शिक्षा और संस्कृति का संगम है मातृभाषा : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
नई दिल्ली। भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मंगलवार को ओडिशा के बालासोर में फकीर मोहन विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शिरकत की और विद्यार्थियों को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने विश्वविद्यालय के नए सभागार का उद्घाटन भी किया। अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि अपने विद्यार्थी जीवन में वे उनकी कालजयी कहानी ‘रेवती’ से अत्यंत प्रभावित रही हैं और इसका प्रभाव आज भी उनके मन में अमिट है। 19वीं शताब्दी में एक बालिका द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के दृढ़ संकल्प को उन्होंने साहस और सामाजिक चेतना का प्रतीक बताया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अपने जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने एक दूरस्थ आदिवासी गांव में पढ़ाई की और दृढ़ निश्चय के बल पर भुवनेश्वर जाकर हाई स्कूल और कॉलेज की शिक्षा पूरी की। उन्होंने कहा कि इस यात्रा में फकीर मोहन सेनापति उनके लिए प्रेरणास्रोत रहे।
राष्ट्रपति ने कहा कि फकीर मोहन को अपनी मातृभाषा से गहरा प्रेम था। उन्होंने लिखा था, “मेरी मातृभाषा मेरे लिए सर्वोपरि है।” राष्ट्रपति ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से विद्यार्थी अपने परिवेश, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी मातृभाषा के महत्व पर विशेष बल देती है।
द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। हमारे शास्त्र और पांडुलिपियां कविता और साहित्य के साथ-साथ विज्ञान, चिकित्सा, खगोल विज्ञान और वास्तुकला जैसे क्षेत्रों में भी ज्ञान का विशाल स्रोत हैं। उन्होंने युवाओं से इस प्राचीन ज्ञान परंपरा पर शोध करने का आह्वान किया।
राष्ट्रपति ने स्नातक छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि ज्ञान, लगन और प्रतिबद्धता के बल पर वे समाज में सम्मान और पहचान प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि सफल जीवन और सार्थक जीवन में अंतर होता है। प्रसिद्धि और आर्थिक सुरक्षा महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जीवन को सार्थक बनाना उससे भी अधिक आवश्यक है।
द्रौपदी मुर्मु छात्रों से आग्रह किया कि वे विकास की राह में पीछे रह गए लोगों की मदद करें। राष्ट्रपति ने कहा कि समाज का विकास तभी संभव है, जब सभी का विकास हो।
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि फकीर मोहन विश्वविद्यालय अकादमिक अध्ययन के साथ-साथ अनुसंधान और आउटरीच कार्यक्रमों को भी महत्व देता है। उन्होंने ‘बैक टू स्कूल’, ‘कमाओ और सीखो’ और ‘हर एक सिखाए’ जैसे कार्यक्रमों की सराहना की। साथ ही पर्यावरण जागरूकता और समुद्र तट सफाई अभियानों को भी प्रशंसनीय बताया।
द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि बालासोर-भद्रक क्षेत्र धान, पान और मछली के लिए प्रसिद्ध है। नीले केकड़ों और हॉर्सशू केकड़ों पर अनुसंधान केंद्र की स्थापना विश्वविद्यालय की दूरदर्शिता को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि समावेशी विकास, नवाचार और सामाजिक परिवर्तन में विश्वविद्यालयों की अहम भूमिका है और उन्हें इस दिशा में उत्प्रेरक बनकर कार्य करना चाहिए।




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