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 उत्तम स्वास्थ्य वाली मृदा से उत्पादित भोजन स्वस्थ मानव शरीर के लिए आवश्यक - डॉ. चंदेल

-विश्व मृदा दिवस के अवसर पर ‘‘मृदा एवं जल : जीवन का आधार’’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला योजित
रायपुर । इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के मृदा विज्ञान एवं रसायन शास्त्र विभाग के अन्तर्गत संचालित अखिल भारतीय मृदा परीक्षण एवं फसल अनुक्रिया परियोजना तथा कृषि विज्ञान केन्द्र, रायपुर के संयुक्त तत्वधान में विश्व मृदा दिवस के अवसर पर आज ‘‘मृदा एवं जल : जीवन का आधार तथा उर्वरकों का संतुलित उपयोग’’ विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कृषि महाविद्यालय, रायपुर के संगोष्ठी कक्ष में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्घाटन इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायुपर के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक विस्तार सेवायें डॉ. अजय वर्मा ने की। विशिष्ठ अतिथि के रूप में नीर तारिक अली, वरिष्ठ आई.ए.एस. जम्मु एवं कश्मीर तथा आबर्जवर चुनाव आयोग, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक अनुसंधान सेवाएं डॉ. विवेक त्रिपाठी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अधिकारी, वैज्ञानिक, छात्र छात्राएं एवं परसदा, टेकारी तथा नवागांव के प्रगतिशिल किसान उपस्थित थे। 
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने मानव स्वास्थय एवं मृदा के स्वास्थ्य के संबंधों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुये बताया कि उत्तम स्वास्थय वाली मृदा से उत्पादित पौष्टिक भोजन से ही मानव शरीर का स्वास्थय अच्छा रहता है। उन्होंने कहा कि मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीवों की सक्रियता मृदा स्वास्थय को बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह भी एक सत्य है कि मानव शरीर में भी 60 हजार से अधिक सूक्ष्म जीव उपस्थित रहते हैं। उन्होंने प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल देते हुये कहा कि मृदा एवं जल के महत्व की व्यापक एवं सार्थक जानकारी नागरिकों को मिले इसके लिये प्राथमिक शिक्षा में इसे एक अनिवार्य पाठ् के रूप में शामिल किया जाना आज के समय की आवश्यकता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. अजय वर्मा ने कहा कि वर्तमान समय में भारी मशीनरी के कृषि में उपयोग से मृदा कड़ी हो रही है। इसके लिये हमें आवश्यकतानुसार ही कृषि यंत्रो का उपयोग मृदा की तैयारी में करना चाहिये तथा पर्याप्त मात्रा में जैविक खादों का उपयोग करना चाहिए। नीर तारिक अली ने कहा कि छत्तीसगढ़ का वातावरण अत्यंत शांत है, यहां के लोग अत्यधिक सरल एवं सहज तथा वैज्ञानिक ज्ञान से परंपरागत समय से ही समृध्द हैं। उन्होंने कहा कि वर्षा जल प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण यहाँ विशाल संख्या में उपस्थित उत्कृष्ट स्तर के तालाब में देखने को मिलता है जिसमें सिंचित वर्षा जल निस्तारी के साथ-साथ कृषि उत्पादन तथा भू-जल के पुनः-भरण सहायक है। डॉ. विवेक त्रिपाठी ने इस अवसर पर जल एवं मृदा के महत्व के बारे में हमारे धर्म ग्रंथों एवं वेद-पुराण में हजारों वर्षो पूर्व उल्लेखित जानकारीयों के वैज्ञानिक दृष्टिकोणों की व्याख्या करते हुये इस जानकारी का उपयोग मृदा एवं जल प्रबंधन में करने हेतु कृषि वैज्ञानिकों एवं कृषि छात्र छात्राओं का आवहान किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में स्वागत उद्बोधन देते हुए डॉ. जी. के. दास ने कहा कि हमारे ग्रंथो में मृदा एवं जल के महत्व को विस्तार से उल्लेखित किया गया है। मानव शरीर के निर्माण में पांच तत्व क्षिति, पावक, नीर, गगन तथा समीर आवश्यक है। यह श्लोक ही जल एवं मृदा के महत्व को प्रतिपादित करता है। संगोष्ठी की विस्तृत रूप-रेखा की जानकारी मृदा विज्ञान विभाग के प्राध्यापक डॉ. व्ही.एन. मिश्रा ने दी। 
कार्यशाला में आयोजित तकनीकी सत्र के दौरान डॉ. आर.के. बाजपेयी नें ‘‘मृदा स्वास्थय हेतु समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन’’ विषय पर तथा डॉ. जितेन्द्र सिन्हा ने ‘‘मृदा एवं जल : हम, आप और हमारी संस्कृति’’ विषय पर तकनीकी जानकारी प्रदान की। इस अवसर पर विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, मृदा विज्ञान एवं रसायन शास्त्र विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक गण डॉ. के. टेडिया, डॉ. के.के. साहू, डॉ. डी.एस. ठाकुर, डॉ. एल.के. श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे। इस एक दिवसीय संगोष्ठी का कुशल संचालन संगोष्ठी के आयोजन सचिव एवं प्राध्यापक डॉ. राकेश बनवासी ने किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. आर. अग्रवाल ने अतिथियों के प्रति आभार प्रदर्शन किया।

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