महिलाओं के प्रति नजरिये में बदलाव की जरूरत : राष्ट्रपति मुर्मू
मुंबई. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को कहा कि महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में ‘कमियां' हैं। मुर्मू ने इनका पुनर्मूल्यांकन करने की जरूरत को रेखांकित करते हुए इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक विकास के बिना राष्ट्र की प्रगति पूरी तरह से साकार नहीं हो सकती। मुंबई में महाराष्ट्र विधान परिषद के शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि भारत की आधी आबादी महिलाओं की है और देश को आगे ले जाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में उनकी सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने कहा, ‘‘महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक प्रगति के बिना देश का विकास उस तरह नहीं हो सकता जैसा होना चाहिए।'' राष्ट्रपति ने कहा कि महिलाओं को शायद अभी आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन भविष्य में वे ‘‘चलेंगी, दौड़ेंगी और उड़ेंगी'' तथा राष्ट्र के विकास में योगदान देंगी। उन्होंने कहा, ‘‘महिलाओं को देखने और समझने के तरीके में खामी है। महिलाओं के प्रति नजरिये में बदलाव की जरूरत है। इसे बदलना हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है।'' राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘भविष्य में, हम शायद वह नहीं देखेंगे जो हम अभी देख रहे हैं और जिसका सामना महिलाएं कर रही हैं।'' उनकी यह टिप्पणी कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल में एक महिला जूनियर डॉक्टर से दुष्कर्म और हत्या तथा बदलापुर के एक स्कूल में दो नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण की घटना पर व्यापक आक्रोश की पृष्ठभूमि में आई है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति ने 28 अगस्त को कहा था कि अब समय आ गया है कि भारत महिलाओं के खिलाफ अपराधों की ‘‘विकृतियों'' के प्रति जागरूक हो और उस मानसिकता का मुकाबला करे जो महिलाओं को ‘‘कम शक्तिशाली, कम सक्षम, कम बुद्धिमान'' के रूप में देखती है। विधान परिषद में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति ने मराठा सम्राज्य के संस्थापक एवं महान योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरमाता जीजाबाई और महिला शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले के योगदान की भी सराहना की। राष्ट्रपति मुर्मू ने रेखांकित किया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट द्वारा शुरू किए गए ‘होम रूल' आंदोलन ने स्वशासन की मांग को बल दिया। उन्होंने कहा कि इस (आंदोलन) के परिणामस्वरूप 1919 अधिनियम पारित हुआ, जिसे 1921 में लागू किया गया और इसके परिणामस्वरूप तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी में एक अनंतिम विधायिका का गठन भी हुआ। उन्होंने कहा कि 1960 में बॉम्बे प्रेसीडेंसी का विभाजन कर महाराष्ट्र और गुजरात के गठन के बाद इसे महाराष्ट्र राज्य विधानमंडल के रूप में जाना जाने लगा। राष्ट्रपति ने कहा कि महाराष्ट्र में पिछले 103 वर्षों से विधानमंडल ने लोगों की आकांक्षाओं और अभिव्यक्तियों को मंच दिया है। उन्होंने कहा कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर भी राज्य विधानमंडल के सदस्य थे। मुर्मू ने कहा कि विधानमंडल के ऊपरी सदन को वरिष्ठों का सदन कहा जाता है। लेकिन युवा लोग भी राज्यसभा और विधान परिषदों में चुनकर आते हैं और देश के विकास में मदद करते हैं।










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