साथी बनकर रहें हमेशा
-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद) साथी बनकर रहें हमेशा, बातें क्यों जीत-हार के ।
जाओ न मुझे छोड़ पिया जी, तोड़ो मत तार प्यार के ।
मेरे मन में बसे हुए हो, मुझसे कैसी दूरी है ।
आसमान में छिटक रहे क्यों , जानूँ क्या मजबूरी है ।
बिना तेल के जले न बाती, स्याही बिन क्या करे कलम ।
भूल हुई क्या ऐसी मुझसे, जरा बता दो मुझे बलम ।
बढ़ा न मेरी मुश्किल प्रियतम, दुख छोड़िए तकरार के ।।
तुम्हीं चाँद मेरे आँगन के, गायब हुए अमावस -से ।
अंतर्मन की धरा सूखती , झूमो बरसो पावस-से ।
कली भ्रमर की बाट जोहती, बेचैनी है खिलने की ।
कैद पंखुड़ी बीच कमलिनी , आकुल रवि से मिलने की ।
नीलांबर में मेघ पधारे , आओ प्रिय हास् धार के ।।
नयन बंद कर तुझे निहारूँ , बसे सीप में मोती से ।
भासित हो अंतस में ऐसे , जलती हूँ दीपज्योति से ।
नहीं पास तू मन उदास है , पुष्पहार मुरझाए हों ।
फैला कजरा बिखरा गजरा ,आया पतझर मधुवन ज्यों ।
रूखी अलकें सूनी पलकें , वन हुए बिना बहार के ।।










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