध के मैदान तकरक्षा क्षेत्र ने भी इस परिवर्तन के रणनीतिक मूल्य को महसूस करना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए हाल ही में हमारे सशस्त्र बलों द्वारा संचालित ऑपरेशन सिंदूर को लें, जहां सुरक्षात्मक कपड़ों और बैलिस्टिक गियर से लेकर छलावरण वाले कपड़ों और रासायनिक-जैविक सुरक्षा सूट तक तकनीकी वस्त्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चूंकि हमने घरेलू क्षमता निर्माण में जल्दी निवेश करना शुरू कर दिया था, इसलिए आज हम अपने रक्षा क्षेत्र को न केवल जनशक्ति के साथ, बल्कि वैश्विक मानकों को पूरा करने वाली सामग्री के साथ मदद पहुंचाने में सक्षम हैं, जिसे भारतीय धरती पर विकसित और निर्मित किया गया है।तकनीकी वस्त्रों को समझेंतकनीकी वस्त्र वे विशेष प्रकार के कपड़े होते हैं, जो सौंदर्य की बजाय कार्यक्षमता के लिए बनाए जाते हैं जिन्हें अक्सर जीवन रक्षक या महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के तहत कार्य करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इनमें बुलेट-प्रतिरोधी जैकेट, अग्निरोधी वर्दी, सर्जिकल गाउन, किसानों के लिए एंटी-बैक्टीरियल शीट, सड़क-सुदृढ़ीकरण जियो-ग्रिड और बहुत कुछ शामिल हैं। यह क्षेत्र जियोटेक, मेडिटेक, प्रोटेक, एग्रोटेक और बिल्डटेक सहित 12 प्रमुख खंडों में फैला हुआ है। 2024 तक, भारत के तकनीकी वस्त्र बाजार का मूल्य 26 बिलियन अमरीकी डॉलर था। हम 2030 तक 40-45 बिलियन अमरीकी डॉलर को छूने की राह पर हैं, जो 10-12 प्रतिशत की आकर्षक वार्षिक दर से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर तकनीकी वस्त्र, कुल कपड़ा उत्पादन का लगभग 27 प्रतिशत है जबकि भारत में यह आंकड़ा केवल 11 प्रतिशत है। हालांकि सही दिशा में प्रयास करने से हम इस अंतर को तेज़ी से कम कर रहे हैं।विकास को गति देने के लिए प्रमुख सरकारी पहलइस क्षेत्र की वास्तविक क्षमता को उजागर करने के लिए, भारत सरकार ने दो प्रमुख पहलों- राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (एनटीटीएम) और वस्त्रों के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के माध्यम से कुल 12,000 करोड़ रुपए का परिव्यय किया है। ये कार्यक्रम अलग-अलग काम करने के बजाय, साथ मिलकर, भारत को तकनीकी वस्त्रों के एक वैश्विक केंद्र के रूप में बदल रहे हैं। एनटीटीएम के तहत, हम अनुसंधान और नवाचार में केंद्रित निवेश को बढ़ावा दे रहे हैं। 510 करोड़ रुपए की सरकारी मदद के साथ कुल 168 उच्च-प्रभाव वाली परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें से कई पहले ही प्रयोगशाला से बाजार में आ चुकी हैं जिनमें फायर एंट्री सूट का विकास और भू-वस्त्रों के लिए परिपत्र बुनाई तकनीक शामिल हैं।एनटीटीएम: नवाचार को बढ़ावा देना और कौशल प्रदान करनाआत्मनिर्भरता के दृष्टिकोण से प्रेरित, राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन नवाचार और कौशल विकास के लिए मजबूत नींव रख रहा है। वहीं 17 स्टार्टअप को ग्रेट (तकनीकी वस्त्रों में महत्वाकांक्षी नवप्रवर्तकों के लिए अनुसंधान और उद्यमिता के लिए अनुदान) योजना के तहत सहायता मिली है। 2,000 से अधिक छात्र 41 शीर्ष संस्थानों में तकनीकी वस्त्र पाठ्यक्रम कर रहे हैं जो 16 उद्योग-आधारित कौशल मॉड्यूल द्वारा समर्थित हैं और भविष्य के लिए तैयार कार्यबल को आकार दे रहे हैं।मांग पैदा करना, वैश्विक उपस्थिति को बढ़ावा देनामुख्य स्तंभ के रूप में बाजार विकास के साथ, एनटीटीएम घरेलू स्तर पर अपनाने के साथ-साथ वैश्विक पहुंच का भी विस्तार कर रहा है। स्वास्थ्य सेवा, कृषि, बुनियादी ढांचे और रक्षा जैसे क्षेत्रों में 73 तकनीकी वस्त्र सामग्रियों के अनिवार्य उपयोग ने उन्हें सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में एकीकृत किया है। भारत टेक्स 2025 सहित 30 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों ने भारत की स्थिति को मजबूती दी है। इस बीच, कुल मिलाकर मानव निर्मित कपड़ा निर्यात 2020-21 में 4.2 बिलियन अमरीकी डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 5.3 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गया। वहीं आयात में कमी से बढ़ती आत्मनिर्भरता और प्रतिस्पर्धात्मकता का संकेत मिलता है।प्रदर्शन को नीति से जोड़ना: पीएलआई ढांचानिजी क्षेत्र में, प्रदर्शन को पुरस्कृत किया जाता है। जो लोग लक्ष्य से अधिक प्रदर्शन करते हैं, उन्हें आगे बढ़ने और देश के रोजगार परिदृश्य को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यही सिद्धांत अब उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के माध्यम से हमारी औद्योगिक नीति को दर्शाता है। यानी प्रोत्साहन अब सब्सिडी नहीं, बल्कि प्रदर्शन से जुड़े पुरस्कार हैं। भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए, विनिर्माण को एक मिशन की तरह माना जाना चाहिए, जिसमें स्पष्ट मीट्रिक, वाणिज्यिक व्यवहार्यता और विकासोन्मुख मानसिकता हो।एनटीटीएम और पीएलआई साथ मिलकर एक दोहरे इंजन का काम करते हैं: जहां एनटीटीएम अनुसंधान, शिक्षा और कौशल विकास के माध्यम से नींव रखता है, पीएलआई योजना विकास को गति दे रही है। योजना के तहत चयनित 80 कंपनियों में से आधे से अधिक (ठीक 56.75 प्रतिशत) तकनीकी वस्त्र के क्षेत्र में काम कर रही हैं। यह उद्योग के आत्मविश्वास का एक मजबूत संकेतक है। इस समर्थन की बदौलत, हमने 7,343 करोड़ रुपए का नया निवेश देखा है जिससे 4,648 करोड़ रुपए का प्रभावशाली कारोबार और 538 करोड़ रुपए का निर्यात हुआ है। सुचारू कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, कपड़ा मंत्रालय ने सक्रिय कदम उठाए हैं। हमने तीन मौकों यानी जून 2023, अक्टूबर 2024 और फरवरी 2025 पर तकनीकी वस्त्रों के लिए एचएसएन कोड जारी किए और सीमा शुल्क और अनुपालन को स्पष्ट करने के लिए अक्सर पूछे जाने वाले सवाल भी जारी किए। फरवरी 2025 में हुए एक महत्वपूर्ण संशोधन के कारण कुल 54 करोड़ रुपए का प्रोत्साहन संवितरण समय से पहले संभव हुआ।हमारी महत्वाकांक्षाएं, घरेलू सीमाओं से कहीं आगे तक फैली हुई हैं। इन क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देकर, यह योजना भारत को चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे अग्रणी वैश्विक कपड़ा निर्यातकों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए रणनीतिक रूप से तैयार कर रही है।अब तक का प्रभावहमारी संयुक्त पहलों का असर पहले से ही दिखाई दे रहा है। तकनीकी वस्त्रों के लिए भारत का घरेलू बाजार 10 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2024-25 में निर्यात 2.9 बिलियन अमरीकी डॉलर रहा। मार्च 2025 तक, हमने 5,218 करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है और 8,500 से अधिक लोगों के लिए रोजगार सृजित किया है। अकेले तकनीकी वस्त्रों ने 3,242 करोड़ रुपए का कारोबार किया है जिसमें 217 करोड़ रुपए का निर्यात शामिल है। ये आंकड़े सिर्फ संख्याएं नहीं हैं, यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी रणनीति काम कर रही है।सतत् और आत्मनिर्भर भविष्य की ओरस्थिरता और चक्रीयता भारत की तकनीकी वस्त्र रणनीति के केंद्र में हैं। जूट, भांग, रेमी, कपास, रेशम और यहां तक कि मिल्कवीड जैसे प्राकृतिक रेशों को उच्च-प्रदर्शन अनुप्रयोगों के लिए फिर से तैयार किया जा रहा है, जो पर्यावरण को लाभ पहुंचाते हुए हमारे किसानों और उद्योगों को सशक्त बना रहे हैं। प्रकृति-आधारित समाधान, शक्तिशाली उपाय के रूप में उभर रहे हैं जो पारंपरिक रेशों के साथ नवाचार को मिलाते हैं। उदाहरण के लिए, कश्मीरी पश्मीना से निकलने वाले कचरे का उपयोग अब इंसुलेशन बनाने में किया जाता है, कपास और रेशम का उपयोग घाव की ड्रेसिंग और ऊतक इंजीनियरिंग में किया जा रहा है और रेशम का उपयोग 3डी प्रिंटिंग में किया जा रहा है। जूट बायोडिग्रेडेबल मेडिकल इम्प्लांट, ऑटोमोबाइल के लिए हल्के कंपोजिट फाइबर, पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री और टिकाऊ फर्नीचर बनाने में सक्षम है। साथ ही, हम घरेलू मशीनरी विनिर्माण को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसके तहत 68,000 करोड़ रुपए मूल्य के सामान के उत्पादन के लिए 25 परियोजनाएं चल रही हैं। इनसे निर्यात में 6,700 करोड़ रुपए का योगदान मिलने की उम्मीद है जो वास्तव में आत्मनिर्भर और टिकाऊ औद्योगिक भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रहा है। केंद्रीय कपड़ा मंत्री के रूप में, मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि भारत न केवल वैश्विक तकनीकी वस्त्र आंदोलन में भाग ले रहा है, हम इसका नेतृत्व करने के लिए खुद को तैयार भी कर रहे हैं। एनटीटीएम और पीएलआई की संयुक्त शक्ति के साथ, हम नवाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, रोजगार पैदा कर रहे हैं, निर्यात को मजबूत कर रहे हैं और राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती ला रहे हैं। हमारे रक्षा और कृषि क्षेत्रों को मदद देने से लेकर बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण तक, तकनीकी वस्त्र भारत के लिए एक नई औद्योगिक पहचान को आकार दे रहे हैं और यह केवल एक शुरुआत है।
- आलेख- डॉ. मनसुख मांडविया, केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री, युवा मामले और खेल मंत्रीवर्ष 2047 तक विकसित भारत बनने की दिशा में हमारी यात्रा अनवरत जारी है, और इस दृष्टि योजना के सबसे प्रभावकारी शक्तियों में भारतीय खेलों का उदय भी शामिल है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारतीय खेल, वैश्विक मंच पर नित नई ऊंचाईयां छू रहा है। जमीनी स्तर से लेकर विश्व विजेता मंच तक, प्रधानमंत्री की भविष्यदृष्टि ने खेलों के प्रति भारत के दृष्टिकोण को बदल कर रख दिया है। इससे विश्व स्तरीय सहायता, अत्या धुनिक सुविधाएं तथा प्रतिभा और कड़ी मेहनत को पुरस्कृत करने की पारदर्शी प्रणाली सुनिश्चित हुई है।हाल में, भारतीय एथलीटों ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपने असाधारण प्रदर्शनों से देश को गौरवान्वित किया है। दक्षिण कोरिया के गुमी में एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2025 या मंगोलिया के उलानबटार में चौथी विश्व कुश्ती रैंकिंग श्रृंखला हो, हमारे खिलाडि़यों ने धैर्य और गौरव के साथ दमदार प्रदर्शन किया। एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में, भारतीय दल ने शानदार प्रदर्शन कर 24 पदक हासिल किए और इस दौरान कई राष्ट्रीय रिकॉर्ड भी ध्वशस्तर कर दिए।इसी दौरान हमारी महिला पहलवानों ने इतिहास रच दिया। मंगोलिया से वे रिकॉर्ड 21 पदक जीतकर लौटीं जो विश्व कुश्ती रैंकिंग श्रृंखला में उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा। पर यह सफलता रातोंरात नहीं मिली है। इससे पहले, भारत ने पूर्व के 23 आयोजनों (आजादी से पहले सहित) में केवल 26 ओलंपिक पदक जीते थे। जबकि 2016, 2020 और 2024 के पिछले तीन आयोजनों में ही भारत ने 15 पदक जीते हैं। पैरालिंपिक खेलों में प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। 1968 से 2012 के बीच कुल 8 पदक जीतने वाले भारत ने पिछले तीन आयोजनों में 52 पदक हासिल किए हैं, जिसमें पेरिस 2024 में जीते गए रिकॉर्ड 29 पदक शामिल हैं।ये उपलब्धियां कोई संयोग नहीं हैं। ये पिछले ग्यारह वर्षों में तैयार किए गए प्रदर्शन-संचालित पारिस्थितिकी तंत्र का सुखद परिणाम हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट और केंद्रित दृष्टिकोण है कि प्रत्येक एथलीट, चाहे उसकी पृष्ठभूमि कुछ भी हो उसे विश्व स्तरीय प्रशिक्षण, ढांचागत सुविधा, वित्तीय सहायता, एथलीट-केंद्रित सुशासन और आगे बढ़ने के लिए पारदर्शी प्रणाली की पहुंच मिलनी चाहिए। वर्ष 2014 से मोदी सरकार ने परिवर्तनकारी बदलाव से मजबूत नींव रखकर भारतीय खेलों के परिदृश्य को नया रूप दे दिया है।इन सुधारों के केंद्र में शीर्ष एथलीटों की पहचान करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए 2014 में आरंभ की गई टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना-टॉप्सक (टीओपीएस) शामिल है। 75 एथलीटों के साथ आरंभ हुई यह योजना अब लॉस एंजिल्स 2028 ओलंपिक आयोजन के लिए 213 खिलाड़ियों को सहयोग देने के साथ व्याीपक हो गई है। इसमें 52 पैरा-एथलीट और विकास श्रेणी के 112 एथलीट शामिल हैं। उन खेल संवर्गों में एथलीटों को मदद देने की नई योजनाएं भी आरंभ की गई हैं, जिन पर पारंपरिक रूप से कम ध्यान जाता है। इस वर्ष आरंभ किया गया लक्ष्य एशियाई खेल समूह (द टार्गेट एशियन गेम्सा ग्रुप-टीएजीजी) तलवारबाजी, साइकिलिंग, घुड़सवारी, नौकायन, कयाकिंग और कैनोइंग, जूडो, ताइक्वांडो, टेनिस, टेबल टेनिस और वुशू जैसे 10 खेलों में 40 पदक संभावनाएं बढ़ाता है।खिलाडि़यों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के प्रयासों में दूरदर्शिता के साथ-साथ वित्तीय प्रतिबद्धता भी महत्वापूर्ण है। युवा कार्यक्रम और खेल मंत्रालय का बजट पिछले दशक में तीन गुना से अधिक हो गया है और यह 2013-14 के महज 1,219 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 3,794 करोड़ रुपये पहुंच गया है। जमीनी स्तर पर बुनियादी खेल ढांचा विकसित करने और वर्ष भर प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के उद्देश्यख से 2017 में आरंभ की गई खेलो इंडिया योजना का बजट इस वर्ष बढ़कर 1,000 करोड़ रुपये हो गया है। इन निवेशों से खेल प्रतिभाएं पोषित हो रही हैं और युवा एथलीटों के लिए एक जीवंत प्रतिस्पर्धी पारिस्थितिकी तंत्र निर्मित हो रहा है।राष्ट्रीय खेल महासंघों को भी अभूतपूर्व व्याजपक समर्थन मिला है। अंतर्राष्ट्रीय आयोजन और राष्ट्रीय चैंपियनशिप आयोजित करने के लिए उन्हेंर दी जाने वाली वित्तीय सहायता लगभग दोगुनी हो गई है। खेल प्रशिक्षकों-कोच को दी जाने वाली राशि में 50 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। उच्च प्रदर्शन प्रशिक्षण की बढ़ती आवश्यमकता को देखते हुए एथलीटों के खुराक भत्ते में बढ़ोतरी की गई है।ऐसे केंद्रित प्रयास भारत को अपनी पदक क्षमता में विविधता लाने और विभिन्नह खेलों में उत्कृरष्टकता हासिल करने में सहायक बन रहे हैं।पारदर्शिता पर जोर इस दिशा में किए गए सबसे प्रभावशाली सुधारों में एक है। सभी महासंघों को अब चयन प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग और प्रमुख आयोजनों के लिए चयन मानदंड दो साल पहले ही निर्धारित करना आवश्य क बनाया गया है। इससे निष्पक्षता के साथ ही एथलीटों में विश्वास बढ़ता है और यह व्यावस्थाण को योग्यता आधारित बनाती है। एथलीट-केंद्रित सुधार निश्चित रूप से हाल की खेल नीति निर्माण में उल्ले।खनीय रहे हैं। खेल प्रमाणपत्र अब डिजिलॉकर द्वारा जारी किए जाते हैं जो राष्ट्रीय खेल रिपोजिटरी प्रणाली से जुड़े होते हैं। इससे एथलीटों को सुरक्षित और हेराफेरी से मुक्ता डेटा रिकॉर्ड सुनिश्चित होता है। राष्ट्री य खेल नीति 2024 और राष्ट्रीेय खेल प्रशासन विधेयक के मसौदे का कार्य अभी अपने अंतिम चरण में है। इनका उद्देश्य खेल पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना और खिलाडि़यों के कल्याण को नीति निर्धारण के केंद्र में लाना है। आयु संबंधी धोखाधड़ी से अब नई मेडिकल जांच और सख्त दंड के प्रावधानों द्वारा निपटा जा रहा है। इनके बेहतर अनुपालन और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए खेल संघों को सत्यनिष्ठा अधिकारी नियुक्त करने की भी आवश्यकता है।ओलंपिक खेलों के अलावा, मल्लखंब, कलारीपयट्टू, योगासन, गतका और थांग-ता जैसे पारंपरिक भारतीय खेलों को खेलो इंडिया गेम्स द्वारा पुनर्जीवित और बढ़ावा दिया जा रहा है। कबड्डी और खो-खो जैसे स्वदेशी खेलों को अब अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल रही है, जो भारत की समृद्ध खेल विरासत को दर्शाते हैं।खेल के क्षेत्र में लैंगिक समानता के प्रयास भी उल्लेेखनीय हैं। खेलों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरंभ की गई एएसएमआईटीए-अस्मियता लीग (महिलाओं को प्रेरित कर खेल उपलब्धि हासिल करना) को तेजी से विस्तारित किया गया है। वर्ष 2021-22 में जहां केवल 840 महिला एथलीट खेलों में सक्रिय थीं वहीं, 2024-25 में 26 खेल संवर्गों में 60,000 से अधिक महिला खिलाडि़यों ने भाग लिया। अस्मिता लीग इन एथलीटों को खेलो इंडिया से जोड़कर प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा के अवसर प्रदान करती है।पिछले 11 वर्षों में भारत के खेल बुनियादी ढांचे में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। वर्ष 2014 के 38 खेल बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से व्यातपक होकर अब यह संख्या बढ़कर 350 पहुंच गई है। भारतीय खेल प्राधिकरण अभी 23 राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र संचालित कर रहा है जिनमें टॉप्स और खेलो इंडिया के तहत शीर्ष एथलीटों को प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके अलावा, 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 34 राज्य स्त रीय उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं। साथ ही 757 जिलों में 1,048 खेलो इंडिया केंद्र भी स्थापित किए गए हैं जो खेल प्रतिभाओं को जमीनी स्तर पर खोजने और उन्हेंक पोषित-प्रशिक्षित करते हैं।खेलो इंडिया गेम्स अब एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया है। अब तक इसके उन्नीस संस्करण आयोजित हुए हैं - जिनमें युवा, विश्वविद्यालय, पैरा, शीतकालीन और बीच गेम्स शामिल हैं - जिनमें 56,000 से अधिक एथलीट भाग लेते हैं। विशेष रूप से, खेलो इंडिया पैरा गेम्स परिवर्तनकारी रहे हैं जिनके कई एथलीट पैरालिंपिक में पदक जीत चुके हैं। भारत, भविष्य में 2030 राष्ट्रमंडल खेलों और 2036 के ओलंपिक खेलों की मेजबानी की दावेदारी की तैयारी कर रहा है। इसके लिए खेलो इंडिया के तहत स्कूल गेम्स, ट्राइबल गेम्स, नॉर्थईस्ट गेम्स, वाटर गेम्स, मार्शल आर्ट्स गेम्स और स्वदेशी गेम्स जैसे नए क्षेत्रों में खेल आरंभ किए जा रहे हैं ताकि साल भर प्रतिस्पर्धा और प्रतिभा की खोज सुनिश्चित हो सके। आगामी खेलो इंडिया स्कूल गेम्स कम आयु में ही एथलीटों की पहचान और उन्हें प्रशिक्षित कर खेल पारिस्थितिकी तंत्र में नई प्रतिभा को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।सिर्फ खेल ही नहीं, फिटनेस के प्रति सामुदायिक भागीदारी के उद्देश्यह से दिसंबर 2024 में आरंभ किए गए फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल अभियान ने भी गति पकड़ ली है। सिर्फ 150 प्रतिभागियों के साथ आरंभ हुआ यह अभियान अब 10,000 स्था नों पर विस्तागरित हो गया है जिसमें साढ़े तीन लाख से अधिक लोग सक्रियता से भाग ले रहे हैं। एक जून को आयोजित 25वें संस्करण में इसे सशस्त्र बलों को श्रद्धांजलि देने और विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर तिरंगा रैली के रूप में मनाया गया। रैली में जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के जिलों सहित 5,000 स्थानों से 75,000 से अधिक लोग शामिल हुए।इन साप्ताहिक कार्यक्रमों में फिटनेस का संदेश प्रचारित करने के लिए डॉक्टर, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक सहित विभिन्न समूह शामिल होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को सही सिद्ध करते हुए फिट इंडिया मूवमेंट देश के हर घर तक फिटनेस का संदेश पहुंचा रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भविष्यस दृष्टि योजना है कि जब हम 2036 में ओलंपिक खेलों की मेजबानी करें तो भारत खेलों में शीर्ष 10 देशों में शामिल हो और 2047 में आजादी के सौ वर्ष पूरे होने तक शीर्ष 5 देशों में शामिल हो जाए। इस दृष्टि योजना को पूरा करने के लिए काफी कुछ किया गया है, लेकिन अभी भी बहुत हासिल करना बाकी है। मजबूत आधार के लिए, शासन में प्रमुख सुधार लागू किए गए हैं, जो देश में खेलों के विकास के लिए अहम हैं। आज भारत की खेल क्रांति दृष्टि, संकल्प और समावेशी विकास की गाथा है। इस परिवर्तन के केंद्र में हमारे युवा हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गतिशील नेतृत्व में भारत एक वैश्विक खेल महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। पदकों की लगातार बढ़ती संख्या् से लेकर जीतने की मानसिकता तक में भारी बदलाव दिख रहा है। विकसित भारत की ओर दृढ़ता से बढ़ते हमारे कदम - खेल भावना से संचालित हैं।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)पिता...जो कभी न थकते हैं,बच्चों की खुशी में सुख पाते,अपनी तकलीफें भूल जाते,दिन -रात मेहनत करते हैं ।परिवार के लिये खटते ,सारा सुख दूसरों के लिये ,अपने बारे में कब सोचते हैं ।कब से देख रही हूँ ...पिता की फ़टी बनियान..चप्पल भी घिसते तक पहनते हैं ।पर ,अभी तो यह चलेगी ,बच्चों की फीस भरनी है ,मकान की छत सुधरवानी है ,भाई का ऑपरेशन है ,सब की जरूरतें पहले,कहकर अपने खर्च टालते हैं ।वो कभी नहीं कहते ,उन्हें क्या खाना पसंद है ,वो कभी बताते ही नहीं कि,उन्हें दिलीप कुमार की फिल्मेंअच्छी लगती थी कभी ...गाने सुनना कितना पसन्द था,पर कभी समय ही नहीं मिला किबैठकर सुनें कभी इत्मीनान से ।वो अपनी खुशी ...सबके चेहरों में तलाश करते हैं ।बीत गया उनका जीवन ..सबकी ख्वाहिशें पूरी करते ,कभी फुर्सत ही नही मिली ..कि सोचें उनकी भी कोई चाहत है।जिम्मेदारियों के निर्वहन में ही,सच्ची राहत महसूस करते हैं ।क्या सारे पिता ऐसे ही होते हैं ।
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15 जून फादर्स डे पर विशेष
हर बच्चे की जिंदगी में माता-पिता का बहुत ही गहरा महत्व होता है। जहां मां अपने प्यार और दुलार से बच्चे को संवारती हैं तो वहीं पिता भी अपनी संतान की अच्छी परवरिश के लिए टायरलेस एफ्फोर्ट्स करते हैं और कई चीजों का त्याग करते हैं। क्या कभी हमने पिता होने के उस इनर एक्सपीरियंस पर गहराई से गौर किया है?
वो फीलिंग्स, वो स्ट्रगल और वो अनटोल्ड स्टोरीज जो एक पुरुष के पिता बनने के सफर को डिफाइन करती हैं। तो ऐसे में फादर्स डे एक ऐसा विशेष अवसर है जब हम अपने पिता के इन बलिदानों और योगदानों को तहे दिल से थैंक यू कहते हैं।
यह दिन हमें उन अनमोल पलों को याद करने और सम्मान देने का मौका देता है जो पिता अपने बच्चों के लिए जीते हैं। इस साल फादर्स डे 15 जून, 2025 को मनाया जाएगा। तो आइए, इस फादर्स डे पर सिर्फ पिता पर केंद्रित होकर कुछ ऐसे ही पहलुओं पर बात करें, जो शायद ही कभी चर्चा में आते हैं।
कैसे शुरू हुआ फादर्स डे का प्रचलन--
पिता को सम्मान देने और उनके दिल से शुक्रिया कहने के लिए फादर्स डे जैसे खास दिन की शुरुआत अमेरिका से हुई। 1909 में एक अमेरिकी महिला, सोनोरा स्मार्ट डोड ने यह सुझाव दिया कि जैसे मां के लिए मदर्स डे मनाया जाता है, ठीक उसी तरह पिता के लिए भी फादर्स डे मनाया जाना चाहिए।
सोनोरा के पिता एक अमेरिकी सैनिक थे जो सिविल वॉर का हिस्सा रहे थे। उनकी पत्नी की दुखद मृत्यु के बाद, उन्होंने अकेले ही अपने 6 बच्चों की परवरिश की। सोनोरा अपने पिता के इस असाधारण समर्पण और बलिदान के लिए उन्हें सम्मान देना चाहती थीं। उन्होंने इस विचार को रियलिटी में बदलने के लिए अथक प्रयास किए और लोगों का समर्थन जुटाया।
यह उनके लिए किसी जंग से कम नहीं था, लेकिन उनकी स्ट्रांग विल और लव ने उन्हें सफलता दिलाई। आखिरकार, वाशिंगटन में 19 जून, 1910 को पहली बार फादर्स डे मनाया गया।
इस दिन को ऑफिसियल मान्यता मिलने में कई साल लगे और फाइनली 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे ऑफिसियल तौर पर नेशनल हॉली डे घोषित किया। भारत में भी फादर्स डे जून के तीसरे रविवार को ही मनाया जाता है।
एक पुरुष से पिता तक का सफर--
एक पुरुष का पिता बनना सिर्फ बायोलॉजिकल प्रोसेस नहीं है, बल्कि यह एक गहरा इमोशनल और मेन्टल ट्रांसफॉर्मेशन है। जिस पल एक पिता को पता चलता है कि वह पिता बनने वाला है, उसके जीवन में एक इनविजिबल चेंज शुरू हो जाता है। अचानक, उसके भविष्य की कल्पनाओं में एक नया चेहरा शामिल हो जाता है और उसकी प्रिऑरिटीज का ऑर्डर बदल जाता है।
यह परिवर्तन अक्सर धीरे-धीरे होता है जैसे बच्चे के पहले अल्ट्रासाउंड से लेकर उसकी पहली किलकारी सुनने तक। इस समय वह अपनी खुशियों, चिंताओं और नई जिम्मेदारियों को अंदर ही अंदर महसूस करता है।
वह खुद को एक गार्डियन के रूप में देखना शुरू करता है, जिसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी अब अपने बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करना है। यह एक पुरुष से पिता बनने का आंतरिक सफर है, जो बाहरी दुनिया को अक्सर दिखाई नहीं देता।
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-नसीम अहमद खान, जनसंपर्क
छत्तीसगढ़ राज्य अब केवल खनिज और कृषि प्रधान राज्य नहीं रह गया है, बल्कि तकनीकी नवाचार और रणनीतिक उद्योगों का नया गढ़ बनकर उभरने की दिशा में अग्रसर है। इस परिवर्तन की आधारशिला मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में रखी गई है, जिन्होंने न केवल राज्य की औद्योगिक नीतियों को समकालीन और रोजगारोन्मुख बनाया, बल्कि रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश को आकर्षित करने के लिए ऐतिहासिक निर्णय लिए हैं।मुख्यमंत्री श्री साय की अध्यक्षता में हाल ही में आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में इन उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्रों के लिए पृथक औद्योगिक प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की गई। यह पैकेज न केवल इन क्षेत्रों में निवेश को आकर्षित करेगा, बल्कि राज्य के युवाओं के लिए सेवा और रोजगार के अवसरों के नए द्वार भी खोलेगा।छत्तीसगढ़ औद्योगिक विकास नीति 2024-30 के अंतर्गत तैयार किया गया यह विशेष पैकेज अत्याधुनिक उद्योगों की स्थापना और विस्तार को प्रोत्साहन देने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से जुड़े उद्यमों को स्थायी पूंजी निवेश के आधार पर 100 प्रतिशत तक की एसजीएसटी प्रतिपूर्ति या वैकल्पिक रूप से पूंजी अनुदान की सुविधा दी जाएगी। 50 करोड़ से लेकर 500 करोड़ से अधिक के निवेश करने वाली इकाइयों के लिए 35 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी, जिसकी अधिकतम सीमा 300 करोड़ रुपये तक तय की गई है। इसके साथ ही, निवेशकों को ब्याज अनुदान, विद्युत शुल्क में छूट, स्टाम्प और पंजीयन शुल्क में रियायतें, भूमि उपयोग परिवर्तन शुल्क में छूट, रोजगार सृजन पर आधारित प्रोत्साहन, ईपीएफ प्रतिपूर्ति और प्रशिक्षण अनुदान जैसी सुविधाएं भी दी जाएंगी।इस नीति का सबसे प्रभावशाली पहलू यह है कि इसमें स्थानीय युवाओं के लिए स्थायी रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी गई है। जो उद्योग छत्तीसगढ़ के निवासियों को पहली बार रोजगार देंगे, उन्हें दिए गए वेतन का 20 प्रतिशत तक अनुदान भी मिलेगा। यह राज्य सरकार की उस सोच का परिणाम है, जिसमें ‘विकास’ केवल आंकड़ों तक सीमित न रहकर आम जनता के जीवनस्तर में वास्तविक सुधार का माध्यम बने।रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास की स्थापना पर व्यय का 20 प्रतिशत तक अनुदान, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना पर पूंजी निवेश अनुदान तथा ड्रोन प्रशिक्षण केंद्रों के लिए विशेष सहायता जैसी व्यवस्थाएं राज्य को प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और अग्रणी बनाएंगी। जो इकाइयां 1000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करेंगी या 1000 से अधिक लोगों को रोजगार देंगी, उन्हें अतिरिक्त औद्योगिक प्रोत्साहन भी मिलेगा। इससे वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर की बड़ी कंपनियों को राज्य में निवेश हेतु प्रोत्साहन मिलेगा।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का मानना है कि छत्तीसगढ़ में औद्योगिक निवेश के नए अवसरों के साथ ही रोजगार, तकनीकी शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार का एक समेकित पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया जाए। छत्तीसगढ़ का युवा केवल नौकरी खोजने वाला न बने, बल्कि नौकरी देने वाला भी बने। यह औद्योगिक नीति मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे राष्ट्रीय अभियानों के अनुरूप राज्य को नई पहचान दिलाने की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। छत्तीसगढ़ अब पारंपरिक उद्योगों से आगे बढ़ते हुए रक्षा और एयरोस्पेस जैसे उच्च तकनीक क्षेत्रों में निवेश का गंतव्य बनता जा रहा है। यह न केवल राज्य की आर्थिक समृद्धि को गति देगा, बल्कि छत्तीसगढ़ के युवाओं को सपनों की नई ऊंचाई तक ले जाने का मार्ग भी खोलेगा।















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