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बड़े विचारों के महान व्यक्ति थे नाना साहब गोरेः रमेश बैस

 -  महाराष्ट्र मंडल में भानूराव (नाना) गोरे की जन्म शताब्दी पर डाक विभाग ने जारी किया विशेष आवरण
 - बैस के साथ महापौर मीनल चौबे, डाक विभाग के हरीश महावर ने नाना गोरे स्मरण पत्रिका का भी किया विमोचन
 रायपुर। नाना गोरे का व्यक्तित्व हमें बताता है कि जहां भी जाओ, वहीं के होकर रह जाओ। यही ब्रह्म वाक्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सरसंघचालक केशव बलीराम हेडगेवार ने भी महाराष्ट्र मंडल के पांचवें स्थापना दिवस पर कहे थे। मुख्य अतिथि की आसंदी से इस आशय के विचार पूर्व राज्यपाल रमेश बैस ने कहे। अवसर था महाराष्ट्र मंडल के संत ज्ञानेश्वर सभागृह में भानूराव (नाना साहब) गोरे के जन्म शताब्दी समारोह का। इस अवसर पर नाना साहब के जन्म शताब्दी वर्ष पर भारतीय डाक विभाग छत्तीसगढ़ परिमंडल की ओर से नाना साहब पर विशेष आवरण का लोकार्पण और स्मरण पत्रिका का विमोचन रमेश बैस, विशेष अतिथि महापौर मीनल चौबे, डाक विभाग के वरिष्ठ अधिकारी हरीश महावर ने किया। 
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रमेश बैस ने कहा कि नाना साहब गोरे और उनका परिवार रायपुर में अपने सेवाभावी कार्यों के साथ ऐसा रच बस गया कि आज भी उनके कार्यों को याद किया जाता है। पेशे से सेल्समैन नाना साहब जिससे भी मिलते, उसी के होकर रह जाते और उन्हें कभी नहीं भूलते थे। आरएसएस, बाल समाज, वनवासी कल्याण आश्रम से लेकर महाराष्ट्र मंडल तक उनके किये कार्यों को आज भी याद किया जाता है। 
बैस ने पुरानी याद का स्मरण करते हुए बताया कि सन् 1964 में आरएसएस का एक वर्ग रायपुर में लगा था। जिसमें शामिल होने वाले स्वयंसेवकों को लड्डू परोसने की योजना बनीं। तय हुआ कि रायपुर के स्वयंसेवक अपने घरों से लड्डू बनाकर वर्ग स्थल पर लाएंगे। नाना गोरे ने इस विचार का यह कहकर विरोध किया कि वर्ग में शामिल किसी स्वयंसेवक को मोतीचूर का लड्डू मिलेगा तो किसी को बेसन और सूजी का। इसमें समानता नहीं रहेगी। अच्छा होगा कि वर्ग स्थल पर आकर ही श्रमदान कर एक ही तरह का लड्डू बनाकर परोसा जाए। कहने सुनने को यह विचार छोटा लगे, लेकिन इसमें समानता का विचार बहुत बड़ा है। 
महापौर मीनल चौबे ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि पुराने महान व्यक्तियों को लेकर इस तरह के आयोजन होते रहने चाहिए। इनसे न केवल हम प्रेरित हो, बल्कि अपनी नई पीढ़ी को भी जोड़े। गोरे परिवार के निकटस्थ चंद्रकांत शितूत ने अपने संक्षिप्त संबोधन में बताया कि सिर्फ एक बार उन्होंने नाना गोरे से कहा था कि उन्हें डाक टिकट संग्रहण का शौक है। उसके बाद से नाना साहब जहां भी जाते, उनके लिए देश-विदेश से ढेरों डाक टिकट लाकर घर पहुंचाकर देते थे। 
महाराष्ट्र मंडल के अध्यक्ष अजय मधुकर काले ने कहा कि नाना साहब गोरे 1973-74 में महाराष्ट्र मंडल के कार्यकारिणी के प्रभावी सदस्य हुआ करते थे। जबकि 1974 से 80 तक महाराष्ट्र मंडल के ट्रस्टी के रूप में चौबे कालोनी स्थित मंडल भवन के निर्माण में सुप्रसिद्ध आर्किटेक्ट टीएम घाटे के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 
25 से 40 की उम्र अतिरिक्त योग्यता बढ़ाने की
नाना गोरे के सुपुत्र आशीष गोरे ने अपने संबोधन में कहा कि उनके पिता कहा करते थे कि इंसान की 15 से 24 वर्ष की आयु स्वयं के स्कील डेवलपमेंट की होती है, जबकि 25 से 40 वर्ष की आयु में उसे अपने स्कील को बहुआयामी बनाने यानी अतिरिक्त योग्यता हासिल करने की होती है। पिता की इस सीख के आधार पर ही उन्होंने छह साल चीन में और चार-चार साल जापान और सिंगापुर में नौकरी की और अपनी स्कील को बहुआयामी बनाया। आशीष ने बताया कि जब वे आठवीं कक्षा में थे और उनके घर पर जनसंघ के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी ठहरे हुए थे। उन्होंने अपने आटोग्राफ संकलन की डायरी उनकी ओर बढ़ाई। अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी में आटोग्राफ देखकर वे आश्चर्यचकित हुए और पूछा हिंदी में हस्ताक्षर क्यों? वाजपेयी ने कहा कि यह हमारी भाषा है। तब से लेकर आज तक आशीष गोरे विभिन्न कार्पोरेट सेक्टर में क्लास वन अफसर के पदों पर कार्य करते हुए हिंदी में ही अपने हस्ताक्षर करते हैं। कार्यक्रम का संचालन पल्लवी गोरे और आभार प्रदर्शन नाना गोरे की पुत्री शुभांगी आप्टे ने किया।

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