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नयी दिल्ली. अनिश्चित मानसून इस खरीफ मौसम में घुलनशील उर्वरक (सॉल्युबल फर्टिलाइजर) उद्योग के लिए मांग बढ़ाने वाला कारक बन सकता है, लेकिन इन उर्वरकों की कीमतों में आई तेज वृद्धि मांग पर अधिक बड़ा असर डाल सकती है। उद्योग संगठन 'सॉल्युबल फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसएफएआई)' ने रविवार को यह बात कही। एसएफएआई के अध्यक्ष राजीब चक्रवर्ती ने कहा कि चीन द्वारा निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित होने से पिछले एक वर्ष में प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में 60 से 100 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, "मौजूदा समय में कीमतें 60 से 100 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मोनो अमोनियम फॉस्फेट (एमएपी) की कीमत लगभग 1,000 डॉलर प्रति टन थी, जो अब बढ़कर 1,500 से 1,600 डॉलर प्रति टन हो गई है। चक्रवर्ती ने कहा, "प्रति टन 600 डॉलर की वृद्धि बहुत बड़ी बढ़ोतरी है।"
इस मौसम में उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि कीमतों में भारी वृद्धि के कारण खपत घटने की आशंका सबसे बड़ा जोखिम है। उन्होंने कहा, "जैसे ही कीमतें बहुत अधिक बढ़ जाती हैं, किसान इनका इस्तेमाल कम कर देते हैं। उन्होंने कहा कि कीमतों को नियंत्रित करना उद्योग के हाथ में नहीं है।
चक्रवर्ती ने कहा कि चीन द्वारा प्रमुख उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध और पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत के लिए आयात प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि देश में जल में घुलनशील उर्वरकों का घरेलू उत्पादन बहुत कम है। ऐसे में आयात में कमी की भरपाई घरेलू स्तर पर करना संभव नहीं है। चक्रवर्ती ने कहा कि कीमतों में तेजी के बावजूद फिलहाल आपूर्ति की स्थिति चिंताजनक नहीं है, क्योंकि पिछले वर्ष का बचा हुआ भंडार उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि पिछले साल प्रमुख कृषि क्षेत्रों में अधिक बारिश और बाढ़ के कारण इन उर्वरकों की खपत कम रही थी। उन्होंने कहा, "फिलहाल मुझे कोई बड़ी समस्या नहीं दिख रही है।"
हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि यदि इस मौसम में मांग तेजी से बढ़ी तो आगे की आपूर्ति पर दबाव पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि भारत हर साल लगभग चार लाख टन जल में घुलनशील उर्वरकों का आयात करता है और यह मात्रा लगातार बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि चालू वित्त वर्ष में कुल आयात दो लाख से 2.5 लाख टन रहने का अनुमान है, जिसमें से जून तक लगभग एक लाख टन उर्वरक भारत पहुंच चुका है। इन उर्वरकों की अधिकांश खपत सितंबर से मार्च के बीच होती है। चक्रवर्ती ने कहा कि ऊंची कीमतों के कारण किसान कम कीमत वाले विकल्पों की ओर रुख कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि कई किसान पहले ही सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) जैसे फॉस्फेट आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। हालांकि, इनमें फॉस्फोरस की मात्रा 20-22 प्रतिशत होती है, जबकि एमएपी में यह 61 प्रतिशत होती है, लेकिन इनकी कीमत काफी कम है। चक्रवर्ती ने कहा कि यदि किसान फिर से यूरिया और डीएपी जैसे पारंपरिक उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करने लगते हैं तो सरकार पर उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा। चक्रवर्ती ने कहा कि यदि इस मौसम में वर्षा असमान रहती है तो जल में घुलनशील उर्वरकों की मांग बढ़ सकती है, क्योंकि इनके उपयोग में पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में काफी कम पानी लगता है। उन्होंने कहा कि कपास जैसी फसलों में, जहां सामान्यतः एक मौसम में दो बार इन उर्वरकों का छिड़काव किया जाता है, शुष्क मौसम बने रहने पर इनका उपयोग बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, "यदि बारिश नहीं होगी तो पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगेंगी। ऐसे में किसान इन उर्वरकों का अधिक इस्तेमाल करेंगे।" उन्होंने कहा कि कृषि संकट की परिस्थितियों में विशेष प्रकार के उर्वरकों का उपयोग सामान्यतः बढ़ जाता है। - नई दिल्ली। देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को समय पर भुगतान दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। अब सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को एमएसएमई से खरीदी गई वस्तुओं और सेवाओं के बिलों का भुगतान टीआरईडीएस प्लेटफॉर्म के जरिए करना होगा।एमएसएमई मंत्रालय ने 30 जून 2026 को इस संबंध में अधिसूचना जारी की है। यह फैसला केंद्रीय बजट 2026-27 में की गई घोषणा के तहत लिया गया है।नई व्यवस्था के तहत सभी केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मंजूर टीआरईडीएस प्लेटफॉर्म के माध्यम से एमएसएमई के बिलों का निपटारा करना होगा।इस कदम से छोटे कारोबारियों को लंबे समय तक भुगतान का इंतजार नहीं करना पड़ेगा और उन्हें बिना गारंटी के आसानी से कार्यशील पूंजी मिल सकेगी।सरकार के अनुसार, एमएसएमई भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उद्यम पंजीकरण पोर्टल और उद्यम असिस्ट प्लेटफॉर्म पर 8.70 करोड़ से अधिक उद्यम पंजीकृत हैं, जो 38 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं।हालांकि, भुगतान में देरी लंबे समय से एमएसएमई क्षेत्र की बड़ी समस्या रही है। इससे कारोबारियों की पूंजी फंस जाती है और उनके विकास पर असर पड़ता है।नई व्यवस्था में एमएसएमई अपने मंजूर बिलों को तय समय से पहले ही नकदी में बदल सकेंगे। बैंक और वित्तीय संस्थान इन बिलों पर प्रतिस्पर्धी दरों पर वित्त उपलब्ध कराएंगे।टीआरईडीएस भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा नियंत्रित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसकी शुरुआत 2017 में हुई थी। इसके जरिए एमएसएमई को कंपनियों, सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों से मिलने वाले भुगतान के लिए वित्तीय सहायता मिलती है।वर्तमान में आरएक्सआईएल, एम1एक्सचेंज, इनवॉयसमार्ट, सी2टीआरईडीएस और डीटीएक्स जैसे पांच प्लेटफॉर्म काम कर रहे हैं।सरकार के मुताबिक, टीआरईडीएस के जरिए बिल छूट की राशि वित्त वर्ष 2021-22 में 40 हजार करोड़ रुपए से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 3.47 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। नई व्यवस्था से भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और एमएसएमई क्षेत्र को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी।
- नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र की डिजिटल तकनीक से जुड़ी एजेंसी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एजेंट्स पर भरोसा बढ़ाने और इनके सुरक्षित इस्तेमाल के लिए नई पहल की घोषणा की है। तेजी से विकसित हो रहे ऐसे AI सिस्टम को लेकर जवाबदेही और इंसानी नियंत्रण से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं।AI एजेंट्स कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई पीढ़ी के सिस्टम हैं, जो उपयोगकर्ताओं की ओर से स्वतंत्र रूप से कई तरह के काम कर सकते हैं। इनमें समय तय करने, खरीदारी करने और जटिल व्यावसायिक प्रक्रियाओं को संभालने जैसे कार्य शामिल हैं।अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) के अनुसार, AI एजेंट्स उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन इनके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े हैं। इनमें किसी व्यक्ति की पहचान का गलत इस्तेमाल करने या बिना अनुमति के फैसले लेने जैसी चुनौतियां शामिल हो सकती हैं।इन जोखिमों को देखते हुए आईटीयू ने जिनेवा में आयोजित ‘AI फॉर गुड समिट’ में एक विशेष समूह बनाने की घोषणा की है।यह समूह ऐसे ढांचे तैयार करेगा, जिससे AI एजेंट्स की पहचान, विश्वसनीयता और उन पर इंसानी नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।विशेष रूप से वित्तीय लेन-देन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में AI के सुरक्षित इस्तेमाल पर ध्यान दिया जाएगा।समूह की सह-अध्यक्ष डेबोरा कंपेरिन ने कहा कि आने वाले समय में AI एजेंट्स हमारी ओर से बातचीत, लेन-देन और फैसले लेने में सक्षम होंगे। इसलिए इनके लिए साझा अंतरराष्ट्रीय नियम और भरोसेमंद व्यवस्था बनाना जरूरी है।इस समूह में तकनीकी, नीतिगत और कानूनी विशेषज्ञ शामिल होंगे। इसकी पहली बैठक नवंबर में पेरिस और दूसरी बैठक जनवरी में जिनेवा में होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भविष्य में AI तकनीक को सुरक्षित, जिम्मेदार और भरोसेमंद बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।
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नई दिल्ली। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (डीपीआईआईटी) ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और घरेलू फुटवियर विनिर्माण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से फुटवियर से जुड़े दो गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूसीओ) में महत्वपूर्ण संशोधन किए हैं। नए प्रावधानों के तहत पुराने स्टॉक को बेचने की समय सीमा एक वर्ष बढ़ाकर 31 जुलाई 2027 कर दी गई है। साथ ही अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के लिए हर साल 4,500 जोड़ी फुटवियर नमूनों के आयात की अनुमति भी दी गई है।
डीपीआईआईटी द्वारा 12 जून 2026 को अधिसूचित संशोधनों के अनुसार, चमड़े तथा रबर एवं पॉलिमर सामग्री से बने फुटवियर से संबंधित गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों में बदलाव किया गया है। इसके तहत पुराने स्टॉक के निपटान की समय सीमा 31 जुलाई 2026 से बढ़ाकर 31 जुलाई 2027 कर दी गई है। सरकार का कहना है कि फुटवियर एक मौसमी उत्पाद है और इसका स्टॉक अक्सर एक बिक्री चक्र से अधिक समय तक आपूर्ति श्रृंखला में बना रहता है। ऐसे में अतिरिक्त समय मिलने से निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं को मौजूदा स्टॉक का व्यवस्थित तरीके से निपटान करने में सुविधा होगी। इसके बाद बाजार में केवल बीआईएस प्रमाणित फुटवियर की बिक्री सुनिश्चित करने का लक्ष्य है।संशोधित नियमों के तहत चमड़े और फुटवियर निर्माता अनुसंधान एवं विकास तथा अन्य गैर-व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए प्रति वर्ष 4,500 जोड़ी फुटवियर आयात कर सकेंगे। हालांकि, इन नमूनों की व्यावसायिक बिक्री नहीं की जा सकेगी। प्रत्येक नमूने पर स्पष्ट रूप से “बिक्री के लिए नहीं” अंकित होना अनिवार्य होगा और उपयोग के बाद उनका निर्धारित तरीके से निपटान करना होगा। निर्माताओं को इन आयातों का वर्षवार रिकॉर्ड भी रखना होगा, जिसे आवश्यकता पड़ने पर सरकार को उपलब्ध कराना होगा। सरकार के अनुसार यह छूट उत्पाद डिज़ाइन के मूल्यांकन, तकनीकी परीक्षण, दस्तावेज़ आधारित आकलन और भारत में स्थानीय उत्पादन के लिए आवश्यक नमूनों के परीक्षण में मदद करेगी। आयातित नमूनों का उपयोग केवल विक्रेता प्रस्तुति, डिज़ाइन मूल्यांकन और भारत में प्रतिकृति विकसित करने के लिए किया जा सकेगा।डीपीआईआईटी ने कहा कि ये संशोधन ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देने, अनुपालन प्रक्रिया को सरल बनाने, नवाचार को प्रोत्साहित करने और गुणवत्ता मानकों से समझौता किए बिना उद्योग संचालन को सुगम बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। यह पहल प्रधानमंत्री के “जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट” विनिर्माण दृष्टिकोण और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को मजबूत करेगी तथा भारत को गुणवत्तापूर्ण विनिर्माण का वैश्विक केंद्र बनाने में मदद करेगी। -
नयी दिल्ली. प्रौद्योगिकी कंपनी मेटा ने अपने अब तक के सबसे उन्नत एआई इमेज जनरेटर 'म्यूज इमेज' को पेश करने की घोषणा की है लेकिन इस कदम को डेटा गोपनीयता, इमेज-स्क्रैपिंग और सहमति से जुड़े सवालों के बीच आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। इमेज-स्क्रैपिंग का मतलब ऑनलाइन मंचों से तस्वीरों को उपयोगकर्ता की स्पष्ट अनुमति के बगैर स्वचालित रूप से इकट्ठा करने से है। कंपनी ने कहा कि 'म्यूज इमेज' मेटा सुपरइंटेलिजेंस लैब्स द्वारा विकसित पहला मीडिया-जनरेशन मॉडल है, जो निर्देशों का सटीक पालन, मल्टी-रेफरेंस कम्पोजिशन और तस्वीर संपादन जैसी क्षमताएं प्रदान करता है। मेटा ने कहा कि 'म्यूज इमेज' में 'कंटेंट सील' नामक एक अदृश्य वॉटरमार्किंग सिस्टम जोड़ा गया है, जिससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कोई तस्वीर एआई से बनाई गई है या नहीं। कंपनी ऐसे डिटेक्शन टूल का भी परीक्षण कर रही है, जो इस वॉटरमार्क की पहचान कर सके। यह सेवा फिलहाल मेटा एआई ऐप, मेटा.एआई और अमेरिका में इंस्टाग्राम स्टोरीज पर उपलब्ध है, जबकि कुछ देशों में सीमित तौर पर व्हाट्सऐप पर शुरू की गई है। इसे जल्द ही फेसबुक और अन्य मंचों पर भी उपलब्ध कराया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी के व्यापक इस्तेमाल से ऑनलाइन सामग्री की विश्वसनीयता को लेकर चुनौतियां बढ़ सकती हैं और उपयोगकर्ता सार्वजनिक रूप से साझा की जाने वाली सामग्री के प्रति अधिक सतर्क हो सकते हैं। विशेषज्ञों ने इस मॉडल के उस फीचर पर चिंता जताई है, जिसमें उपयोगकर्ता किसी इंस्टाग्राम यूजरनेम को निर्देश (प्रॉम्प्ट) में डालकर सार्वजनिक प्रोफाइल में मौजूद तस्वीरों के आधार पर एआई जनित तस्वीर तैयार कर सकते हैं। काउंटरपॉइंट रिसर्च के वरिष्ठ विश्लेषक प्राचीर सिंह ने कहा कि यह बदलाव सार्वजनिक इंस्टाग्राम अकाउंट के मायने बदल देता है। अब इसका मतलब केवल दृश्यता नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति की छवि का एआई सामग्री के लिए उपयोग भी हो सकता है, वह भी बिना स्पष्ट अनुमति के। साइबरमीडिया रिसर्च (सीएमआर) के उपाध्यक्ष (उद्योग शोध समूह) प्रभु राम ने कहा कि व्यवस्था से अलग होने का 'ऑप्ट-आउट' मॉडल आम तौर पर उपयोगकर्ताओं की निष्क्रियता का फायदा उठाता है, न कि सूचित सहमति को दर्शाता है।
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नयी दिल्ली. महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड जिंसों की बढ़ती लागत की भरपाई के लिए 10 जुलाई से अपने स्पोर्ट्स यूटिलिटी व्हीकल (एसयूवी) और वाणिज्यिक वाहनों की कीमतों में औसतन क्रमश: 2.7 प्रतिशत और दो प्रतिशत की वृद्धि करेगी। कंपनी ने एक बयान में कहा, "कीमतों में यह वृद्धि मुख्य रूप से जिंस लागत में बढ़ोतरी के कारण की जा रही है।" कंपनी ने कहा कि कीमतों में वृद्धि की मात्रा अलग-अलग उत्पादों के आधार पर अलग-अलग होगी। महिंद्रा एंड महिंद्रा के एसयूवी पोर्टफोलियो में लोकप्रिय स्कॉर्पियो श्रृंखला, थार, एक्सयूवी 3एक्सओ और एक्सयूवी 7एक्सओ समेत अन्य मॉडल शामिल हैं। इन वाहनों की शोरूम कीमतें 7.54 लाख रुपये से लेकर 25.07 लाख रुपये तक हैं।
- रेडमंड (वाशिंगटन). दिग्गज प्रौद्योगिकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट वैश्विक स्तर पर करीब 4,800 कर्मचारियों की छंटनी करेगी, जो उसके कुल कार्यबल का लगभग 2.1 प्रतिशत है। इस कटौती के दौरान कंपनी के वीडियो गेम कारोबार एक्सबॉक्स से बड़ी संख्या में कर्मचारी प्रभावित होंगे। माइक्रोसॉफ्ट ने सोमवार को कहा कि एक्सबॉक्स इकाई में लगभग 1,600 कर्मचारियों की छंटनी की गई है और चालू वित्त वर्ष में अन्य 1,600 पद भी समाप्त किए जाएंगे। कारोबार पुनर्गठन के तहत कुल 4,800 कर्मचारियों को हटाया जा रहा है। एक्सबॉक्स की मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) आशा शर्मा ने एक आंतरिक संदेश में कहा कि मौजूदा समय में कारोबार की स्थिति संतोषजनक नहीं है और इसके लाभ मार्जिन समान उद्योग की कंपनियों के मुकाबले काफी कम हैं। उन्होंने कहा कि गेमिंग कंसोल के पुर्जों की लागत बढ़ने से गेमिंग उद्योग दबाव में है। एक्सबॉक्स का मुकाबला सोनी के 'प्लेस्टेशन' और निनटेंडो के 'स्विच' से है। शर्मा ने कहा कि कंपनी पहले अधिग्रहीत चार वीडियो गेम डेवलपमेंट स्टूडियो को अलग कर रही है।माइक्रोसॉफ्ट की मुख्य मानव संसाधन अधिकारी एमी कोलमैन ने कहा कि यह छंटनी ग्राहकों की जरूरतों में बदलाव के कारण की जा रही है और हटाए गए पदों की जगह कृत्रिम मेधा (एआई) नहीं ले रही है।
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नयी दिल्ली. राष्ट्रीय राजधानी के सर्राफा बाजार में सोमवार को सोने की कीमतें 150 रुपये टूटकर 1,50,650 रुपये प्रति 10 ग्राम रह गईं। वहीं चांदी 5,000 रुपये के नुकसान में रही। वैश्विक स्तर पर सुस्ती के रुख और मजबूत डॉलर के कारण कारोबारियों ने कीमती धातुओं में अपने सौदों के आकार को कम किया जिससे सर्राफा कीमतों में गिरावट आई। 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाले सोने की कीमत पिछले सत्र में 1,50,800 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुई थी। स्थानीय कारोबारियों के अनुसार, चांदी की चार दिन की तेजी थम गई और यह शुक्रवार के 2,45,000 रुपये प्रति किलोग्राम के बंद भाव से 5,000 रुपये टूटकर 2,40,000 रुपये प्रति किलोग्राम (सभी करों सहित) रह गई। व्यापारियों ने कहा कि बाजार एक दायरे में रहा क्योंकि निवेशकों ने मजबूत डॉलर और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति से जुड़ी उम्मीदों के बीच पश्चिम एशिया में बने भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच संतुलन बनाया। लेमन मार्केट्स डेस्क के शोध विश्लेषक, गौरव गर्ग ने कहा, ''सोमवार को घरेलू बाजारों में सोने की कीमतों में मामूली गिरावट आई, क्योंकि निवेशक अमेरिका-ईरान संबंधों की जटिल स्थिति को देख रहे है और साथ ही अमेरिका से महत्वपूर्ण मुद्रास्फीति आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं।'' अंतरराष्ट्रीय बाजारों में, हाजिर सोने और चांदी की कीमतें क्रमशः 4,160.60 डॉलर और 62.24 डॉलर प्रति औंस तक गिर गईं। मिराए एसेट शेयरखान में जिंस प्रमुख प्रवीण सिंह ने कहा, ''मजबूत डॉलर के कारण विदेशी व्यापार में सोने की कीमत गिरी है, क्योंकि व्यापारी इस साल अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में बढ़ोतरी की संभावना को ध्यान में रख रहे हैं।''
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नयी दिल्ली। रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने रविवार को कहा कि पश्चिम एशिया में हाल के संघर्ष से भारत की उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला पर अधिक असर नहीं पड़ा है। देश के लिए उर्वरक और कच्चा माल लाने वाले 20 में से 15 जहाज सुरक्षित होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर चुके हैं। इनमें से आठ जहाजों में 3.32 लाख टन यूरिया, चार जहाजों में 2.57 लाख टन डीएपी और तीन जहाजों में 1.11 लाख टन सल्फर है। ये सभी निर्धारित समय के अनुसार भारतीय बंदरगाहों पर आ रहे हैं। पांच और जहाज आने वाले हैं, जिनमें से एक में 0.25 लाख टन अमोनिया और दूसरे में 0.45 लाख टन यूरिया है। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि अभी दो और यूरिया जहाजों और एक सल्फर जहाज पर माल लादा जा रहा है। उम्मीद है कि सभी योजना के अनुसार पहुंच जाएंगे। केंद्र सरकार ने कहा कि हालांकि पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात में रुकावट आई, लेकिन 'समय पर योजना बनाने, बेहतर तालमेल और लगातार निगरानी' के जरिए उर्वरकों की बिना रुकावट आपूर्ति सुनिश्चित की गयी है। कूटनीतिक प्रयासों के जरिये आपूर्ति के नये स्रोत भी तलाशे गए।
ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्किये और नीदरलैंड से यूरिया की आपूर्ति की व्यवस्था की गयी है। भारत ने डीएपी और एनपीके (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम) रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब से लाल सागर के रास्ते से मंगवाया। केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है। इससे उर्वरक की कीमतें बढ़ गई हैं और निर्यात में लगने वाला समय भी बढ़ा है। भारत भी इसके असर से अछूता नहीं रहा है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कीमतों में वैश्विक उछाल के बावजूद सरकार ने किसानों के हितों की रक्षा की है और इसका श्रेय प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में उर्वरक विभाग द्वारा उठाए गए सक्रिय कदमों को जाता है। उर्वरक संयंत्रों को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पश्चिम एशिया संकट के दौरान लगभग 65 प्रतिशत तक घट गई थी, वह अब पूरी तरह से बहाल हो गई है। इससे देश भर के सभी यूरिया संयंत्र पूरी क्षमता से काम कर रहे हैं। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में घरेलू यूरिया उत्पादन 67.86 लाख टन के लक्ष्य के मुकाबले 71.55 लाख टन रहा। यह लक्ष्य से 3.69 लाख टन अधिक है। डीएपी का उत्पादन 8.61 लाख टन के लक्ष्य के मुकाबले 9.84 लाख टन तक पहुंच गया, जबकि एनपीके का उत्पादन 20.77 लाख टन और एसएसपी (सिंगल सुपर फॉस्फेट) का उत्पादन 13.50 लाख टन रहा। भारत ने 383.9 लाख टन की वार्षिक आवश्यकता के मुकाबले 197.56 लाख टन उर्वरक का भंडार हासिल कर लिया है। यह वार्षिक आवश्यकता का 51 प्रतिशत से अधिक है। मंत्रालय ने कहा कि अलग-अलग स्रोतों से आयात, अधिक घरेलू उत्पादन और पर्याप्त भंडार के कारण देश भर में उर्वरक की संतोषजनक उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। उन्होंने समय पर आपूर्ति के उपायों के माध्यम से किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया। -
नयी दिल्ली. भारत का जनसंपर्क (पीआर) उद्योग वित्त वर्ष 2030 तक 4,500 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। वित्त वर्ष 2025-26 में यह उद्योग 11 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 3,230 करोड़ रुपये पर पहुंच गया। एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई। पब्लिक रिलेशंस कंसल्टेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (पीआरसीएआई) की स्प्रिंट 2026 रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में 11 प्रतिशत की वृद्धि दर पिछले एक दशक की 12 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) की तुलना में कुछ कम रही, जो इस उद्योग के परिपक्व होने का संकेत देती है। यहां बृहस्पतिवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय पीआर उद्योग की एशिया-प्रशांत बाजार में हिस्सेदारी 12.6 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के अनुसार, 2022 से 2026 के बीच प्रमुख ग्राहक श्रेणियों में सरकारी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग तीन गुना बढ़कर चार प्रतिशत से 11 प्रतिशत हो गई। वहीं, उद्योग के प्रमुख ग्राहक रहे निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 48 प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत रह गई। समान अवधि में स्टार्टअप की हिस्सेदारी लगभग चार गुना बढ़कर छह प्रतिशत से 22 प्रतिशत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, पीआर उद्योग में कृत्रिम मेधा (एआई) पर निवेश पिछले तीन साल में राजस्व के दो प्रतिशत से बढ़कर सात प्रतिशत हो गया है। हालांकि, बड़ी, मझोली और उभरती कंपनियां एआई को लेकर अलग-अलग रणनीतियों पर काम कर रही हैं।
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नई दिल्ली। इस्पात मंत्रालय ने अनुसूची 'ए' के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम (सीपीएसई) मेटलर्जिकल एंड इंजीनियरिंग कंसल्टेंट्स (इंडिया) लिमिटेड (मेकॉन) को मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा देने की मंजूरी दे दी है। मेकॉन ने हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण वित्तीय उपलब्धियां हासिल की हैं। कंपनी ने पिछले तीन वित्तीय वर्षों में लगातार लाभ दर्ज किया है, जिसमें वित्त वर्ष 2023-24 (पुनर्घोषित) में 77.62 करोड़ रुपये, वित्त वर्ष 2024-25 (पुनर्घोषित) में 32.08 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2025-26 में 104.53 करोड़ रुपये का कर-पूर्व लाभ (पीबीटी) शामिल है। कंपनी ने 31 मार्च 2026 तक 535.42 करोड़ रुपये की सकारात्मक शुद्ध संपत्ति भी दर्ज की है, जिससे वह सार्वजनिक उद्यम विभाग (डीपीई) द्वारा मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा प्राप्त करने के लिए निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूरा करती है।
मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा मिलने से मेकॉन लिमिटेड के बोर्ड को वित्तीय और परिचालन संबंधी स्वायत्तता में वृद्धि प्राप्त हुई है। शक्तियों के इस बढ़े हुए प्रत्यायोजन से कंपनी को निवेश, आधुनिकीकरण पहल, तकनीकी उन्नयन और व्यापार विस्तार परियोजनाओं को अधिक लचीलेपन और गति के साथ क्रियान्वित करने में मदद मिलेगी, जिससे इसके भविष्य के विकास पथ को बल मिलेगा।वर्ष 1959 में स्थापित और रांची में मुख्यालय वाली मेकॉन लिमिटेड देश की प्रमुख इंजीनियरिंग, परामर्श, परियोजना प्रबंधन और ठेका देने वाली कंपनियों में से एक है। कंपनी ने देश के इस्पात क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कंपनी ने खनन, अवसंरचना, बिजली, तेल एवं गैस तथा अर्थव्यवस्था के अन्य प्रमुख क्षेत्रों में अपने परिचालन का विस्तार किया है।यह निर्णय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) को अधिक स्वायत्तता और परिचालन लचीलापन प्रदान करके उन्हें सशक्त बनाने के प्रति सरकार की निरंतर प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। यह निर्णय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को मजबूत करने, उनकी दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करने और उन्हें देश के आर्थिक तथा अवसंरचना विकास में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम बनाने के व्यापक उद्देश्य के अनुरूप है। -
नयी दिल्ली. देश की सबसे बड़ी निजी ईंधन खुदरा विक्रेता कंपनी नायरा एनर्जी ने देशभर में पेट्रोल की कीमत में पांच रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में तीन रुपये प्रति लीटर की कटौती की है। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने से अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में गिरावट के बीच यह कटौती की गई। पिछले दो साल में किसी कंपनी ने पहली बार ईंधन की खुदरा कीमतों में कटौती की है। पश्चिम एशिया में तनाव अपेक्षाकृत कम होने और एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग फिर से खुलने से कच्चे तेल तथा एलएनजी की आपूर्ति बहाल हुई है। इससे आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम हुई और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई। उद्योग से जुड़े सूत्रों ने बताया कि संशोधित दरें देशभर में नायरा के 7,000 से अधिक पेट्रोल पंप पर लागू हो गई हैं। मूल्य वर्धित कर (वैट) जैसे स्थानीय करों के कारण विभिन्न राज्यों में पेट्रोल पंपों पर कीमतें अलग-अलग होती हैं। हालांकि, सार्वजनिक क्षेत्र की ईंधन खुदरा विक्रेता कंपनियों ने कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। सरकारी स्वामित्व वाली इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) ने कीमतों में किसी संशोधन की घोषणा नहीं की।
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मुंबई. सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र में वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान नियुक्तियों में 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसमें बिक्री और कारोबार विकास से जुड़े कार्यों की हिस्सेदारी कुल मांग का 40 प्रतिशत रही। एक रिपोर्ट में बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी गई है। प्रारंभिक करियर प्रतिभा मंच 'अपना' की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में मंच पर नियुक्तियों में 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई और इसके अगले वित्त वर्ष में भी इसी तरह की प्रवृत्ति के जारी रहने की संभावना है। यह रिपोर्ट मंच पर उपलब्ध 4.5 लाख से अधिक नौकरी विज्ञापनों के विश्लेषण पर आधारित है।
रिपोर्ट के अनुसार, बिक्री और कारोबार विकास से जुड़े कौशल की मांग वित्त वर्ष 2025-26 में 40 प्रतिशत हो गई, जो 2024-25 में 36 प्रतिशत थी। सबसे अधिक मांग वाले पदों में संचार बिक्री, लेखांकन और कराधान, क्षेत्रीय बिक्री तथा ग्राहक सहायता शामिल हैं। इसके साथ ही, कृत्रिम मेधा (एआई) से जुड़े कौशल की मांग में 2025-26 के दौरान 164 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि छोटे और मझोले उद्यम अपने कारोबार के विस्तार के साथ डिजिटल क्षमताओं में तेजी से निवेश कर रहे हैं। -
नयी दिल्ली. सरकार ने पश्चिम एशिया संकट का दबाव कम होने के साथ बृहस्पिवार को होटल, रेस्टरां जैसे वाणिज्यिक ग्राहकों के लिए तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की आपूर्ति को संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया। साथ ही, हाल ही में हुए पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के लिए आपूर्ति को लेकर लगाये गये प्रतिबंधों को भी हटा लिया। यह कदम बताता है कि वैश्विक बाजार के स्थिर होने के साथ ही ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं कम हो रही हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि घरेलू उत्पादन में सुधार और आयातित एलपीजी कार्गो के आने की उम्मीद के बाद वाणिज्यिक एलपीजी पर लगे प्रतिबंध हटा लिए गए हैं। संकट की शुरुआत में रोकी गई थोक एलपीजी की आपूर्ति को भी संकट से पहले के खपत स्तर के 50 प्रतिशत तक आंशिक रूप से बहाल कर दिया गया है। यह कदम सरकार द्वारा पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान लागू किए गए आपातकालीन उपायों को वापस लेने की दिशा में उठाया गया एक और कदम है। उस समय पश्चिम एशिया में आपूर्ति में रुकावट की आशंका के कारण अधिकारियों ने घरेलू रसोई गैस की उपलब्धता को प्राथमिकता दी थी। ये प्रतिबंध ईरान संघर्ष के कारण पश्चिम एशिया से एलपीजी की आपूर्ति बाधित होने के बाद लगाए गए थे। भारत अपनी रसोई गैस का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा यहीं से आयात करता है। घरेलू खपत को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने शुरू में होटल, रेस्तरां और औद्योगिक ग्राहकों को वाणिज्यिक एलपीजी की आपूर्ति रोक दी थी। बाद में आपूर्ति को चरणबद्ध तरीके से सामान्य स्तर के लगभग 70 प्रतिशत तक बहाल किया गया। हालांकि, कई क्षेत्रों को अब भी अपने सामान्य आवंटन के 50 प्रतिशत तक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा था। इसका कारण अधिकारी आयात की उपलब्धता को लेकर चिंताओं के बीच ईंधन भंडार को बचाना चाहते थे। बयान के अनुसार, ''औद्योगिक और वाणिज्यिक एलपीजी ग्राहकों के लिए बड़ी राहत के तौर पर, सरकार ने गैर-घरेलू एलपीजी की आपूर्ति को लेकर विभिन्न क्षेत्रों पर लगे प्रतिबंध हटा दिए हैं और आपूर्ति को पश्चिम एशिया संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया है।'' साथ ही, संकट की शुरुआत में रोकी गई थोक एलपीजी की आपूर्ति में संकट से पहले के खपत स्तर के 50 प्रतिशत तक ढील दी गई है। इससे वाणिज्यिक और औद्योगिक ग्राहकों को काफी राहत मिली है। बयान के अनुसार, यह बहाली एलपीजी आपूर्ति की स्थिति में हाल में आये सुधार के बाद की गई है।
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नयी दिल्ली. सरकार ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत ने कम 'लॉजिस्टिक्स' लागत वाले समुद्री रास्ते से सिंगापुर को 4.3 टन बंगनपल्ली आम का निर्यात किया है। कृषि मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान में कहा कि समुद्री रास्ते से लॉजिस्टिक्स लागत हवाई निर्यात खेप की तुलना में काफी कम थी। मंत्रालय ने कहा, ''भारत के ताजे फलों के निर्यात क्षेत्र के लिए एक बड़ी कामयाबी के तौर पर, भारतीय आम समुद्री खेप के जरिये सफलतापूर्वक सिंगापुर पहुंच गए हैं। यह अंतरराष्ट्रीय बाजारों में किफायती और बड़े पैमाने पर आम के निर्यात को बढ़ाने की दिशा में एक अहम मील का पत्थर है।'' लखनऊ स्थित आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टिट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर (आईसीएआर-सीआईएसएच) ने एपिडा के सहयोग से आम के निर्यात के लिए समुद्री खेप का एक वैज्ञानिक प्रोटोकॉल तैयार किया है। मंत्रालय ने कहा, ''इस पहल के तहत, आंध्र प्रदेश से 4.3 टन बंगनपल्ली आमों की एक खेप रीफर कंटेनर के जरिये सिंगापुर भेजी गई।'' समुद्री रास्ते से लॉजिस्टिक्स लागत में काफी कमी आती है; हवाई खेप के लिए यह लागत 150-250 रुपये प्रति किलोग्राम होती है, जबकि समुद्री रास्ते से यह 13-20 रुपये प्रति किलोग्राम रहने का अनुमान है। कम लॉजिस्टिक लागत ने उत्पादकों और निर्यातकों के लिए निर्यात को अधिक फायदेमंद बना दिया है। बयान में कहा गया, ''आईसीएआर-सीआईएसएच द्वारा विकसित प्रोटोकॉल में शुरू से आखिर तक गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली प्रणाली शामिल है, जिसमें रसायन अवशेष-मुक्त उत्पादन, अच्छी कृषि पद्धतियां (जीएपी), वैज्ञानिक तरीके से तुड़ाई, ग्रेडिंग, पैकिंग और तुड़ाई के बाद का प्रबंधन शामिल है।''
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नयी दिल्ली. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमत पश्चिम एशिया में तनाव शुरू होने से पूर्व के स्तर पर आ गयी है। इससे महंगाई का खतरा कम होने, आयात बिल घटने और सरकार की वित्तीय स्थिति में सुधार के साथ दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कच्चा तेल आयातक भारत के लिए स्थिति काफी अनुकूल हो गयी है। वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत टूटकर लगभग 72-73 डॉलर प्रति बैरल, जबकि अमेरिकी कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है। इससे उस भू-राजनीतिक जोखिम के कारण बढ़ी हुई कीमत का असर खत्म हो गया है, जिसके कारण इस साल की शुरुआत में तनाव बढ़ने पर दाम 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। दोनों मानक अब फरवरी के आखिर के स्तर के करीब आ गए हैं। कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बावजूद बृहस्पतिवार को खुदरा ईंधन के दाम में कोई बदलाव नहीं हुआ। हाल ही में वैश्विक स्तर पर तेल के दाम में तेजी के दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। हालांकि, उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र के खुदरा ईंधन विक्रेताओं ने अब तक पेट्रोल पंप पर कीमतें कम नहीं की हैं। अधिकारियों ने बताया कि सार्वजनिक क्षेत्र की तीन खुदरा ईंधन विक्रेता अभी पेट्रोल पर अच्छा विपणन मार्जिन कमा रहे हैं। हालांकि, डीजल की बिक्री से अब भी थोड़ा नुकसान हो रहा है। कंपनियों ने वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद लगभग ढाई महीने तक खुदरा कीमतें स्थिर रखी थीं और उसके बाद ही कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी की थी। उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल बाजार में रोजाना होने वाले उतार-चढ़ाव के आधार पर तय नहीं की जाती हैं, बल्कि आमतौर पर पिछले दो सप्ताह या महीने की औसत तेल कीमतों के आधार पर तय की जाती हैं। इसके कारण, अगर अंतरराष्ट्रीय दरें कम बनी रहती हैं, तो कच्चे तेल की कीमतों में हाल की गिरावट का फायदा पेट्रोल पंप तक पहुंचने में समय लग सकता है। भारत जो कच्चा तेल खरीदता है, उसकी कीमत ईरान पर अमेरिका और इजाइल के हमले से एक दिन पहले 27 फरवरी को औसतन 71.17 डॉलर प्रति बैरल थी। इस हमले के जवाब में ईरान ने बड़े पैमाने पर जवाबी कार्रवाई की, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावी रूप से बंद हो गया। इस रास्ते से खाड़ी देशों से भारत जैसे देशों को तेल और गैस की आपूर्ति होती थी। पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के आंकड़ों के अनुसार, 24 जून को भारत में आयातित होने वाले कच्चे तेल की औसत कीमत 70.71 डॉलर प्रति बैरल थी। जून महीने के लिए, कच्चे तेल की औसत कीमत 86.31 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि फरवरी, 2026 में यह औसत 72.47 डॉलर प्रति बैरल थी। ब्रेंट क्रूड की कीमतें अब संघर्ष से पहले के स्तर के करीब आ गई हैं। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक हाल के उच्चतम स्तर से नीचे बनी रहती हैं, ईंधन बेचने वाली कंपनियों और सरकार पर यह दबाव बढ़ सकता है कि वे कुछ फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचाएं। ईंधन की कम कीमतें महंगाई के दबाव को और कम कर सकती हैं। यह गिरावट होर्मुज जलडमरूमध्य से टैंकर की आवाजाही सामान्य होने के बाद हुई है। इस रास्ते से दुनिया भर की तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा आता है। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि पिछले 24 घंटों में इस जलमार्ग से कम से कम दो करोड़ बैरल तेल गुजरा है और आपूर्ति का प्रवाह युद्ध से पहले के स्तर के करीब पहुंच गया है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में प्रति बैरल 10 डॉलर की गिरावट का मतलब है कि उसके आयात बिल में सालाना अरबों डॉलर की बचत होगी और इससे चालू खाते के घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से ईंधन, परिवहन और विनिर्माण लागत कम होने की उम्मीद है, जिससे खुदरा महंगाई का दबाव कम हो सकता है। इससे ऊर्जा सब्सिडी का बोझ भी कम हो सकता है और परिणामस्वरूप सरकारी वित्त में सुधार हो सकता है। तेल की कम कीमतें विमानन, पेंट, रसायन, लॉजिस्टिक और उपभोक्ता वस्तु जैसे क्षेत्र के लिए खास तौर पर फायदेमंद हैं, क्योंकि इनमें ईंधन और पेट्रोरसायन से बनी चीजें लागत का बड़ा हिस्सा होती हैं। कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से डॉलर की मांग कम होती है, क्योंकि ऊर्जा आयात के लिए डॉलर की जरूरत होती है। इससे रुपये की स्थिति भी मजबूत होती है। तेल का बिल कम होने से आयातित महंगाई को काबू में रखने और घरेलू खपत को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है, जो भारत की आर्थिक वृद्धि के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारतीय रिजर्व बैंक के लिए, अगर महंगाई काबू में रहती है, तो ऊर्जा की कम कीमतें 'उदार मौद्रिक नीति' बनाए रखने के पक्ष को और मजबूत कर सकती हैं। इससे आर्थिक गतिविधियों को और बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन बृहस्पतिवार के घटनाक्रम से कीमतें संघर्ष से पहले के स्तर पर लौट आई हैं। इससे तेल पर सबसे अधिक निर्भर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से भारत को राहत मिली है।
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नयी दिल्ली. विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक मंडल ने निजी क्षेत्र आधारित रोजगार सृजन और आर्थिक वृद्धि को तेज करने के उद्देश्य से भारत के संरचनात्मक सुधारों के समर्थन के लिए 1.5 अरब डॉलर के वित्तपोषण को मंजूरी दी है। यह वित्तपोषण 'निजी क्षेत्र में रोजगार सृजन को बढ़ावा' कार्यक्रम के तहत दिया जा रहा है। इससे अगले दो दशकों में कार्यबल में शामिल होने वाले करीब 1.1 करोड़ युवाओं के लिए रोजगार अवसरों के सृजन में मदद मिलने की उम्मीद है। विश्व बैंक ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि यह कार्यक्रम हाल के वर्षों में किए गए सुधारों पर आधारित है, जिनमें कर प्रणाली का सरलीकरण, व्यापार एकीकरण, नियामकीय बदलाव और कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने के उपाय शामिल हैं। विकास नीति वित्तपोषण (डीपीएफ) के तहत उद्यमिता में बाधाओं को कम करने, खासकर महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाने, व्यापार और निवेश प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा व्यवसायों के लिए पूंजी तक पहुंच बेहतर करने की पहल को समर्थन दिया जाएगा। सरकार ने नवंबर, 2025 में 29 श्रम कानूनों को मिलाकर चार व्यापक श्रम संहिताएं लागू की थीं। इसका उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना, पुराने प्रावधानों का आधुनिकीकरण और कारोबार के लिए अधिक प्रभावी ढांचा तैयार करने के साथ श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित करना है। विश्व बैंक के उपाध्यक्ष (दक्षिण एशिया) जोहान्स जुट ने कहा, "वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत निजी पूंजी को आकर्षित करने और रोजगार सृजन के लिए अपने सुधार एजेंडा पर अच्छी गति से आगे बढ़ रहा है।" डीपीएफ कार्यक्रम विश्व बैंक समूह की निजी क्षेत्र इकाई अंतरराष्ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) के हालिया निवेशों के पूरक के रूप में भी काम करेगा, जो एमएसएमई और वंचित समुदायों, खासकर ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों की महिलाओं के लिए ऋण उपलब्धता बढ़ाने पर केंद्रित हैं।
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नयी दिल्ली. भारत ने चीन, यूरोपीय संघ और अमेरिका से आयातित एक रसायन पर पांच साल के लिए डंपिंग रोधी शुल्क लगाया है। इस रसायन का इस्तेमाल रबड़ और टायर उद्योग में होता है। वित्त मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, यह शुल्क वाणिज्य मंत्रालय की इकाई व्यापार उपचार महानिदेशालय (डीजीटीआर) की सिफारिश के बाद लगाया गया है। यह शुल्क 75 अमेरिकी डॉलर प्रति टन से 1,748 अमेरिकी डॉलर प्रति टन के बीच है। डीजीटीआर की 19 जून की अधिसूचना में कहा गया, '' इस अधिसूचना के तहत लगाया गया डंपिंग रोधी शुल्क पांच वर्षों की अवधि के लिए लागू रहेगा (जब तक कि इसे रद्द, प्रतिस्थापित या संशोधित न किया जाए)। '' महानिदेशालय ने तीनों क्षेत्रों से 'सल्फेनामाइड्स एक्सेलेरेटर्स' के आयात पर शुल्क की सिफारिश की है, क्योंकि इसे भारतीय बाजार में सामान्य मूल्य से कम दाम पर निर्यात किया गया। इससे डंपिंग हुई और घरेलू उद्योग को गंभीर नुकसान पहुंचा। भारत ने चीन, मलेशिया, थाइलैंड और इंडोनेशिया से आयातित 'एल्युमिनियम फॉयल' पर डंपिंग रोधी शुल्क को भी बढ़ा दिया है। राजस्व विभाग ने एक अलग अधिसूचना में कहा कि यह शुल्क इस वर्ष 15 दिसंबर तक लागू रहेगा।
एक अन्य अधिसूचना में विभाग ने कहा कि भारत ने चीन से आयातित 'पॉलिएथिलीन टेरेफ्थेलेट रेजिन' पर पांच वर्षों के लिए 200.66 अमेरिकी डॉलर प्रति टन का डंपिंग रोधी शुल्क लगाया है। देशों द्वारा डंपिंग रोधी जांच यह पता लगाने के लिए की जाती है कि सस्ते आयात में वृद्धि के कारण घरेलू उद्योगों को नुकसान हुआ है या नहीं। देश जिनेवा स्थित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के बहुपक्षीय ढांचे के तहत प्रतिरोधात्मक उपाय के रूप में ऐसे शुल्क लगाते हैं। इस शुल्क का उद्देश्य निष्पक्ष व्यापार व्यवहार को सुनिश्चित करना और घरेलू उत्पादकों को विदेशी उत्पादकों तथा निर्यातकों के मुकाबले समान अवसर प्रदान करना है। -
नयी दिल्ली. सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल एंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) अब केवल 'तेल और गैस' नहीं बल्कि 'गैस और तेल' कंपनी बन चुकी है। कंपनी के चेयरमैन अरुण कुमार सिंह ने यह बात कही है। सिंह ने कहा कि अब कंपनी के पोर्टफोलियो में प्राकृतिक गैस का हिस्सा कच्चे तेल से अधिक हो गया है।
सिंह ने विश्लेषकों से बातचीत में कहा कि ओएनजीसी के कुल उत्पादन में अब गैस का योगदान तेल से थोड़ा अधिक है और भविष्य में कंपनी की वृद्धि मुख्य रूप से गैस उत्पादन के दम पर होगी। उन्होंने कहा कि बड़े नए तेल भंडारों की खोज नहीं होने की स्थिति में कच्चे तेल का उत्पादन लगभग स्थिर रहने की संभावना है, जबकि गैस उत्पादन लगातार बढ़ेगा। उन्होंने कहा, ''गैस अब हमारे पोर्टफोलियो में तेल से थोड़ी अधिक है। इसलिए हमें तेल एवं गैस कंपनी नहीं, बल्कि गैस एवं तेल कंपनी कहा जाना चाहिए।'' सिंह के अनुसार, भारत में प्राकृतिक गैस की मांग लगातार बढ़ रही है। परिवहन क्षेत्र में गैस के उपयोग का विस्तार, सरकार की मूल्य निर्धारण सुधार नीतियां और नए गैस क्षेत्रों का विकास इसे अधिक आकर्षक बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि गैस को भारत के ऊर्जा परिदृश्य में अधिक मूल्यवान ईंधन माना जा रहा है। उन्होंने बताया कि ओएनजीसी के कुल गैस उत्पादन में 'नए गैस कुओं' का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है और यह फिलहाल कुल गैस उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत है। निकट भविष्य में इसके 30-36 प्रतिशत तक पहुंचने और आगे चलकर कंपनी के गैस पोर्टफोलियो में प्रमुख हिस्सेदारी लेने की संभावना है, क्योंकि पुराने गैस क्षेत्रों का उत्पादन धीरे-धीरे घटेगा। सिंह ने कहा कि कंपनी अगले कुछ वर्षों में गैस उत्पादन में सालाना 7-8 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य लेकर चल रही है। यह वृद्धि डीयूडीपी, डीएसएफ क्षेत्रों तथा 98/2 जैसी अपतटीय (ऑफशोर) परियोजनाओं से मिलेगी, जिनमें से कई अगले वित्त वर्ष में उत्पादन शुरू करेंगी। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा रॉयल्टी में कमी, बाजार आधारित मूल्य निर्धारण व्यवस्था को बढ़ावा और गहरे समुद्र में अन्वेषण के लिए समर्थन जैसी नीतियों से इस क्षेत्र की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है तथा अपस्ट्रीम कंपनियों के पास अधिक राजस्व बच रहा है। ओएनजीसी समूह के कारोबार में अन्वेषण एवं उत्पादन (ईएंडपी) खंड की हिस्सेदारी लगभग दो-तिहाई है। कंपनी हर वर्ष करीब 500 कुओं की खुदाई करती है, जिनमें खोजी और उत्पादन दोनों प्रकार के कुएं शामिल हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का आरक्षित नियोजन अनुपात 1.1 से अधिक रहा, जो यह दर्शाता है कि उत्पादित भंडारों की भरपाई सफलतापूर्वक की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की स्वच्छ ऊर्जा रणनीति और बढ़ती गैस खपत को देखते हुए ओएनजीसी का यह गैस-केंद्रित बदलाव कंपनी के दीर्घकालिक विकास के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। सिंह ने कहा कि कंपनी करीब 33,000 करोड़ रुपये की अपतटीय परियोजनाओं का कार्यान्वयन कर रही है।
विदेशी परिचालन पर ओएनजीसी के चेयरमैन ने कहा कि रूस की सखालिन परियोजना से उत्पादन स्थिर बना हुआ है। वहीं, मोजाम्बिक की एलएनजी परियोजना में प्रगति हो रही है और इसके 2028 तक पूरा होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि वेनेजुएला में भी उत्पादन बढ़ने की संभावनाएं हैं, बशर्ते वहां नियामकीय और परिचालन संबंधी परिस्थितियां अधिक अनुकूल हों। -
नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्रों में पुराने ट्रकों और बसों को बदलने की भारत सरकार की योजना के तहत, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय तथा महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड और एसएमएल महिंद्रा के बीच शुक्रवार को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
इस समझौते के तहत, मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) योजना के अंतर्गत खरीदे जाने वाले पात्र ट्रकों और बसों के एक्स-शोरूम मूल्य पर 8 प्रतिशत की छूट प्रदान करेगा। इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए यह छूट की सीमा उतनी ही होगी जितनी उसी सकल वाहन भार (जीवीडब्ल्यू) श्रेणी के आंतरिक दहन इंजन (आईसीई) वाहन पर मिलती है। इसमें शामिल ओईएम की ओर से दी जाने वाली 8% छूट के अलावा, केंद्र सरकार 5 वर्ष तक 5% ब्याज सब्सिडी और प्रति माह निश्चित मासिक ईंधन वाउचर प्रदान करेगी। इस योजना में शामिल राज्य सरकारें पात्र लाभार्थियों के लिए 10 वर्ष तक मोटर वाहन कर में 100% तक छूट देंगी और पंजीकरण शुल्क में छूट प्रदान करेंगी। इस सप्ताह की शुरुआत में, अशोक लेलैंड, स्विच मोबिलिटी और टाटा मोटर्स ने भी इस योजना को लागू करने के लिए सरकार के साथ समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। इन पांच कंपनियों का ट्रकों और बसों के बाज़ार में लगभग 75% हिस्सा है, जिससे इस योजना को लागू करने के लिए काफ़ी कवरेज मिलता है। - नयी दिल्ली. अपनी कंपनी स्पेसएक्स के शेयर बाजार में ऐतिहासिक प्रवेश के बाद दुनिया के पहले 'ट्रिलियनेयर' (एक हजार अरब डॉलर) बनने का गौरव हासिल करने वाले एलन मस्क की उपलब्धि की हर कोई चर्चा कर रहा है। इस बारे में महिंद्रा समूह के चेयरमैन आनंद महिंद्रा का मानना है कि मस्क की सफलता की असली कहानी उनका वह अटूट विश्वास है जिसके बल पर उन्होंने आज की असंभव लगने वाली कल्पनाओं को कल की वास्तविकता में बदल दिया। स्पेसएक्स की पिछले सप्ताह सार्वजनिक सूचीबद्धता के बाद मस्क दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बन गए। मस्क पहले से ही इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी टेस्ला और सैटेलाइट इंटरनेट सेवाप्रदाता स्टारलिंक सहित कई कंपनियों के प्रमुख हैं। महिंद्रा ने वर्ष 2018 में अपने जीवन और कारोबार के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे मस्क का उस समय समर्थन किया था। मस्क ने तब 'न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए एक साक्षात्कार में ''थका देने वाले, बेहद मुश्किल साल'' जैसी बाते कहीं थीं। महिंद्रा ने कहा कि नवाचार से लोगों को प्रेरित करने वालों को अक्सर उनके सबसे मुश्किल पलों में परखा जाता है, न कि उनके सबसे अच्छे समय में। महिंद्रा ने मस्क की इस कामयाबी पर कहा, ''आज की सुर्खियां उनके 'ट्रिलियन' डॉलर के मुकाम पर पहुंचने के बारे में हैं लेकिन असल कहानी यह है कि उन्होंने (मस्क ने) कभी यह मानना नहीं छोड़ा कि आज जो असंभव है, वह कल हकीकत बन सकता है।'' उन्होंने कहा, ''मैंने 2018 में एलन से इसलिए संपर्क किया था क्योंकि नवाचार को ढाल बनाने वाले का आकलन अक्सर उनके सबसे कठिन समय में किया जाता है, न कि उनके सबसे अच्छे दौर में। उस समय उनकी सबसे बड़ी विशेषता मुझे उनका अद्भुत धैर्य और संघर्षशीलता लगी थी।" महिंद्रा ने उस समय ट्विटर (अब 'एक्स') पर मस्क का हौसला बढ़ाते हुए लिखा था, ''डटे रहिए''।
- नयी दिल्ली. भारत में 2031 के अंत तक 5जी ग्राहकों की संख्या 1.1 अरब को पार कर सकती है, जो कुल कनेक्शन का 81 प्रतिशत होगी। स्वीडन की दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कंपनी एरिक्सन की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के अंत तक 5जी ग्राहकों की संख्या 43 करोड़ तक पहुंच गई थी और कुल मोबाइल कनेक्शन में इनकी हिस्सेदारी 35 प्रतिशत थी। 'एरिक्सन मोबिलिटी रिपोर्ट' के अनुसार, भारत प्रति स्मार्टफोन मोबाइल डेटा खपत के मामले में भी वैश्विक स्तर पर अग्रणी बना हुआ है। औसत मासिक उपयोग 37 जीबी है जिसके 2031 तक लगभग दोगुना होकर 70 जीबी तक पहुंचने की उम्मीद है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 5जी को अपनाने की रफ्तार जारी है, जिसे किफायती 5जी स्मार्टफोन और उपकरणों की उपलब्धता, लगभग सभी जिलों में विस्तारित नेटवर्क दायरे और 5जी फिक्स्ड वायरलेस एक्सेस (एफडब्ल्यूए) सेवाओं के बढ़ते विस्तार से बल मिल रहा है। इसमें कहा गया कि 46 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ 4जी अब भी प्रमुख प्रौद्योगिकी बनी हुई है। हालांकि, उपयोगकर्ताओं के 5जी की ओर रुख के कारण 2025 में इसके ग्राहकों के लगभग 57 करोड़ से घटकर 2031 तक करीब 16 करोड़ रह जाने का अनुमान है। एरिक्सन इंडिया के प्रबंध निदेशक नितिन बंसल ने कहा कि भारत में 5जी अपनाने की तेज रफ्तार उन्नत मोबाइल ब्रॉडबैंड पर आधारित है। उन्होंने कहा, '' देश में मजबूत और सुरक्षित 5जी अवसंरचना समावेशन, सुशासन तथा नवाचार को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा रही है और डिजिटल इंडिया के लिए एक सशक्त आधार के रूप में काम कर रही है।'' रिपोर्ट में किसी का नाम लिए बिना ''एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम'' की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें भारत में एक सेवा प्रदाता ने हाल ही में अपने पोस्टपेड 5जी ग्राहकों के लिए 'नेटवर्क स्लाइसिंग' आधारित संपर्क सेवाएं शुरू की हैं, जो बाजार में उन्नत 5जी उपयोग मामलों के विकास का संकेत देती हैं। वैश्विक स्तर पर, 2026 की पहली तिमाही में 5जी मोबाइल ग्राहक तीन अरब के आंकड़े के पार पहुंच गए। दूरसंचार सेवाप्रदाताओं द्वारा 5जी स्टैंडअलोन (एसए) नेटवर्क स्लाइसिंग के व्यावसायिक प्रस्तावों में उल्लेखनीय वृद्धि जारी है, जबकि कई सेवा प्रदाताओं के लिए अपलिंक मोबाइल डेटा ट्रैफिक वृद्धि पहले ही डाउनलिंक से अधिक हो चुकी है।
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नयी दिल्ली. राष्ट्रीय राजधानी के सर्राफा बाजार में सोमवार को सोने की कीमतें 2,500 रुपये बढ़कर 1.59 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई, जबकि चांदी की कीमत 2.60 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई। अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की रूपरेखा बनने के बाद वैश्विक बाजार में मजबूत रुख का असर इन कीमतों पर दिखा। बाजार के जानकारों के अनुसार, 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाले सोने की कीमत शुक्रवार के 1,56,900 रुपये प्रति 10 ग्राम के बंद स्तर से 2,500 रुपये बढ़कर 1,59,400 रुपये प्रति 10 ग्राम (सभी टैक्स सहित) हो गई। चांदी की कीमत में भी लगातार दूसरे सत्र में बढ़ोतरी हुई और यह 5,000 रुपये बढ़कर 2,60,700 रुपये प्रति किलोग्राम (सभी टैक्स सहित) हो गई। पिछले सत्र में चांदी की कीमत 2,55,700 रुपये प्रति किलोग्राम थी। बाजार विश्लेषकों ने कहा कि कीमती धातुओं की कीमतों में तेजी तब आई जब अमेरिका और ईरान ने दुश्मनी खत्म करने और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए अहम रास्ते होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए एक अंतरिम समझौते की घोषणा की। एचडीएफसी सिक्योरिटीज में वरिष्ठ विश्लेषक (जिंस) सौमिल गांधी ने कहा, ''अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के कारण सोमवार को सोने की कीमतों में बढ़ोतरी हुई और हाजिर सोना 4,325 डॉलर प्रति औंस के स्तर से ऊपर चला गया।'' उन्होंने कहा कि इस समझौते से कच्चे तेल की कीमतें कई सप्ताह के निचले स्तर पर आ गईं, महंगाई को लेकर चिंताएं कम हुईं और ज्यादा सख्त मौद्रिक नीति की संभावना कम हो गई, जबकि कमजोर डॉलर और कम बॉन्ड प्रतिफल ने भी सर्राफा कीमतों को समर्थन दिया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 121.33 डॉलर या लगभग तीन प्रतिशत बढ़कर 4,340.65 डॉलर प्रति औंस हो गया, जबकि चांदी 2.74 डॉलर या 4.04 प्रतिशत बढ़कर 70.74 डॉलर प्रति औंस हो गई। एलकेपी सिक्योरिटीज के उपाध्यक्ष शोध विश्लेषक (जिंस और मुद्रा) जतिन त्रिवेदी ने कहा कि 19 जून को होने वाले एक औपचारिक समझौते से महंगाई को लेकर उम्मीदें और कम हो सकती हैं और इससे व्यापक बाजार में स्थिरता को भी मदद मिल सकती है। निवेशक अब अपना ध्यान अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतिगत बैठक पर लगाएंगे।
कोटक सिक्योरिटीज की एवीपी (जिंस शोध) कायनात चैनवाला के अनुसार, फेडरज रिजर्व के नजरिए पर बारीकी से नजर रखी जाएगी क्योंकि ऊर्जा की कम कीमतों से सख्ती की उम्मीदें कम हो सकती हैं, डॉलर कमजोर हो सकता है और भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम कम होने के बावजूद सर्राफा की कीमतों को अच्छा समर्थन मिल सकता है। -
नयी दिल्ली. भारत मई, 2026 में रूसी जीवाश्म ईंधन का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना रहा है। यूरोपीय शोध संस्थान सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों द्वारा खरीद बढ़ाए जाने से रूस से कुल कच्चे तेल और अन्य ईंधन का आयात बढ़कर अनुमानित 5.8 अरब यूरो (करीब 6.7 अरब डॉलर) पर पहुंच गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, मई में रूस से भारत के कुल आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी लगभग 83 प्रतिशत रही, जिसका मूल्य 4.8 अरब यूरो था। इसके अलावा तेल उत्पादों और कोयले का आयात क्रमश: 55 करोड़ यूरो और 42.9 करोड़ यूरो रहा। सीआरईए ने कहा कि मई में भारत के कुल कच्चे तेल आयात में मासिक आधार पर आठ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिसका एक प्रमुख कारण रूस से आयात में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी रहा। गुजरात स्थित देश के प्रमुख रिफाइनिंग केंद्रों में रूसी कच्चे तेल की आवक में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। वाडिनार रिफाइनरी में अप्रैल की तुलना में 36 प्रतिशत अधिक रूसी तेल उतारा गया, जबकि जामनगर रिफाइनिंग परिसर में यह वृद्धि 14 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरी कंपनियों ने भी इस वर्ष की शुरुआत में आयात दोबारा शुरू करने के बाद खरीद बढ़ाई है। नवंबर, 2025 के अंत में रूसी तेल आयात रोकने वाली न्यू मैंगलोर और विशाखापत्तनम रिफाइनरी ने मार्च से दोबारा खरीद शुरू की थी। मई में न्यू मैंगलोर रिफाइनरी में रूसी तेल की आपूर्ति मासिक आधार पर 13 प्रतिशत बढ़ी, जबकि विशाखापत्तनम रिफाइनरी में इसमें 42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ओडिशा स्थित पारादीप रिफाइनरी में भी पिछले दो साल में रूसी कच्चे तेल की सर्वाधिक मात्रा उतारी गई है। इससे संकेत मिलता है कि भू-राजनीतिक और प्रतिबंध संबंधी दबावों के बावजूद रियायती दरों पर उपलब्ध रूसी तेल भारतीय रिफाइनरी इकाइयों के लिए आकर्षक बना हुआ है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और व्यापारिक प्रतिबंधों से वैश्विक ऊर्जा कारोबार में बदलाव आया था। इसके बाद भारत, रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हो गया। भारतीय रिफाइनरी इकाइयों ने रियायती रूसी तेल की खरीद बढ़ाकर ऊर्जा लागत कम करने के साथ रिफाइनिंग मार्जिन और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को भी सहारा दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, मई में रूस के कच्चे तेल के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत रही, जबकि भारत 36 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा। इसके बाद तुर्किये (छह प्रतिशत) और यूरोपीय संघ (पांच प्रतिशत) का स्थान रहा।
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नयी दिल्ली. सरकार द्वारा पेट्रोल पंप से डीजल खरीद पर लगाए गए अंकुश ने उन अस्पताल, आईटी पार्क, डेटा सेंटर और औद्योगिक इकाइयों की चिंताएं बढ़ा दी हैं, जो बिजली आपूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर डीजल जनरेटर पर निर्भर हैं। सरकार ने 11 जून को औद्योगिक, वाणिज्यिक और संस्थागत उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल पंप से डीजल खरीदने पर रोक लगा दी थी। साथ ही खुदरा बिक्री केंद्रों से प्रति ग्राहक या वाहन प्रतिदिन अधिकतम 200 लीटर डीजल खरीदने की सीमा तय की गई है। यह कदम ईंधन आपूर्ति के संरक्षण और खुदरा उपभोक्ताओं के लिए निर्धारित डीजल के अन्यत्र उपयोग को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है। उद्योग जगत के अधिकारियों का कहना है कि यह अंकुश उन क्षेत्रों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है, जहां डीजल जनरेटर न केवल आपातकालीन 'बैकअप' बल्कि नियमित बिजली स्रोत के रूप में भी इस्तेमाल किए जाते हैं। अस्पतालों को इस कदम से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र माना जा रहा है। बड़े अस्पताल परिसरों में कई डीजल जनरेटर सेट लगे होते हैं, जो ग्रिड में बाधा आने पर पूरे परिसर को बिजली उपलब्ध कराते हैं। कई अस्पताल सर्जरी, गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) और अन्य संवेदनशील प्रक्रियाओं के दौरान वोल्टेज में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए एहतियातन भी जनरेटर चलाते हैं। एक प्रमुख अस्पताल समूह के अधिकारी ने कहा, "कई अस्पताल महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए केवल ग्रिड बिजली पर निर्भर नहीं रहते। निर्बाध बिजली आपूर्ति हमारी परिचालन योजना का अनिवार्य हिस्सा है और डीजल जनरेटर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।" डेटा सेंटर, आईटी पार्क और दूरसंचार सुविधाएं भी अपनी सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने के लिए डीजल आधारित बैकअप प्रणालियों पर काफी निर्भर हैं। उद्योग सूत्रों के अनुसार, कई संस्थान ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आसपास के पेट्रोल पंप से नियमित रूप से डीजल भरवाते रहे हैं। उद्योग के एक अधिकारी ने कहा कि कुछ राज्यों में अधिकतम मांग (पीक ऑवर) के दौरान बिजली दरें इतनी अधिक हो जाती हैं कि डीजल जनरेटर से बिजली उत्पादन अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है। ऐसे में कई आईटी कंपनियां अपनी बिजली जरूरतों का एक हिस्सा जनरेटर के माध्यम से पूरा करती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह अंकुश कुछ औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं की परिचालन लागत भी बढ़ा सकता है। बिजली की मांग बढ़ने के समय ग्रिड से खरीदी गई बिजली महंगी पड़ने पर कई संस्थान लागत नियंत्रण और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए डीजल जनरेटरों का उपयोग करते हैं। सरकार का कहना है कि हाल के दिनों में डीजल और पेट्रोल की खुदरा बिक्री में असामान्य वृद्धि देखी गई, क्योंकि कई औद्योगिक और संस्थागत उपभोक्ता कम कीमत का लाभ उठाने के लिए थोक आपूर्ति चैनल के बजाय पेट्रोल पंप से ईंधन खरीद रहे थे। इससे कुछ क्षेत्रों में ईंधन की कमी का जोखिम पैदा हो गया था। सरकारी आदेश के तहत ऐसे उपभोक्ताओं को अब ईंधन की खरीद प्रतिबद्ध उपभोक्ता पंप या थोक आपूर्ति व्यवस्था के माध्यम से करनी होगी। उद्योग के प्रतिनिधियों ने अस्पतालों, दूरसंचार नेटवर्क, डेटा सेंटर और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए छूट तथा परिचालन संबंधी स्पष्टता की मांग की है। उनका कहना है कि महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को हर स्थिति में डीजल की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। अधिकारियों के अनुसार, जिन संस्थानों के पास पहले से थोक ईंधन आपूर्ति अनुबंध हैं, उन्हें अपेक्षाकृत कम दिक्कत होगी, जबकि खुदरा खरीद पर निर्भर संगठनों को अपनी खरीद व्यवस्था में तेजी से बदलाव करना पड़ सकता है। ये अंकुश अधिकतम 90 दिन के लिए लागू किए गए हैं। सरकार के अनुसार, पश्चिम एशिया संकट के बाद खुदरा और थोक डीजल कीमतों के बीच बढ़े अंतर के कारण कई बड़े उपभोक्ता पेट्रोल पंप से ईंधन खरीदने लगे थे। दिल्ली में पेट्रोल पंप पर डीजल की कीमत 95.20 रुपये प्रति लीटर है, जबकि थोक बिक्री मूल्य 134.50 रुपये प्रति लीटर है। मई में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) की पेट्रोल बिक्री में 4.8 प्रतिशत और डीजल बिक्री में 6.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।













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