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 महाराष्ट्र मंडल में शहीद दिवस पर किया गया प्रेरक आयोजन

 - शहीद दिवस पर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के पराक्रम का किया गया स्मरण
 रायपुर। महाराष्ट्र मंडल में सोमवार शाम को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के स्मरण में शहीद दिवस मनाया गया। तीनों वीर बलिदानियों की तस्वीर पर मंडल अध्यक्ष अजय मधुकर काले, सचिव चेतन दंडवते समेत कार्यकारिणी सदस्यों, पदाधिकारियों ने गुलाल लगाकर माल्यार्पण किया। 
इस मौके पर काले ने कहा कि कम उम्र में ही भगत सिंह, श्रीराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर ने असाधारण साहस और भारत की स्वतंत्रता के उद्देश्य के प्रति अटूट निष्ठा का परिचय दिया। तीनों ने दृढ़ विश्वास के साथ बलिदान का मार्ग चुना और राष्ट्र को अपने जीवन से ऊपर रखा। न्याय, देशभक्ति और निडर प्रतिरोध के आदर्श आज भी अनगिनत भारतीयों के मन में प्रेरणा का संचार करते हैं।
सचिव चेतन दंडवते ने आगे कहा कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह के विचार आज भी देशप्रेम और क्रांति की मशाल जलाते हैं। उनके प्रमुख अनमोल वचनों में "वे मेरे शरीर को मार सकते हैं, लेकिन मेरे विचारों को नहीं", "क्रांति की तलवार विचारों के पत्थर पर तेज होती है", "बहरे कानों को सुनाने के लिए, आवाज बहुत तेज होनी चाहिए" प्रमुख हैं। दंडवते ने कहा कि उनके विचार युवाओं के लिए निरंतर प्रेरणास्रोत हैं। फांसी में लटकने से पहले उन्होंने जेल के एक अधिकारी से कहा था, "आप खुशकिस्मत हैं कि आज आप अपनी आंखों से यह देखने का अवसर पा रहे हैं कि भारत के क्रांतिकारी किस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक अपने सर्वोच्च आदर्श के लिए मृत्यु का आलिंगन कर सकते हैं"। भगत सिंह के विचार आज भी क्रांति का संचार करते हैं। 
दिव्‍यांग बा‍लिका विकास गृह के प्रभारी प्रसन्‍न निमोणकर ने कहा कि क्रांतिकारी सुखदेव भी निर्भीक क्रांतिकारी थे। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचएसआर) के एक प्रमुख रणनीतिकार और नेता थे। उन्हें एक कुशल आयोजक माना जाता था, जिन्होंने 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' के तहत क्रांतिकारी गतिविधियों का खाका तैयार किया। 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने की घटना के बाद, सांडर्स हत्याकांड और अन्य क्रांतिकारी गतिविधियों के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। युवा अवस्था में ऐसे क्रांतिकारी आयोजनों की सफलता उनके ओजस्वी विचारों को दर्शाती है। 
मुख्‍य समन्‍वयक श्‍याम सुंदर खंगन ने  कहा कि शिवराम हरि राजगुरु का जीवन विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है। आज के दौर में, जब अक्सर नैतिक साहस की कमी देखी जाती है, तब राजगुरु का साहस युवाओं को अपने सिद्धांतों के लिए खड़े होने के लिए प्रेरित करता है। खंगन ने कहा कि सिर्फ 22 साल की उम्र में उन्होंने फांसी के फंदे को चूम लिया। उनका जीवन यह साबित करता है कि जीवन की सार्थकता उम्र के वर्षों की संख्या में नहीं, बल्कि कार्यों की महानता में है।
इस मौके पर मंडल भवन प्रभारी निरंजन पंडित, संत ज्ञानेश्‍वर स्‍कूल के प्रभारी परितोष डोनगांवकर, फिजियोथैरेपी सेंटर की प्रभारी आस्‍था काले, बाल वाचनालय- उद्यान शंकर नगर की प्रभारी रेणुका पुराणिक, कला संस्‍कृति समिति के प्रभारी अजय पोतदार, वरिष्ठ रंगसाधक अनिल श्रीराम कालेले, वरिष्‍ठ सभासद प्रशांत देशपांडे, अपर्णा कालेले, अतुल गद्रे, संध्‍या खंगन, प्रवीण क्षीरसागर, सुरेखा गद्रे सहित अनेक पदाधिकारियों व सभासदों ने शहीद दिवस पर उपस्थिति दर्ज की।

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