नदी बेसिन के पानी के प्रबंधन के लिए 'गंगा जल मशीन' दृष्टिकोण व्यवहार्य नहीं
नयी दिल्ली। अनुसंधानकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने गंगा नदी बेसिन (जीआरबी) के जल संसाधनों के प्रबंधन के वास्ते सभी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण के रूप में 'गंगा जल मशीन' की अवधारणा को लागू करने के विपरीत सलाह दी है। गंगा जल मशीन (जीडब्ल्यूएम) की अवधारणा इस धारणा पर निर्भर करती है कि गंगा नदी एक उच्च-उपज देने वाले, सदृश छिद्रिल जलभृत के माध्यम से चलती है, जिसका उपयोग मॉनसून के दौरान क्षणिक बाढ़ के पानी को संगृहित करने के लिए किया जा सकता है। पत्रिका ‘एसीएस ईएस एंड टी वाटर' में प्रकाशित एक लेख में अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि किसी भी नीतिगत वृद्धि से पहले भूजल-गंगा नदी के पानी की परस्पर क्रियाओं पर एक गहन अध्ययन आवश्यक है। हाल में, जीआरबी के जल संसाधनों का प्रबंधन करने में बहुत रुचि रही है, जिसमें गंगा नदी की सफाई भी शामिल है। अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से, भारत, नेपाल और बांग्लादेश से होकर बहने वाली गंगा नदी और उसकी सहायक नदियां बड़े पैमाने पर प्रदूषित और बाधित हो गई हैं, जिसके लिए औद्योगिक और शहरी कचरा बड़े पैमाने पर जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में जीआरबी जलभृतों से गहन भूजल निकासी के कारण समस्या और बढ़ गई है, जिसके कारण कुछ स्थानों पर भूजल स्तर में अभूतपूर्व कमी आई है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-खड़गपुर के प्रोफेसर अभिजीत मुखर्जी ने कहा, "बांग्लादेश के गंगा डेल्टा क्षेत्रों में हाल के कुछ अध्ययनों में कहा गया है कि "जल मशीन" की अवधारणा अनुकूल है और यह अध्ययन से जुड़े क्षेत्र में कुशलता से काम करती है।" लेख के सह-लेखक मुखर्जी ने कहा, "नतीजतन, दुनिया भर के जल प्रबंधकों और एजेंसियों ने 'गंगा जल मशीन' अवधारणा पर फिर से विचार करना शुरू कर दिया है।" हालांकि, अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि इस सैद्धांतिक अवधारणा में कई कमियां हैं।
उन्होंने कहा कि गंगा बेसिन के जलभृत पहले से ही गंभीर रूप से अत्यधिक तनावग्रस्त हैं, तथा अधिक निकासी केवल उनके विनाश को तेज करेगी। मुखर्जी ने कहा, "इसलिए, हम गंगा जल मशीन की अवधारणा को सभी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण के रूप में लागू करने के खिलाफ सलाह देते हैं।

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