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 महाकुंभ: शाही स्नान को लेकर तैयारियों में जुटे दुनियाभर के संत

  प्रयागराज।  विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन महाकुंभ में 144 वर्ष बाद दिव्य संयोग के मौके पर शाही स्नान को लेकर निरंजनी अखाड़े की छावनी में तेरहों अखाड़ों के प्रमुख संतों ने सोमवार की शाम शाही स्नान की पेशवाई में जाने वाले संसाधनों को लेकर गहन चर्चा करके रणनीति तैयार की । अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी महाराज की अध्यक्षता में आनंद अखाड़ा पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद गिरी, निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत राम रतन गिरि के साथ अन्य संत महापुरुष बैठक में शामिल हुए।
महाकुंभ है भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद एवं मां मनसा देवी मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी महाराज ने जानकारी देते हुए बताया कि कुम्भ मेला भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है, जो हर 12 वर्ष में चार प्रमुख नदियों के संगम स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है। उन्होंने कहा कि इस बार के महाकुंभ का बड़ा ही दिव्य संयोग बन रहा है जो 144 साल बाद आया है। उन्होंने कहा पूरा मेला क्षेत्र भगवामय हो गया है। महाकुम्भ मेला बिना किसी वाद विवाद के सकुशल सम्पन्न हो, इसको लेकर हमारे सभी तैयारियां पूर्ण हो चुकी है।
इस बार सबसे पहले निर्वाणी और अटल अखाड़े का स्नान होगा
उन्होंने कहा कि इस बार शाही स्नान में ज्यादा भारी वाहन, हाथी, ऊंट शाही स्नान की यात्रा में शामिल नहीं किए जाएंगे। सिर्फ उतने ही संसाधन साथ होंगे जिसमें महामंडलेश्वर और महंत बैठ सकें। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि सबसे पहले निर्वाणी और अटल अखाड़े का स्नान होगा। इसके पश्चात दूसरे नंबर पर निरंजनी और आनंद अखाड़ा स्नान करेगा। इसके पश्चात जूना अखाड़ा और अग्नि अखाड़ा स्नान करेगा और उसके पश्चात बैरागी संप्रदाय के तीनों अनि अखाड़े स्नान करेंगे।
महाकुंभ में संत महापुरुषों की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण
इसके बाद उदासीन और निर्मल अखाड़े स्नान करेंगे। उन्होंने कहा है कि सभी अखाड़े अपने-अपने निर्धारित समय पर अपनी छावनियों से शाही स्नान के लिए प्रस्थान करेंगे। जिससे बिना किसी वाद विवाद के शाही स्नान सकुशल संपन्न हो, कुम्भ मेले का मुख्य आकर्षण भी शाही स्नान होता है, उसे लेकर संत महापुरुषों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रहती है।संतों के अनुसार, शाही स्नान का उद्देश्य न केवल धार्मिक दृष्टि से पुण्य अर्जित करना है, बल्कि यह सामाजिक और आध्यात्मिक जागरूकता का भी एक प्रतीक है। इसलिए आने वाले श्रद्धालुओं से अपील करते हुए कहा है कि कुंभ क्षेत्र व गंगा स्नान स्थलों के साथ संगम की पवित्रता और निर्मलता को बनाये रखने में अपना योगदान दें और स्वच्छता बनाये रखे।
शाही स्नान करने से धुल जाते हैं सारे पाप
आनंद पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद गिरि ने कहा कि कुम्भ मेले में शाही स्नान के दौरान नदियों के संगम में स्नान करने से व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मौके पर संतों की उपस्थिति और उनकी विशेष तैयारियां भी महत्वपूर्ण होती हैं। वे अपने साधनों के साथ इस आयोजन में शामिल होते हैं और अनेक धार्मिक अनुष्ठान, पूजा और साधना करते हैं। उन्होंने कहा कि कुम्भ मेला सिर्फ एक धार्मिक समारोह नहीं, बल्कि यह समाज के लिए एक शिक्षा का अवसर भी है। शाही स्नान के दौरान वे ध्यान और साधना के महत्व पर बल देते हैं, और कुम्भ मेले में एकता, अहिंसा और भक्ति के संदेश का प्रसार करते हैं।
महाकुंभ में स्नान करना है अत्यधिक पुण्यकारी 
उन्होंने कहा कि महाकुंभ में स्नान का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। कुम्भ मेला भारतीय धर्म, संस्कृति और परंपरा का एक अद्भुत उदाहरण है, जहां लाखों श्रद्धालु और साधु- संत एकत्रित होकर पवित्र नदियों के संगम स्थल पर स्नान करते हैं। महाकुंभ में स्नान को अत्यधिक पुण्यकारी माना जाता है, और इससे जीवन के पापों को धोने और आत्मिक शुद्धि प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है। इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी ललित नंद गिरि ,महामंडलेश्वर स्वामी सहजानंद पुरी, महंत दिनेश गिरी, महंत राधे गिरि,महंत ओमकार गिरि, महंत नरेश गिरि, स्वामी अनंतानंद गिरि, स्वामी राजगीर आदि के संग अन्य संत महापुरुष मौजूद रहे।

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