बचपन में मिला श्राप युवावस्था में साबित हुआ वरदानः परितोष
- महाराष्ट्र मंडल में रामनवमी महोत्सव के छठवें दिन परितोष दो डोनगांवकर ने नल- नील पर, अर्चना भाकरे ने जाम्बवंत पर, सुचिता देशमुख ने छत्तीसगढ़ की लोक कथाओं में रामायण पर, मंजरी बक्षी ने वीर हनुमान पर व अर्चना धर्माधिकारी ने देवी अहिल्या के चरित्र पर रखे विचार
रायपुर। रामायण में, नल और नील नाम के दो वानर सेनापति थे, जिन्हें बचपन में उनकी उद्दंडता की वजह से ऋषि- मुनियों से श्राप मिला था कि वे जो भी वस्तु पानी में फेंकेंगे, वह तैरेगी डूबेगी नहीं। नल- नील को मिला यह श्राप उस समय वरदान सिद्ध हुआ, जब वे प्रभु राम की वानर सेना के सहयोग से समुद्र पर रामसेतु (पुल) के निर्माण कर रहे थे। इससे हमें इस बात की सीख मिलती है कि बचपन में अगर हमें अपने गुरुजनों, परिजनों की ओर से हमारी शरारत पर दंड मिला हो, तो उसे दंड नहीं जीवन की सीख माने। उनकी बताई सीख न जाने कब विकट परिस्थितियों में हमारे काम आ जाए।
उक्ताशय के विचार महाराष्ट्र मंडल में आध्यात्मिक समिति की ओर से आयोजित रामायण के पात्रों पर चर्चा के दौरान नल-नील पर बोलते हुए परितोष डोनगांवकर ने कही। रामनवमी महोत्सव के छठवें दिन अर्चना भाकरे ने जाम्बवंत पर, सुचिता देशमुख ने 'छत्तीसगढ़ की लोक कथाओं में रामायण' पर, मंजरी बक्षी ने वीर हनुमान पर व अर्चना धर्माधिकारी ने देवी अहिल्या के चरित्र पर विचार रखे।
छत्तीसगढ़ के लोक गीतों व लोक कथाओं में रचे बसे हैं रामः शुचिता
शुचिता देशमुख ने कहा कि वनवास काल में श्रीराम सबसे ज्यादा समय दंडकारण्य यानी छत्तीसगढ़ में बिताया। इस दौरान उन्होंने जो सबसे बड़ा काम किया, वह था उनका समभाव। उन्होंने वनवासियों और लोकजन से आत्मीयता के साथ भेंट की और उनका वरण किया। वे वनवासियों के बीच पहुंचे, तो उन्हें लगा राम को वनवास नहीं, हमें एक नया राजा मिला है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति में प्रचलित सभी लोकगीतों, तीज- त्योहार, व्यवहार में राम को अपने जीवन में उतारा। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के व्यवहार में राम का नाम पहले है। यहां के लोग जब एक-दूसरे मिलते हैं, तो नमस्कार के बजाए सीता-राम या राम-राम कहते है। वहीं छत्तीसगढ़ के लोगों ने छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के माध्यम से अपने हर उत्सव, उमंग, तीज-त्यौहार, सुख-दुख, शोक, अपनी भक्ति में भगवान श्रीराम को समाहित किया है। छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में भोजली, जवारा, सुआ गीत, बसदेव गीत, माता सेवा गीत, ददरिया, पंडवानी, नांचा-कूदा, गम्मत आदि राम की कथा को लोक रंग में रंगा गया है। गांव-गांव में रामायण मंडलियां हैं।
जामवंत जी का तीनों युगों में होने का वर्णन मिलता है : अर्चना
अर्चना भाकरे ने जामवंत पर चर्चा करते हुए कहा कि वे रामायण के सबसे प्रमुख पात्रों में से एक हैं। एक कथा के अनुसार एक बार जब ब्रह्मा जी तप में लीन थे, उन्हें जम्हाई आ गयी और उससे ही प्रथम ऋक्ष (रीछ) का जन्म हुआ। उनकी जम्हाई से जन्म लेने के कारण उनका नाम जामवंत पड़ा। विष्णु पुराण के अनुसार जब ब्रह्मा जी से मधु और कैटभ नामक दैत्यों ने जन्म लिया तो उस समय ब्रह्मा जी के पसीने से जामवंत का जन्म हुआ। अग्नि पुराण के अनुसार जामवंत का जन्म अग्नि से हुआ। अर्चना के अनुसार जामवंत को अत्यंत विद्वान, बुद्धिमान, वेदपाठी और सदा अध्ययन करने वाला बताया गया है। उन्हें सभी वेद, पुराण, शास्त्र कंठस्थ थे। श्रीराम की सेना में वे सबसे वयोवृद्ध और बुद्धिमान थे। जब लक्ष्मण को शक्ति बाण लगा तो उन्होंने ही हनुमान को चार दुर्लभ बुटियों के बारे में बताया था, जिनमे से एक संजीवनी थी।
वाल्मीकि रामायण की कीर्ति के लिए स्वरचित रामायण को नष्ट किया हनुमान ने : डॉ मंजिरी
बजरंग बली पर डॉ. मंजिरी बक्षी कहतीं हैं कि हनुमान राम नाम का जाप, उनसे प्रेम एवं प्रभु चरणों में वास करते- करते स्वयं भगवान हो गए। सीताहरण के बाद जामवंत जी ने हनुमान को उनके शक्ति का स्मरण कराया (जो हनुमान जी भूल चुके थे ) तभी गुरु के आदेश का पालन करने हेतु उन्होंने अथाह समुद्र को पार कर सीता माता के बारे में जानकारी ली। डॉ. मंजिरी ने कहा कि जब हम जिंदगी में असमंजस में होते है तब श्री हनुमान के जैसे ही गुरु के, या तो प्रभु की शरण में लीन हो जाएं, क्योंकि गुरु ही वह स्रोत है, जो जामवंत की तरह आपको आपकी भूली हुई क्षमता, शक्ति एवं बुद्धि का स्मरण कराता है।
श्रीराम के चरणों के स्पर्श से देवी अहिल्या का हुआ उद्धारः अर्चना
अर्चना धर्माधिकारी ने गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या पर चर्चा करते हुए कहा कि आहिल्या... ब्रह्माजी की मानसपुत्री थीं। जब वे विवाह योग्य हुईं, तब बाबा (ब्रह्माजी) ने उनका विवाह गौतम ऋषि से कराया। एक दिन इन्द्रदेव वन भ्रमण पर थे। उनकी नजर गौतम ऋषि के आश्रम पर गई। उन्होंने अहिल्या को देखा और उनका मन मोहित हो गया। एक दिन ऋषि गौतम, भोर में ही नदी पर स्नानादि क्रियाएं करने चले गए। इस मौके पर इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेश धारण कर उनकी कुटिया में गए और उन्हें देखकर अहिल्या ने अपना तन- मन उनको समर्पित कर दिया। जब ऋषि गौतम आये, वे देखकर अत्यंत क्रोधित हो गये,। इन्द्र वहा से भाग निकला। परंतु गौतम ऋषि ने उनको श्राप दिया कि "तुम नपुंसक बन जाओ। यही कारण था की इन्द्र भगवान की पूजा नहीं होती। फिर उन्होंने मुड़कर अहिल्या की तरफ देखा। कई लांछन लगाए और श्राप दिया कि तुम पत्थर (शिला) बन जाओ। थोड़ी देर बाद जब उनका क्रोध शांत हुआ, तो अहिल्या ने उनसे माफी मांगते हुए कहा कि मैं अनजान थी। थोड़ा शांत होकर ऋषि गौतम ने वरदान दिया कि त्रेता युग में श्रीराम उनका उद्धार करेंगे। हजारों साल बाद एक दिन प्रभु श्रीराम, वाल्मीकि के साथ और वशिष्ठ ऋषि के साथ वहां से आये और उनके पत्थर पर कदम रखते ही धीरे-धीरे स्पर्श से अहिल्या अपने मूर्त रूप में आ गईं।











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