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 वेंकट रमणा गोविंदा के उद्घोष के साथ अष्टबंधन महासंप्रोक्षण का शंखनाद

 
-बालाजी मंदिर परिसर में दक्षिण भारतीय वाद्ययंत्रों की ध्वनि गूंजी 
- तिरुपति से आचार्यगणों का पहुंचा जत्था 
टी सहदेव
भिलाई नगर। सेक्टर 05 स्थित बालाजी मंदिर की स्वर्ण जयंती पर गुरुवार को सुबह दक्षिण भारतीयों का प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान अष्टबंधन महासंप्रोक्षण 'वेंकट रमणा गोविंदा, श्रीनिवासा गोविंदा' के उद्घोष के साथ शुरू हो गया। अनुष्ठानारंभ से पहले भगवान बालाजी की पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच पूजा-अर्चना कर उनसे अनुज्ञा ली गई। इस अनुष्ठान में तिरुपति के प्रधान पंडितों का समागम हुआ, जिनके सम्मान में समाज की महिलाओं ने कोलाटम नृत्य प्रस्तुत किया। अनुष्ठान 2 मार्च तक चलेगा, जबकि ब्रह्मोत्सव 3 मार्च से 6 मार्च तक होगा। आंध्र साहित्य समिति के बैनर तले दोनों अनुष्ठान भव्यता और वैभव के साथ आयोजित किए जा रहे हैं। मुख्य मंदिर, श्रीदेवी-भूदेवी के दो मंदिरों, पूजा मंडप, यज्ञशाला, गोपुरम समेत पूरे प्रांगण को कोलकाता से मंगाई गई फूलों की तेरह हजार लड़ियों से सजावट की जा रही है। धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इन अनुष्ठानों के समापन के अवसर पर 6 मार्च को दोपहर महा अन्नप्रसाद का वितरण किया जाएगा। 
 विष्वक्सेन आराधना से शुरू हुआ अनुष्ठान 
वैष्णव संप्रदाय वैखानस की आगमोक्त पद्धति से अनुष्ठान की शुरुआत श्रीविष्णु के अंश और वैकुंठ के द्वारपाल विष्वक्सेन की आराधना से हुई। उसके बाद वैदिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के बीच वरुण देवता के प्रतीक पुण्याहवचनम कलश की पूजा की गई। कलश पूजन के बाद पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोमल-मूत्र) प्राशन संपन्न हुआ। तदुपरांत आचार्यादि ऋत्विक का वरण किया गया, आचार्यों के वरण के पश्चात दुष्ट शक्तियों के प्रभाव को कम करने और पाप रहित होने के लिए वास्तुहोम एवं अकल्मष होम जैसे धार्मिक संस्कार पूरे किए गए। अनुष्ठान के प्रथम चरण के अंत में महिलाओं द्वारा ललिता सहस्त्रनाम पठन किया गया। अनुष्ठान में यजमान के रूप में पीएस राव दंपति शामिल हुआ। 
 यज्ञशाला में प्रतिष्ठित किया गया कलश को 
शाम को शुरू हुए अनुष्ठान के दूसरे चरण में विष्वक्सेन आराधना तथा पुण्याहवचनम के बाद रक्षासूत्र आराधना की गई। रक्षासूत्र धारण के पश्चात मेदिनी पूजा, मृत्तिका संग्रह और अंकुरार्पण का अनुष्ठान किया गया। जिसके तहत एक निश्चित स्थान पर पहले धरती मां की पूजा की गई और उसके बाद वहां से लाई गई मिट्टी को पूजा स्थल पर रखे गमलों में डालकर विधिपूर्वक धान्य बोए गए। अंकुरार्पण के बाद कुंभध्यान कर कलापकर्षण किया गया, जिसमें भगवान की 48 जीवकलाओं का कुंभ में आह्वान किया गया। फिर देवताओं का स्मरण करते हुए मंदिर की परिक्रमा भी की गई। प्रदक्षिणा के उपरांत यज्ञशाला में प्रवेश किया गया, जहां प्रधान कलश को प्रतिष्ठित करने के साथ-साथ सर्वाग्निकुंडेषु अग्नि प्रतिष्ठा की गई। यानी सभी नौ हवनकुंडों में अग्नि प्रज्वलित की गई। इसके बाद कुंभाराधना, उक्तहोम सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। अंत में प्रसाद वितरण किया गया। अनुष्ठान के आयोजन में अध्यक्ष पीवी राव, सचिव पीएस राव, उपाध्यक्ष के सुब्बाराव, कोषाध्यक्ष टीवीएन शंकर, संयुक्त सचिव एनएस राव, बीए नायडु  का सक्रिय योगदान रहा।
 तिरुपति से आचार्यगणों का पहुंचा जत्था 
तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की वैदिक यूनिवर्सिटी से पधारे अतिथि आचार्यों में प्रधान आचार्य डी फणी कुमार, ऋत्विक आचार्यगण डीटीएस प्रसाद, एनजीएल गोपी, एन रामनाथ, नरसिम्हा आचार्य, कुलदीप भार्गव, निरंजन, वेंकटेश आचार्य, जगदीश और सत्यार्थ तथा आचार्यगण विजय कृष्णा, नरसिम्हा साईं राम, कृष्णमाचार्य, भारद्वाज, भार्गव राम, फणी श्रीधर, संतोष कुमार, टी गोपालाचार्य, ए अनिल एवं श्रीधर शामिल हैं। दूसरी ओर पारंपरिक वाद्ययंत्रों नादस्वरम पर के गणेश और के उपेंद्र, ढोल पर गोविंद राव तथा साईं कुमार और श्रुति बॉक्स पर आर सत्यम ने संगति की। ये वादक श्रीकाकुलम से बुलाए गए हैं। 
 
 

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