अवनि लेखरा: पैरालंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली भारतीय
नई दिल्ली। अवनि लेखरा को 2012 में एक कार दुर्घटना में घायल होने के कारण व्हील चेयर का सहारा लेना पड़ा ,लेकिन पैरालंपिक खेलों में निशानेबाजी में स्वर्ण सहित दो पदक जीतकर उन्होंने यह साबित कर दिया कि बुलंद हौसले और कभी हार न मानने के जज्बे से कोई भी सफलता हासिल की जा सकती है।
अवनि ने तोक्यो पैरालंपिक में 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एचएस1 वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने के बाद 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन एसएच1 स्पर्धा का कांस्य पदक हासिल कर इतिहास रच दिया। वह दो पैरालंपिक पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गयीं। वह भारत की उन चुनिंदा खिलाडिय़ों में शामिल हो गयी है जिन्होंने एक से अधिक पैरालंपिक (या ओलंपिक) पदक जीते हैं। कार दुर्घटना में अवनि की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी थी जिसके बाद उनकी कमर का निचला हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था। अवनि के पिता प्रवीण लेखरा 2015 में जब पहली बार उन्हें जयपुर के जगतपुरा खेल परिसर में निशानेबाजी में हाथ आजमाने के लिए ले गए तो उनका मकसद दुर्घटना के दिव्यांग हुई बेटी की जिंदगी से मायूसी और अवसाद कम करके उसका दिल बहलाना था । अवनि ने भी पिता के जोर देने पर निशानेबाजी करना शुरू किया और मायूसी कम करने के लिये की गयी पहल का परिणाम तोक्यो पैरालंपिक में ऐतिहासिक स्वर्ण और कांस्य पदक के रूप में सामने आया।
वह शुरुआत में 'फुल-टाइम' निशानेबाज नहीं बनना चाहती थीं लेकिन अभिनव बिंद्रा (भारत के पहले ओलंपिक व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज) की आत्मकथा 'ए शॉट एट ग्लोरी' पढऩे के बाद वह इतनी प्रेरित हुईं कि उन्होंने अपने पहले ही पैरालंपिक में इतिहास रच दिया। उन्होंने दूसरा पदक जीतने के बाद ने कहा, ''जब मैंने अभिनव बिंद्रा सर की आत्मकथा पढ़ी थी तो मुझे इससे प्रेरणा मिली थी क्योंकि उन्होंने अपना शत प्रतिशत देकर भारत के लिये पहला व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीता था। '' उन्होंने कहा, ''मैं हमेशा उनकी (बिंद्रा की) तरह बनना चाहती थी और हमेशा अपने देश का नाम रोशन करना चाहती थी। '' लेखरा ने कहा, ''मैं खुश हूं कि मैं देश के लिये एक और पदक जीत सकी और मैं अभी तक इस पर विश्वास नहीं कर पा रही। ''
कोविड-19 महामारी से उनकी तोक्यो पैरालंपिक की तैयारियों पर असर पड़ा जिसमें उनके लिये जरूरी फिजियोथेरेपी दिनचर्या सबसे ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन उन्होंने इन रुकावटों से अपने जज्बे को प्रभावित नहीं होने दिया और पैरालंपिक में तिरंगा ऊंचा फहराने के साथ भारतीय राष्ट्र गान की धुनों को बजाने का मौका बनाकर सब का दिल जीत लिया।




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