30 साल बाद बैसाखी का सहारा छूटा, जागेश्वर ने अपने पैरों पर चलकर फिर नए जीवन की उम्मीद पाई
0- सेवा संकल्प अभियान से तीन दिव्यांग जनों के जीवन में लौटी खुशियां, छात्र मयंक अब फिर जा सकेगा स्कूल, निर्मला साहू को मिला आत्मनिर्भरता का सहारा
0- कृत्रिम पैरों ने लौटाया आत्मविश्वास, स्वाभिमान और अपनों के सपनों को पूरा करने का हौसला
बालोद. कभी बैसाखी के सहारे जिंदगी गुजारने की मजबूरी, कभी पढ़ाई छूट जाने का दर्द, तो कभी दूसरों पर निर्भर रहने की बेबसी। इन मुश्किलों के बीच जब उम्मीद का सहारा मिला, तो आंखों में खुशी के आंसू छलक उठे। किसी ने 30 साल बाद अपने पैरों पर चलने का सुख महसूस किया, तो किसी के चेहरे पर फिर से स्कूल जाने और अपने सपनों को पूरा करने की मुस्कान लौट आई। यह बदलाव केवल कृत्रिम पैर मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की नई शुरुआत है।
केंद्र एवं राज्य शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं और सेवा संकल्प अभियान के माध्यम से जिले में मानवीय संवेदना की ऐसी ही प्रेरक मिसाल सामने आई है। कलेक्टर श्रीमती दिव्या उमेश मिश्रा के निर्देशानुसार समाज कल्याण विभाग द्वारा जरूरतमंद दिव्यांगजनों को कृत्रिम अंग उपलब्ध कराने की संवेदनशील पहल की जा रही है, ताकि वे अपनी शारीरिक कठिनाइयों को पीछे छोड़कर सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
इसी कड़ी में आज संयुक्त जिला कार्यालय में जिले के तीन दिव्यांगजनों को कृत्रिम पैर प्रदान किए गए। इस अवसर पर कलेक्टर श्रीमती दिव्या उमेश मिश्रा, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व सदस्य श्री यशवंत जैन तथा वरिष्ठ जनप्रतिनिधि श्री चेमन देशमुख और श्री अभिषेक शुक्ला ने दिव्यांगजनों से आत्मीय बातचीत की। उन्होंने उनके अनुभवों को जाना और कृत्रिम पैर मिलने के बाद जीवन में आए बदलावों के बारे में जानकारी ली। अतिथियों ने सभी को शॉल भेंटकर उनके सुखद, स्वस्थ और आत्मनिर्भर भविष्य की कामना की।
30 साल बाद जागेश्वर ने अपने पैरों पर बढ़ाए कदम, चेहरे पर लौटी खुशी
डौण्डी विकासखंड के ग्राम धुर्वाटोला निवासी श्री जागेश्वर के जीवन में पिछले 30 वर्षों से एक ऐसी मजबूरी थी, जिसने उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को कठिन बना दिया था। लगभग तीन दशक पहले जहरीले सांप के काटने के कारण पैर में संक्रमण फैल गया और चिकित्सकों को उनका एक पैर काटना पड़ा। इसके बाद से बैसाखी ही उनके जीवन का सहारा बन गई थी।
बिना किसी सहारे के चलना उनके लिए एक सपना बनकर रह गया था। लेकिन सेवा संकल्प अभियान के तहत कृत्रिम पैर मिलने से उनके जीवन में नई उम्मीद जाग उठी। कृत्रिम पैर लगाने के बाद चलने का अभ्यास करते हुए जब उन्होंने अपने कदम आगे बढ़ाए, तो वर्षों की बेबसी के बीच आत्मनिर्भरता की नई राह दिखाई देने लगी।
जागेश्वर के लिए यह केवल कृत्रिम पैर नहीं, बल्कि 30 वर्षों से अधूरे रह गए आत्मविश्वास को फिर से पाने का अवसर है। अब उन्हें उम्मीद है कि वे पहले से अधिक सहजता के साथ अपने दैनिक कार्य कर सकेंगे और दूसरों पर निर्भरता भी कम होगी।
हादसे ने छीना पैर, लेकिन अब नहीं छीन पाएगा मयंक के सपने
ग्राम पलारी निवासी कक्षा नवमीं के छात्र मयंक साहू के लिए सड़क दुर्घटना ने जिंदगी की राह मुश्किल कर दी थी। कुछ माह पहले हुए गंभीर हादसे में उसका एक पैर कट गया। इस घटना ने न केवल उसकी शारीरिक क्षमता को प्रभावित किया, बल्कि पढ़ाई और स्कूल जाने की राह में भी बाधा खड़ी कर दी।
स्कूल जाने और दोस्तों के साथ पढ़ने-लिखने की उम्र में मयंक को घर पर रहने की मजबूरी का सामना करना पड़ा। पढ़ाई छूटने की चिंता भी उसे लगातार परेशान करती थी। लेकिन अब कृत्रिम पैर मिलने से उसके मन में नई उम्मीद जगी है।
मयंक के चेहरे पर लौटी मुस्कान उसके मजबूत हौसले की कहानी बयां करती है। उसे विश्वास है कि अब वह फिर से स्कूल जा सकेगा, अपनी पढ़ाई पूरी करेगा और माता-पिता के सपनों को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। कृत्रिम पैर ने उसके लिए केवल चलने का रास्ता ही नहीं खोला, बल्कि शिक्षा और बेहतर भविष्य की उम्मीद भी जगाई है।
ग्राम पिनकापार निवासी श्रीमती निर्मला साहू भी उन लोगों में शामिल हैं, जिनकी जिंदगी गंभीर बीमारी के कारण बदल गई थी। पैरों में गंभीर बीमारी और संक्रमण बढ़ने के कारण उनका एक पैर काटना पड़ा। इसके बाद चलने-फिरने और रोजमर्रा के काम करने में उन्हें काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। कृत्रिम पैर मिलने और चलने का अभ्यास करने के बाद अब उनके जीवन में भी नई उम्मीद जगी है। वे अपने दैनिक घरेलू कार्यों को अधिक आसानी से करने और आत्मनिर्भर जीवन जीने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
निर्मला साहू के लिए यह पहल उस आत्मविश्वास की वापसी है, जो बीमारी और शारीरिक परेशानी के बीच कहीं खो गया थी। अब वे नए उत्साह के साथ अपनी जिंदगी को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं।
शासन की पहल से दिव्यांगजनों को मिला आत्मसम्मान के साथ जीने का संबल
सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत कृत्रिम पैर प्राप्त करने वाले तीनों दिव्यांगजनों ने केंद्र एवं राज्य शासन की इस संवेदनशील पहल के प्रति आभार व्यक्त किया। उनके लिए कृत्रिम पैर केवल एक शारीरिक सहारा नहीं, बल्कि अपने काम स्वयं करने, परिवार का संबल बनने और समाज में सम्मान के साथ जीवन जीने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
सेवा संकल्प अभियान की यह पहल बताती है कि संवेदनशील शासन की पहचान केवल योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि उन योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाकर उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने से होती है। जब किसी जरूरतमंद को आत्मनिर्भर बनने का अवसर मिलता है, तो उसका लाभ केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे परिवार में उम्मीद और खुशियों का संचार होता है।
जागेश्वर के लिए 30 साल बाद अपने पैरों पर चलने की उम्मीद, मयंक के लिए दोबारा स्कूल जाने का सपना और निर्मला साहू के लिए अपने दैनिक कार्य स्वयं करने का विश्वास इस बात का प्रमाण है कि सही समय पर मिला सहयोग किसी की जिंदगी की दिशा बदल सकता है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए दिव्यांगजनों ने कहा कि शासन की इस पहल ने उन्हें आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। उनके लिए यह सहायता केवल कृत्रिम अंग नहीं, बल्कि नई उम्मीद, नया हौसला और स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का अवसर है।








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