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बालाजी मंदिर में विशाल जनसमुदाय के बीच मना वैकुंठ एकादशी उत्सव

-टी सहदेव
भिलाई नगर। सेक्टर 05 स्थित बालाजी मंदिर में आंध्र साहित्य समिति के तत्वावधान में धनुर्मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को वैकुंठ एकादशी उत्सव विशाल जनसमुदाय के बीच धार्मिक सद्भाव से मनाया गया। दक्षिण भारत में इसे मुक्कोटि एकादशी भी कहा जाता है। बालाजी मंदिर और गणेश मंदिर के बीच बना वैकुंठ द्वार (उत्तर द्वार) ब्रह्ममुहूर्त में ही खुल गया था। सबसे पहले पंडित गोपालाचारी के सान्निध्य में विशेष रूप से सुसज्जित श्रीविष्णु के अवतारी भगवान बालाजी, माताओं श्रीदेवी-भूदेवी के उत्सव विग्रहों को मंडप के बीचों बीच स्थापित किया गया। उसके बाद उनकी वैदिक विधि विधान से पूजा-अर्चना की गई। पूजा के पश्चात वैकुंठ द्वार को भक्तों के प्रवेश के लिए खोल दिया गया।
 *उत्तर द्वार से गुजरने से मिलता है वैकुंठ धाम* 
ऐसा धार्मिक विश्वास है कि इस द्वार से गुजरने वाले को वैकुंठ धाम (स्वर्ग) की प्राप्ति होती है। इसलिए भक्तगणों ने इसी द्वार से प्रविष्ट करते हुए सर्वप्रथम श्रीविष्णु, श्रीदेवी-भूदेवी के दर्शन किए और उसके बाद परिसर में स्थित तीनों मंदिरों में माथा टेकने के उपरांत दक्षिण द्वार से बाहर की ओर प्रस्थान किया। उत्सव की तैयारियां काफी पहले से की गई थीं। उत्सव को देखते हुए मंदिर परिसर में स्थित मुख्य मंदिर के साथ-साथ, श्रीदेवी और भूदेवी के मंदिरों को भी फूलों के आकर्षक तोरणों से सजाया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए अध्यक्ष पीवी राव और सचिव पीएस राव ने असुविधा, भीड़भाड़ और अव्यवस्था से बचने के लिए जगह-जगह वालंटियर तैनात किए थे।
 *कन्नड़ भवन तक लगी भक्तगणों की कतार* 
भीड़ का आलम यह था कि भक्तगण कन्नड़ भवन तक कतार में थे। इधर बालाजी मंदिर और गणेश मंदिर के बीच की तीनों गैलरियां भी श्रद्धालुओं से खचाखच भर गई थीं। वैकुंठ द्वार (उत्तर द्वार) से प्रवेश करने तथा महाविष्णु के दर्शन में कोई असुविधा न हो, इसके लिए समिति के पदाधिकारी के सुब्बाराव, टीवीएन शंकर, एनएस राव, के लक्ष्मीनारायण और एस रवि कड़ी नजर रखे हुए थे। अध्यक्ष पीवी राव ने कहा कि वैकुंठ एकादशी का विशेष महत्व है, इस दिन दर्शन करने से श्रीविष्णु की कृपा हमेशा बनी रहती है। सचिव पीएस राव ने मंदिर में जुटी भक्तों की भीड़ को अभूतपूर्व बताते हुए कहा कि श्रीविष्णु के दर्शन से हमारे सभी पाप मिट जाते हैं।
*एकादशी देवी की आंखों की ज्वाला से मुरासुर भस्म* 
पद्मपुराण के अनुसार मुर नामक दानव के अत्याचारों से भयभीत होकर देवतागण भगवान विष्णु की शरण में गए। मुर से मुक्ति के लिए देवताओं द्वारा प्रार्थना करने पर श्रीविष्णु ने मुरासुर से युद्ध किया, जो काफी लंबा चला। उस महा शक्तिशाली राक्षस के संहार के लिए विष्णु भगवान ने दिव्यास्त्र की खोज में भद्रिकाश्रम की हैमावती नामक गुफा में पहुंचे, जहां अपनी थकान दूर करने के लिए उन्होंने कुछ देर विश्राम किया। सोते हुए श्रीविष्णु को मारने के उद्देश्य से वह गुफा में घुस गया। तभी भगवान के शरीर से दुर्गा के रूप में एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और उस देवी ने अपनी आंखों की ज्वाला से मुरासुर को भस्म कर दिया। तब श्रीविष्णु ने प्रसन्न होकर उस शक्ति को एकादशी नाम दिया और वरदान मांगने को कहा। एकादशी ने वरदान मांगा कि जो भी उनके प्राकट्य दिवस धनुर्मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत रख कर पूजा करेंगे, उन्हें वैकुंठ धाम की प्राप्ति होगी। तब से वैकुंठ एकादशी उत्सव मनाया जाता है।
 

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