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'सहयोग’ की बैठक में घोडखिंड के पावनखिंड बनने की कहानी सुनाई चारुशीला ने

रायपुर। वरिष्‍ठ नागरिक मंच ‘सहयोग’ की मासिक बैठक इस बार विशेष रही। बैठक में इसी माह 19 फरवरी को छत्रपति शिवाजी महाराज जयंती का असर दिखाई दिया। ‘सहयोग’ की हरि भक्त परायण चारुशीला देव ने शिवाजी महाराज के शौर्य की एक कथा सुनाकर बताया कि कैसे सैकडों वीर योद्धा बलिदानियों के कारण प्रसिद्ध घोड़सिंड किला पावनखिंड बना।
चारुशीला ने कहा कि साल 1660 में सिद्धी जौहर की सेना पन्हालागढ़ किले की चार महीने तक घेराबंदी की। इसके जवाब में शिवाजी महाराज ने एक चतुर योजना बनाई, जिसके अनुसार शिवा काशिद नामक उनका हमशक्ल एक तूफानी रात में घेरा तोड़कर विशालगढ़ की ओर भागने में सफल हो गया। इस दौरान सरदार बाजी प्रभु देशपांडे ने अपने शौर्य व दल की वीरता से शत्रु को रोककर शिवाजी को सुरक्षित निकाला। इसके बाद घोड़़खिंड का नाम पावनखिंड रखा गया। चार महीने की घेराबंदी के कारण किले के अंदर रसद और भोजन की कमी हो गई, तो शिवाजी ने एक युक्ति कर नकली शिवाजी को 50 सैनिकों के साथ पालकी में एक दिशा में जत्था रवाना किया और दूसरी दिशा में बचे हुए 300 सैनिकों के साथ विशालगढ़ की ओर निकल गए।
कथावाचक चारुशीला के अनुसार सिद्धी जोहर को जब नकली शिवाजी की पालकी की जानकारी मिली, तो उसके सैनिकों ने दूसरी दिशा में दौड़ लगाई। इस बात की भनक जब शिवाजी महाराज के सरदार बाजी प्रभु को लगी, तो उन्होंने तुरंत अपने 300 में से 50 सैनिकों को शिवाजी महाराज को लेकर विशालगढ़ की तरफ जाने को कहा। बचे 250 सैनिकों को लेकर वे मराठा सरदार घोड़़खिंड सिद्धी जोहर के 15 हजार सैनिकों को 18 घंटे तक रोककर रखा और उनसे युद्ध करते हुए शहीद हो गए। जब शिवाजी महाराज विशालगढ़ किले में पहुंचे और वहां से उन्‍हें तोपों की सलामी सुनाई दी, तब ही उन्‍होंने अपने प्राण त्याग दिए। शिवाजी महाराज ने तभी से घोड़़खिंड का नाम बाजी प्रभु के प्राणोत्सर्ग के कारण पावनखिंड नाम दिया।
समता कॉलोनी स्थ‍ित दिव्यांग बालिका विकास गृह- सियान गुड़ी में आयोजित सहयोग की फरवरी माह बैठक गणेश स्तोत्र से शुरू हुई। उसके बाद इस माह में जन्मदिन वाले सदस्‍यों की आरती उतार कर उन्‍हें शुभकामनाएं व बधाई दी गईं। कार्यक्रम के अंत में अध्यक्ष अपर्णा कालेले ने चारुशीला देव और उनके वाद्यवॄंद कलाकारों का श्रीफल के साथ स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन दि‍व्या पात्रीकर ने किया।

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