महिला सशक्तीकरण और मानवाधिकारों का अलख जगाने वाले हुए सम्मानित
छत्तीसगढ़ मानवाधिकार फाउंडेशन के बैनर तले सम्मान समारोह आयोजित
टी सहदेव
भिलाई नगर। छत्तीसगढ़ मानवाधिकार फाउंडेशन के बैनर तले शुक्रवार को महाराणा प्रताप भवन में महिला सशक्तीकरण एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, पुलिस अधिकारियों, समाजसेवियों और पत्रकारों की मौजूदगी में एक परिचर्चा आयोजित की गई। परिचर्चा में जहां नए कानूनों के अनुसार मानवाधिकारों को सशक्त बनाने का जिक्र किया गया, वहीं महिलाओं को अधिकारों का हनन होने पर थाने में फौरन रिपोर्ट दर्ज करने की सलाह दी गई। इसके अलावा महिलाओं को किसी भी दबाव में आए बिना अवसाद में आकर खुदकुशी जैसे कठोर कदम न उठाने की नसीहत भी दी गई। इस दौरान मानवाधिकारों का अलख जगाने वाले प्रमुख व्यक्तियों के साथ-साथ 25 से ज्यादा महिलाओं को स्मृति चिह्न और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित भी किया गया।
सरकारी योजनाओं का लाभ मिले: रामटेके
फाउंडेशन के प्रदेशाध्यक्ष लव कुमार रामटेके ने परिचर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि सरकार की योजनाओं का महिलाओं को किस तरह लाभ मिले, इस मिशन पर हम काम कर रहे हैं। चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, उसकी योजनाओं की सही जानकारी होने से ही महिलाएं आगे बढ़ सकती हैं। उन्होंने राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोपों से बचने की भी अपील की। पूर्व सीएसपी वीरेंद्र सतपथी ने पौराणिक कथाओं के अंश को उद्धृत करते हुए कहा कि मां दुर्गा, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के पास सारी शक्तियां हैं। इन्हीं माताओं से शक्तियां प्राप्त कर देवतागण अपने उद्देश्य में सफल हुए हैं। रामायण के एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राजा दशरथ ने अपनी पत्नी कैकेयी के कहने पर ही व्यथित होकर श्रीराम को वन भेजा। जब वे वन को गए, तो श्रीराम बन कर गए। लेकिन, वे वनवास से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनकर लौटे।
महिलाओं से पंगा लेना पड़ेगा भारी: मोनिका
टीआई, दुर्ग मोनिका पांडे ने साफ लहजे में कहा कि मानवाधिकारों का हनन होने पर थाने में सीधे रिपोर्ट दर्ज कराएं और बाकी काम पुलिस पर छोड़ दें। अब वो जमाना नहीं रह गया कि थाना जाने से बदनामी होगी। महिलाएं अब जागरूक हो गई हैं, उनसे पंगा लेना भारी पड़ेगा। जब तक हम अन्याय सहते रहेंगे, तब तक हमें परेशान किया जाएगा। पूर्व शिक्षाधिकारी रजनी नेलसन ने शिक्षा को मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता लाने का सबसे सशक्त माध्यम बताया। समाजसेविका बी पोलम्मा ने समाज के प्रमुख व्यक्तियों को पारिवारिक समस्याएं सुलझाने के लिए एक कोर कमेटी के गठन का सुझाव दिया। उन्होंने कहा, यह कैसी विडंबना है कि घर की इज्जत का हवाला देते हुए हमारी बेटियों पर ही उनके माता-पिता दांपत्य जीवन बचाने का दबाव डालते हैं। यह दबाव इतना असहनीय हो जाता है कि कभी-कभी वे आत्महत्या जैसे कठोर कदम उठा लेती हैं। पोलम्मा ने एक ऐसी ही हृदयविदारक घटना का जिक्र किया जिसमें दो बच्चों की एक मां ने अवसाद में आकर खुदकुशी कर ली।
विचार मंथन में ये भी हुए शामिल
परिचर्चा में वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव, स्वरूपानंद महाविद्यालय की प्राचार्या हंसा शुक्ला, शिक्षाविद डीएन शर्मा, आंध्र साहित्य समिति के सचिव पीएस राव, उपाध्यक्ष बीए नायडु, तेलुगु सेना के प्रदेशाध्यक्ष नीलम चन्ना केशवलु, आंध्र महिला मंडली की अध्यक्ष पेरी पद्मा, मीडिया प्रभारी टी सहदेव, अशोक गुप्ता तथा विकास जायसवाल ने भी भाग लिया। इस अवसर पर तेलुगु सेना के जिलाध्यक्ष डी मोहन राव, डी गोपीवेणी, शेखर राव, जी रामाराव, शशि रेखा, रश्मि सागर, प्रीति चौबे, अंजू आचार्या, जी सरस्वती, संगीता राव, पीएस बोस, डी नागमणि तथा डी सुजाता समेत डेढ़ सौ से ज्यादा लोग शामिल हुए। कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता डी नागमणि ने किया।
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