भैयाजी का पद बढ़ा, कद बढ़ा... दिल का दायरा भी बढ़ा
स्मृति शेष : रुप नारायण सिन्हा
--गणेशा जाधव पाटिल, सभासद, महाराष्ट्र मंडल रायपुर
हमारे भैयाजी यानी रुप नारायण सिन्हा अपने विराट व्यक्तित्व के कारण एक युगपुरुष थे। उनके साथ बिताए गए हर एक पल जीवन के अनमोल पल हैं। जिन्होंने अपने पास के किसी भी व्यक्ति को कभी छोटा महसूस नहीं होने दिया। यही भैयाजी का सबसे बड़ा गुण था। ग्राम कुम्हली से कबीर नगर के नए पते से लेकर अंतिम सांस तक, वे सबके लिए ‘भैयाजी’ ही रहे। पद बढ़ा, कद बढ़ा, इसके साथ ही उनके दिल का दायरा और बड़ा होता गया।
प्रचारक, विभाग प्रचारक, विश्व हिंदू परिषद के प्रांत मंत्री जैसे पदों पर काम करने से परे भैयाजी कार्यकर्ता के लिए छत अर्थात आधार थे। धूप में छांव, बारिश में आड़। ओजस्वी और प्रखर वक्ता होते हुए भी उनका असली ओज सामान्य स्वयंसेवक को असामान्य बना देना था। सम्मान देने की विलक्षण कला मंच से 10- 20 कार्यकर्ताओं का नाम लेकर उनका सम्मान बढ़ाना" सहज हृदय की विशालता थी। भैयाजी भली भांति जानते थे कि संगठन का भवन ईंट-गारे से नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं के स्वाभिमान से बनता है।
उनका इतना बड़ा व्यक्तित्व, इतनी विनम्रता, जिज्ञासा व शिष्य से सीखने का भाव ही उन्हें सच्चा गुरु बनाता था। प्रवास पर स्थान का भूगोल, लोग, कार्यकर्ता सहित हर पहलू पर बारीकी से पूछना उनके जमीन से जुडने का प्रणाम था। संस्कारगत दृष्टि से भैयाजी को हम सभी ने अपने माता- पिता की सेवा करते तो देखा होगा लेकिन जब स्वयं की बच्चों से सेवा लेने की बारी आई तो उन्होंने ये अवसर किसी को नहीं दिया। हमेशा दूसरों की चिंता करने वाला यह व्यक्तित्व सबसे बाद में अपने बारे में सोचता था। भैयाजी का जीवन दरअसल तपस्वी का जीवन... नि:स्वार्थ, निष्कपट, पारदर्शी और समर्पित।
योग आयोग और गौ सेवा आयोग के संयुक्त कार्यक्रम में मेरी भैयाजी से अंतिम भेंट हुई। यहां आयोग का अध्यक्ष बनने पर कबीर नगर छोड़ने का दुःख तो उन्हें था, लेकिन अब इस लोक से विदाई का महादुःख उन्होंने हमें दे दिया। यहां उनकी रिक्तता हमेशा बनी रहेगी।
भैयाजी के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक समन्वयता की भी थी। संत यात्रा 2023 में बम्लेश्वरी संत यात्रा के स्वागत की जिम्मेदारी उन्होंने मराठा समाज रायपुर को दी थी। समाज के सभी घटकों को जोड़कर समरसता का भाव जगाना उनकी विशेषता थी।
शिवाजी महाराज से विशेष लगाव
छत्रपति शिवाजी महाराज और धमतरी मराठा समाज से उनका विशेष लगाव था। शिवाजी महाराज का शौर्य, धर्मनिष्ठा और सुराज का विचार उनके जीवन का आदर्श था। धमतरी की भूमि और वहां के कार्यकर्ताओं से उनका विशेष आत्मीय रिश्ता सदैव बना रहा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उनके लिए ‘जीवन पद्धति’ था। शाखा से निकला कार्यकर्ता ही घर-परिवार तक संघ के विचार पहुंचाता है। शाखा में किसी भी अधिकारी का प्रवास होता, तो नए स्वयंसेवकों को वरिष्ठों से मिलवा कर वे उनका मनोबल बढ़ाते थे। इस विश्वास के साथ ही यही कार्यकर्ता संगठन के निर्माण व विकास की असली प्रक्रिया है। संघ के कार्यक्रमों में उनका सान्निध्य हमें मिलता रहता था। वे केवल मार्गदर्शक नहीं, सह-यात्री बनकर साथ चलते थे।
भैयाजी को 45 विधानसभा का प्रभारी बनाया गया। चुनाव के बाद दूसरे दिवस उनके निवास पर जाने पर उन्होंने चुनाव संबंधी सटीक आंकलन बताया। उन्होंने जो कहा, वो बाद में अक्षरश: सत्य हुआ। जमीनी पकड़, आंकड़ों की समझ और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद जैसी विशेषताओं के साथ उनकी राजनीतिक दूरदृष्टि अलग थी। प्रतिवर्ष गौशाला में गोपाष्टमी को पूजन में हमारे मां बगलामुखी गौशाला में गौ पूजन करने के लिए वे आते थे। गौ, गंगा, गीता उनके जीवन के आधार थे। श्रीमद भागवत, राम कथा में रुपनारायण हमारे मार्गदर्शक होने के कारण हमेशा उनसे मिलना होता था। धर्म और अध्यात्म को वे जीवन का आधार मानते थे। इसी तरह गौशाला और मंदिर से उनका विशेष लगाव था। ऐसे सेवाभावी स्वभाव व कार्यों से वे लोगों को भी प्रेरित करते रहते थे। संस्कृति के केंद्रों को जीवंत रखना ही उनका मिशन था।
*दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन:*
योग आयोग अध्यक्ष का शपथ ग्रहण पद उनके लिए सेवा का माध्यम बना। भैयाजी ने योग को घर-घर पहुंचाया। इसके प्रचार– प्रसार में कभी कोई कमी नहीं रखी। मेरे जैसे जिस साधारण कार्यकर्ता को उन्होंने अंगुली पकड़कर चलाया, उसी ने उन्हें कंधों से अंतिम विदाई दी। यह गुरु-शिष्य परंपरा का एक और उदाहरण है।
*।।सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय।*
*सात समुद्र की मसि करूँ, आपके गुण लिखा न जाय।।*

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