एम.आर.एफ. प्लांट से आत्मनिर्भरता और बदलाव की कहानी लिख रहीं बालोद की महिला कर्मी
-घरेलू जिम्मेदारियों से निकलकर स्वच्छता दीदी के रूप में शहर की तस्वीर बदल रहीं निशा बेगम, प्रधानमंत्री मोदी के अभियान को दे रही हैं आयाम
बालोद ।छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से महिला सशक्तिकरण और स्वच्छता का एक ऐसा प्रेरणादायक उदाहरण सामने आया है, जो हर किसी के लिए मिसाल है। नगरपालिका बालोद के ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के तहत संचालित एम.आर.एफ. प्लांट में कार्यरत स्वच्छता दीदी निशा बेगम ने अपनी मेहनत, लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति से साबित कर दिया है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो हर मुकाम हासिल किया जा सकता है।
निशा बेगम का सफर इस बात का प्रमाण है कि महिलाएं अपने जीवन में किसी भी पड़ाव पर नई शुरुआत कर सकती हैं। कुछ साल पहले तक वे पूरी तरह से घरेलू कामों तक सीमित थीं। घर की साफ-सफाई, झाड़ू-पोछा करना और बच्चों की देखरेख ही उनकी दुनिया थी। लेकिन साल 2017 में उन्होंने ’मिशन क्लीन सिटी’ के अंतर्गत बतौर स्वच्छता कर्मी कदम रखा। शुरुआत में उनके लिए यह सब बिल्कुल नया था, यहाँ तक कि उन्हें साइकिल चलाना तक नहीं आता था। लेकिन समय के साथ उन्होंने हिम्मत जुटाई, रिक्शा चलाना सीखा और आज वे आत्मविश्वास के साथ घर-घर जाकर कचरा संग्रहण और प्रबंधन का कार्य संभाल रही हैं।
निशा बेगम बताती हैं कि जब वे घर में थीं, तो उनकी दुनिया मोहल्ले तक सीमित थी। लेकिन स्वच्छता दीदी बनने के बाद वे बालोद के हर एक घर और हर एक गली को भली-भांति जानने लगी हैं। उनके कार्य की खूबी यह है कि वे कचरे को संग्रहित कर प्लांट में लाती हैं, जहाँ उसे गीले और सूखे कचरे में वैज्ञानिक तरीके से अलग-अलग छांटा जाता है। रेड्यूस, रियूस एवं रिसायकिल के मूलमंत्र पर काम करते हुए यह प्लांट पर्यावरण संरक्षण में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है। उन्होंने बताया कि पहले हमारे पास जो चीजें चाहकर भी खरीदने के साधन नहीं हुआ करती थीं, आज इस कार्य से मिलने वाली आय से हम अपने बच्चों को अच्छी जिंदगी और बेहतर शिक्षा दे पा रहे हैं। निशा बेगम इस बात का गहरा आभार व्यक्त करती हैं कि केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही स्वच्छता योजनाओं ने उनके और उनके जैसे तमाम परिवारों के जीवन में एक बड़ा बदलाव लाया है।
आज बालोद नगर पालिका क्षेत्र में निशा बेगम जैसी महिलाएँ न केवल शहर को स्वच्छ और सुंदर बना रही हैं, बल्कि समाज में उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहती हैं। उनकी यह मुस्कान और समर्पण भाव यह सिखाता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, बशर्ते उसे निष्ठा और ईमानदारी के साथ किया जाए।













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