लिंग निर्धारण सर्जरी के इच्छुक व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों से मूल्यांकन कराना आवश्यक
नयी दिल्ली. केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मानक संचालन प्रक्रियाओं के अनुसार ‘प्री-हार्मोनल' थेरेपी या लिंग निर्धारण सर्जरी करवाने के इच्छुक ‘ट्रांसजेंडरों' का मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों द्वारा मूल्यांकन व प्रमाणन किया जाना आवश्यक है। 'ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के चिकित्सा उपचार के लिए एसओपी' में कहा गया है कि जहां तक स्त्री रोग विशेषज्ञों का सवाल है, तो उन्हें यह पूछना चाहिए कि रोगी को नाम और सर्वनाम के संदर्भ में किस तरह से संबोधित किया जाना चाहिए, और यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि वे जिन शब्दों का उपयोग करें वे सुरक्षा, गरिमा व सम्मान के सिद्धांतों के अनुरूप हों। एसओपी दस्तावेज में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की जिम्मेदारियों को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि उन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्तमान प्रणाली के मुताबिक लैंगिक असंगति का मूल्यांकन और प्रमाणन करना होगा। लैंगिक असंगति का मतलब किसी व्यक्ति के अनुभव किए गए लिंग और निर्धारित लिंग के बीच फर्क होना होता है। लैंगिक असंगति वाले लोग हार्मोनल उपचार, सर्जरी या अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से लिंग परिवर्तन की इच्छा जताते हैं, ताकि वे खुद को जिस लिंग (जेंडर) से जुड़ा महसूस करते हैं, उसी से जुड़े व्यक्ति के तौर पर स्वीकार किए जाएं और जीवन जी सकें। एसओपी के अनुसार, "एंडोक्राइनोलॉजी उपचार से पहले, एक मनोचिकित्सक से प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। लिंग निर्धारण सर्जरी से पहले मनोचिकित्सक और नैदानिक मनोवैज्ञानिक/मनोचिकित्सक से दो प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है।” दस्तावेज में कहा गया है कि इसके अलावा, एक मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से विभिन्न प्रकार के विकारों का आकलन कराकर उनका इलाज कराना होता है। वहीं, आवश्यकता पड़ने पर उन्हें लिंग असंगति से संबंधित मुद्दों से निपटने के लिए सहायता या चिकित्सा भी प्रदान करनी होती है। दस्तावेज में कहा गया है, "यदि आवश्यकता हुई, तो यह सहायता हार्मोनल थेरेपी/लिंग निर्धारण सर्जरी से पहले, सर्जरी के दौरान तथा सर्जरी के बाद भी प्रदान की जानी चाहिए।'' दस्तावेज़ के अनुसार, कोई भी व्यक्ति 18 वर्ष की आयु से पहले लिंग निर्धारण सर्जरी नहीं करवा सकता।










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