बालाजी मंदिर में गरुड़ ध्वजारोहण व नवग्रह, लक्ष्मी-गणपति हवन से शुरू हुआ ब्रह्मोत्सव


-उत्सव विग्रहों को पालकी में रख की गई परिक्रमा
-नवग्रह और लक्ष्मी-गणपति हवन में दी गई आहुति
टी सहदेव
भिलाई नगर। बालाजी मंदिर में तिरुमला तिरुपति देवस्थानम की वैदिक यूनिवर्सिटी से प्रधान पंडित डी फणी कुमार के नेतृत्व में आए 20 सदस्यीय दल ने रविवार को सुबह ब्रह्मोत्सव शुरू किया। आंध्र साहित्य समिति की अगुवाई में शुरू हुए ब्रह्मोत्सव के पहले दिन गरुड़ ध्वजारोहण अनुष्ठान, नवग्रह हवन और श्रीलक्ष्मी-गणपति हवन किया गया। यह उत्सव 6 मार्च तक होगा। ब्रह्मोत्सव में शामिल होने मंदिर परिसर तथा यज्ञशाला में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिली। कुछ परिवार अपने साथ दुधमुंहे बच्चे, तो कुछ परिवार वयोवृद्ध सदस्यों को लेकर आए थे। अनुष्ठान की शुरुआत विष्वक्सेन तथा पुण्याहवचनम कलश की पूजा-अर्चना से हुई। जिसमें यजमान के तौर पर पीएस राव, एनएस राव, वाईवीएस शर्मा तथा पद्मकिशोर दंपति बैठे थे।
उत्सव विग्रहों को पालकी में रख की गई परिक्रमा
विष्वक्सेन तथा पुण्याहवचनम कलश की आराधना के बाद गरुड़ ध्वजारोहण अनुष्ठान के आरंभ में गरुड़-ध्वज की आरती की गई। आरती के बाद भगवान बालाजी और माता श्रीदेवी-भूदेवी के उत्सव विग्रहों को पालकी में सवार कर मंदिर की परिक्रमा की गई। इस दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के बीच अतिथि पंडितों ने मंदिर की आठों दिशाओं तथा मध्य में नवसंधि अर्पित की, स्थानीय विशेष के कुछ लोग इसे बलिहारा के नाम से भी जानते हैं। भक्तों को दर्शन-सुख मिल सके इसके लिए मंदिर के कपाट पहले से ही खोल दिए गए थे।
पंचामृत से अभिषेक कर किया गरुड़ ध्वजारोहण
ध्वजारोहण शुरू करने से पहले ध्वजस्तंभ पीठम का पंचामृत से अभिषेक किया गया और उसके बाद वेंकट रमणा गोविंदा श्रीनिवासा गोविंदा के जयकारे के बीच प्रधान पंडित के नेतृत्व में ध्वजारोहण किया गया। तिरुमला तिरुपति की परंपरा के अनुसार गरुड़ध्वज को फहराया नहीं जाता, सिर्फ इसका आरोहण किया जाता है। गरुड़ ध्वजारोहण का अपना धार्मिक महत्व है। ऐसी मान्यता है कि ध्वजारोहण के माध्यम से आकाश में विचरण कर रहे देवी-देवताओं का ब्रह्मोत्सव के लिए आह्वान किया जाता है।
नवग्रह और लक्ष्मी-गणपति हवन में दी गई आहुति
ध्वजारोहण के उपरांत यज्ञशाला में अतिथि पंडितों के सान्निध्य में नवग्रह यज्ञ-हवन किया गया, जिसमें यजमान के रूप में बड़ी संख्या में दंपति शामिल हुए। इस अनुष्ठान में सबसे पहले नवग्रहों सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, वृहस्पति, शनि, शुक्र, राहु और केतु का आह्वान करते हुए उन्हें वेदी पर स्थापित किया गया और उसके बाद नवग्रह मंत्र तथा गरुड़ध्वज मंत्र का उच्चारण करते हुए वैदिक विधि-विधान से पूजा की गई। पूजोपरांत नवग्रह यज्ञ-हवन कर पंडितों द्वारा आहुति दी गई, जिससे कि नवग्रहों का नकारात्मक प्रभाव दूर हो सके और भक्तों की सुख-शांति में वृद्धि हो। शाम को श्रीलक्ष्मी-गणपति का यज्ञ-हवन भी किया गया, जिसमें पंडितों ने आहुति देकर विश्वकल्याण की कामना की। अनुष्ठान के आयोजन में समिति के अध्यक्ष पीवी राव, सचिव पीएस राव, उपाध्यक्ष के सुब्बाराव, कोषाध्यक्ष टीवीएन शंकर, संयुक्त सचिव एनएस राव समेत कार्यकारिणी के सभी सदस्यों की सक्रिय भूमिका रही।





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