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महाराष्‍ट्र मंडल में रामनवमी महोत्‍सव के तीसरे दिन रामायण के पात्रों पर हुई चर्चा

 -भरत और राम के प्रेम का वर्णन कर भावुक हुईं अपर्णा मोघे 

 रायपुर। प्रभु श्रीराम के प्रति भरत के प्रेम, समर्पण और विश्वास का वर्णन करते हुए अपर्णा मोघे ने कहा कि पिता के एक आदेश को  शिरोधार्य कर जहां राम ने स्वयं को जंगल का राजा सहर्ष स्वीकार कर लिया। वहीं दूसरी ओर जब भरत को यह पता चला कि उनके लिए माता कैकई ने अयोध्या का राज सिंहासन मांगा है, तो भाई के प्रेम में भरत ने बिना विलंब किए पूरी अयोध्या का त्याग कर राम की खोज में जंगल जाने का फैसला ले लिया। प्रभु राम के प्रति भरत के प्रेम का वर्णन करते हुए अपर्णा काफी भावुक हो गईं। 
महाराष्ट्र मंडल के छत्रपति शिवाजी महाराज सभागृह में आयोजित रामनवमी महोत्‍सव के तीसरे दिन रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान अपर्णा ने भरत के चरित्र की व्याख्या की। उन्‍होंने बताया कि जब माता कैकई ने राम के लिए 14 वर्ष का वनवास और भरत के लिए सिंहासन राजा दशरथ से मांगा, तो उस समय भरत और शत्रुघ्न ननिहाल प्रवास पर थे। राम के वियोग में दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए। तब भरत को अयोध्या बुलाकर पूरा घटनाक्रम बताया गया। इसे सुनने के बाद भरत अपनी माता पर नाराज हुए और उन्होंने राम की खोज के लिए वन जाने और अयोध्या का त्याग करने का मन बना लिया। राम के प्रति भरत का स्नेह देख तीनों माताएं करुणामयी हो गई और उन्‍होंने भरत के साथ वन जाने का फैसला लिया। उन्होंने कहा कि भरत जैसा प्रेम, समर्पण करने वाला भाई सभी को बनना चाहिए।
धैर्य, त्याग, समर्पण और ममता की प्रतिमूर्ति है माता सुमित्राः शताब्दी
रामायण के पात्र माता सुमित्रा पर चर्चा करते हुए वरिष्ठ सदस्य शताब्दी पांडे ने कहा कि यथा नाम तथा गुण.... सुमि यानी सुंदर और त्रा यानी त्राण अर्थात् कष्टों को तारणे वाली। बचपन से शुद्ध सात्विक और सदगुणी थी माता सुमित्रा। उनके जीवन दर्शन में धैर्य, त्याग, प्रेम और पवित्रता परिलक्षित होता है। परिवार पर विपत्ति, बड़ों की सेवा, महल के एकाकीपन के बीच सुमित्रा का नाम छूट जाता है। श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का स्नान, श्रृंगार, भोग माता सुमित्रा ही करती थीं। 
शताब्‍दी के अनुसार सुमित्रा इतिहास की पुनरावृत्ति नहीं बल्कि नवीन चेतना से सुसम्पन्न नारी है। वह एक आदर्श मां के रूप में लक्ष्मण को राम की सेवा के लिए प्रेरित करती है। सुमित्रा संसार की ऐसी मां थी, जिनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र राजा नहीं अपने भाई का सेवक बने। उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि अब राम तुम्हारे पिता और जानकी तुम्हारी माता है। उनकी सेवा ही तुम्हारा परम धर्म है। माता सुमित्रा अद्वितीय प्रबंधकीय गुण था। वह महल के समस्त प्रबंध देखती थीं। दासियों की नियुक्ति, पूजा, दान अन्य आयोजन का जिम्मा उन्हीं के पास था। 
सूपे जैसे जिसके नख, वही सूर्पनखा: खंगन
सूर्पनखा पर गहन अध्‍ययन करने वाले सेवानिवृत्‍त ऑडिटर श्‍याम सुंदर खंगन ने कहा कि जिसके नाखून सूपे के जैसे हो, वहीं सूर्पनखा हो सकती है। सूर्पनखा एक राक्षसी थी, विद्रुप, भयानक लेकिन मोहमाया की कला में पारंगत। सूर्पनखा को दूसरे पुरुषों को रिझाना बखूबी आता था। भगवान राम और बाद में लक्ष्‍मण पर मोहित होने वाली सूर्पनखा ने दोनों भाइयों को प्रभावित करने के लिए खूबसूरत युवती का मायावी रूप धारण किया। फ‍िर भी दोनों भाइयों को वो रिझा नहीं पाई। बार- बार सूर्पनखा के मायवी रूप से परेशान होकर आखिरकार लक्ष्‍मण उसके कान और नाक काट लिये। यहीं से रामायण में यूटर्न लेता है। सूर्पनखा एक ओर रावण के अहंकार का प्रतिरूप है, तो दूसरी ओर सुनियोजित षडयंत्र को मूर्तरूप देने में दक्ष थीं। 
कार्यक्रम समापन से पहले वल्‍लभ नगर केंद्र की महिलाओं ने सुमधुर भजन प्रस्तुत किये। महा आरती के बाद महाप्रसाद वितरित किया गया।

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