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- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)आया मधुमास प्रिय न आए, नैन नीर हैं छलकाते ।बिन माली की देखभाल के, प्रीति-पुष्प अब मुरझाते ।।दहक रहा मन अनल विरह का, नैनों का सरवर सूखा ।रुचिर नहीं लगता है भोजन , प्रिय-दर्शन का मन भूखा ।।तड़पूँ जैसे जल बिन मछली, नीर बिना वह मरती है ।सुंदर छवि चितचोर तुम्हारी, साँस-साँस में बसती है ।।चाँद खिला अंबर में जैसे, सुधियों में तुम जब आते ।।प्रियतम नीरव निस्तब्ध रात ,विगत बात स्मरण कराती ।लिपट वृक्ष से ललिता लतिका, उर को मेरे नहीं सुहाती ।शीत पवन के निर्मम झोंके , विरह व्यथा को भड़काती ।आँसू की स्याही से लिखती, पीड़ा भरी तुम्हें पाती ।साँस-साँस बन बैठे बैरी, मधुर मिलन के गीत सुनाते।।खिला हुआ गुलमोहर कहता , सहना धूप ताप सीखो ।विषम परिस्थितियों में जीना, रहना विनत आप सीखो ।धूप छाँव में शहर गाँव में, जहाँ रहें तृण मुस्काएँ ।आँधी बारिश तूफानों के, आगे भी वे अड़ जाएँ।सीख लिया समझौता करना , कठिन राह वे चल पाते ।।
- आलेख -डॉ. पी टी ऊषालेखिका राज्यसभा सांसद, भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष और राष्ट्रमंडल खेल संघ, भारत की अध्यक्ष हैं।)मैंने अपना पूरा जीवन भागदौड़ में ही बिताया है, पहले केरल की कच्ची सड़कों पर, फिर वैश्विक मंचों पर और अब सार्वजनिक जीवन के गलियारों में। हर कदम पर मुझे कई मुश्किलो का सामना करना पड़ा है, कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अनकही बाधाओं का भी, जिन्होंने महिलाओं को यह बताया कि उनका यहाँ कोई स्थान नहीं है। मैंने यह भी देखा है कि जब ये बाधाएं टूटने लगती हैं तो क्या होता है। अवसर परिणामों को बदल देता है और इससे भी ज़रुरी बात यह है कि यह लोगों की सोच को बदल देता है।यही कारण है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवाँ संशोधन) विधेयक, 2023—नारी शक्ति वंदन अधिनियम—केवल एक विधायी उपलब्धि नहीं है। यह एक लंबे समय से प्रतीक्षित संरचनात्मक सुधार है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना न तो कोई रियायत है और न ही दिखावा। यह अधिक प्रतिनिधि और प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में एक ज़रुरी कदम है।खेलों ने हमें क्या सिखाया हैजब मैंने 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में हिस्सा लिया और कुछ ही सेकंड के अंतर से पदक से चूक गई, तब बहुत कम भारतीय लड़कियां थीं, जो वैश्विक मंच पर खुद को देख पाती थीं। लेकिन पिछले कई दशकों में यह स्थिति बदली है। प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और पहचान तक पहुंच में सुधार के साथ, भारतीय महिलाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता हासिल करने लगीं है।पी.वी. सिंधु, मीराबाई चानू, विनेश फोगाट और मैरी कॉम जैसी एथलीटें अकेले नहीं उभरीं। वे एक ऐसी व्यवस्था का परिणाम हैं, जिसने धीरे-धीरे ही सही, पहुंच को व्यापक बनाना शुरू किया। प्रतिनिधित्व आकांक्षाएं पैदा करता है और आकांक्षा, जब समर्थित होती है, तो उपलब्धि दिलाती है।सबक साफ है। जब महिलाओं को स्थान दिया जाता है, तो वे व्यवस्था में केवल भाग नहीं लेतीं, वे शानदार प्रदर्शन भी कर दिखाती हैं।हर भारतीय के लिए बेहतर शासनभारत में जमीनी स्तर पर महिलाओं के नेतृत्व का प्रभाव पहले ही देखा जा चुका है। 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किए जाने के बाद से, विभिन्न राज्यों में किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि महिला प्रतिनिधियों के नेतृत्व वाले क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, शिक्षा और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार हुआ है।ये महज़ "महिलाओं के मुद्दे" नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं। महिला नेता अक्सर सुरक्षित सार्वजनिक स्थान, सुचारू रूप से चलने वाले स्कूल, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी शासन से जुड़ी उन रोजमर्रा की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करती हैं, जो परिवारों और समुदायों को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं।इस प्रतिनिधित्व को राज्य विधानसभाओं और संसद तक विस्तारित करना केवल निष्पक्षता की बात नहीं है। यह शासन की गुणवत्ता में सुधार से जुड़ा है।प्रतिनिधित्व का आर्थिक महत्वभारत में महिला श्रम बल की भागीदारी विश्व में सबसे कम है, जो लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है। यह केवल एक सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि एक आर्थिक समस्या भी है।विधानसभाओं में महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व उन नीतियों को प्राथमिकता देने में मदद कर सकता है, जो इस अप्रयुक्त क्षमता को उजागर करती हैं, जैसे किफायती बाल देखभाल, सुरक्षित कार्यस्थल, ऋण तक पहुंच और महिला उद्यमियों के लिए समर्थन। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि लैंगिक समानता को बढ़ावा देने से भारत की जीडीपी में 700 बिलियन डॉलर तक की वृद्धि हो सकती है।अधिक समावेशी संसद न केवल एक लोकतांत्रिक आवश्यकता है, बल्कि एक आर्थिक अनिवार्यता भी है।सुरक्षा, गरिमा और भागीदारीभारत भर में लाखों महिलाओं के लिए, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी अभी भी सुरक्षा, भेदभाव और असमान पहुंच की चिंताओं से प्रभावित है। चाहे खेल हो, शिक्षा हो या कार्यस्थल, ये समस्याएं हमारे समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी हैं।संसद में अधिक महिलाओं का मतलब है कि कानून और नीतियां महज़ समझ से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन की हकीकत से आकार लेती हैं। इसका मतलब है प्रवर्तन के लिए मजबूत वकालत, सहायता प्रणालियों के लिए संसाधनों का बेहतर आवंटन और एक न्याय ढांचा, जो उत्तरदायी और सुलभ हो।शासन तभी अधिक प्रभावी होता है, जब वह उन लोगों के अनुभवों को दर्शाता है, जिनकी वह सेवा करता है।प्रतिनिधित्व और आकांक्षाओं की शक्तिभारत में सत्ता की छवि लंबे समय से मुख्य रूप से पुरुष प्रधान रही है। उस छवि को बदलना केवल प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि यह एक बदलावकारी प्रक्रिया है।जब मणिपुर, झारखंड, राजस्थान या भारत के किसी भी हिस्से की कोई युवती अपने जैसी दिखने वाली, अपने जैसी बोलने वाली और समान पृष्ठभूमि से आने वाली किसी महिला को देश के कानूनों को आकार देते हुए देखती है, तो यह सिर्फ प्रेरणा ही नहीं देता, बल्कि यह संभावनाओं के प्रति उसके विश्वास को भी बदल देती है।आकांक्षा ही सामाजिक परिवर्तन का आधार है। विधानसभाओं में आरक्षण से स्तर कम नहीं होता, बल्कि अवसरों का दायरा बढ़ता है।भारत की महिलाओं ने खेल जगत, सशस्त्र बलों, विमानन और व्यावसायिक पदों पर पहले ही कई बाधाओं को पार कर लिया है। विधायी प्रतिनिधित्व इस यात्रा का स्वाभाविक अगला कदम है।अब है कार्यवाही का वक्तराज्यसभा में सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करने के बाद, मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा है कि कैसे विविध दृष्टिकोण बहस और निर्णय लेने की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हैं। फिर भी, आज लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 15 प्रतिशत है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हो चुका है। अब बस इसे पूरी तरह, निष्ठापूर्वक और बिना देर किए लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रुरत है।भारत अपनी आधी आबादी को सर्वोच्च निर्णय लेने वाले निकायों में कम प्रतिनिधित्व देते हुए, विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा नहीं रख सकता। आधी प्रतिभा को दरकिनार करके विकसित भारत का निर्माण नहीं किया जा सकता, न ही आधी आवाज़ पर सच्चा लोकतंत्र फल-फूल सकता है।आगे का रास्ता साफ है। सवाल यह है कि क्या हम उस पर चलने का दृढ़ संकल्प रखते हैं।
- आलेख- अश्विनी वैष्णव (लेखक, भारत सरकार के रेल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैंभारत में हर दिन 25,000 से अधिक ट्रेनें चलती हैं। वे प्रतिदिन 2 करोड़ से अधिक यात्रियों को ले जाती हैं और कोयला, लौह अयस्क, अनाज, स्टील, सीमेंट तथा अन्य वस्तुओं की बड़ी मात्रा को 1,37,000 किलोमीटर से अधिक लंबे रेल नेटवर्क पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाती हैं।पूरी व्यवस्था जिस आधार पर काम करती है, वह रेल पटरी है। जब पटरी अच्छी स्थिति में होती है, तब ट्रेनें सुरक्षित रूप से अधिक गति से चलती हैं। लेकिन जब पटरी खराब होती है, तो इसके परिणाम गति पर रोक, देरी और सुरक्षा संबंधी जोखिम के रूप में सामने आते हैं। रेल की पटरी में दरार, कोई ढीला पुर्जा या गिट्टी की परत में रुकावट, इनमें से कोई भी चीज ट्रेन की चाल को प्रभावित कर सकती है।रेल पटरियों के महत्व को ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेलवे ने एक दशक से अधिक समय पहले व्यापक आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्य में आधुनिक मशीनों से पटरियों का नवीनीकरण, उन्नत तरीकों से जांच और निरीक्षण, मशीनीकृत रखरखाव, सुरक्षा बाड़बंदी आदि शामिल थे। इन सभी प्रयासों ने मिलकर रेल नेटवर्क की स्थिति को स्पष्ट रूप से बदल दिया है।2014 से अब तक लगभग 55,000 किलोमीटर पटरियों का नवीनीकरण किया गया है, जिससे सुरक्षा और यात्रा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है तथा बार-बार मरम्मत की आवश्यकता कम हुई है। लगभग 44,000 ट्रैक किलोमीटर में 260 मीटर लंबे रेल पैनल बिछाए गए हैं। लंबे पैनलों का अर्थ है कम जोड़, जिससे ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम और सुरक्षित होती है। अब 80,000 ट्रैक किलोमीटर से अधिक हिस्से में मजबूत 60 किलोग्राम वाली रेल पटरियों का उपयोग हो रहा है, जो अधिक भार और तेज गति का समर्थन करती हैं।मजबूत रेल पटरी बिछाना जरूरी है, लेकिन समय रहते खराबी पकड़ना भी उतना ही जरूरी है। छिपी हुई दरारों को खोजने के लिए अल्ट्रासोनिक जांच की गई है। इसके तहत करीब 36.2 लाख ट्रैक किलोमीटर और 2.25 करोड़ वेल्ड की जांच हुई। इससे रेल और वेल्ड टूटने की घटनाएं करीब 90 प्रतिशत तक कम हो गई हैं। यानी अब खराबी होने के बाद उसे ठीक करने के बजाय पहले ही पकड़कर रोक लिया जाता है।अब रेलवे में दूसरी आधुनिक जांच तकनीकें भी इस्तेमाल हो रही हैं। नई वेल्ड की जांच के लिए चुंबकीय जांच, फ्लैश-बट वेल्ड की जांच के लिए नई मशीनें और जीपीएस से जुड़ी ऐसी व्यवस्था लगाई गई है, जो ट्रेन की यात्रा की गुणवत्ता मापती है और पटरी के खराब हिस्से की सही जगह बता देती है।भारतीय रेलवे की ट्रैक मशीनों की संख्या 2014 में 748 थी, जो 2026 में बढ़कर 1,785 हो गई है। ये मशीनें पटरी को ठीक करने, गिट्टी साफ करने और रेल को घिसकर बराबर करने का काम हाथ से होने वाले काम की तुलना में ज्यादा तेज, बेहतर और एक समान तरीके से करती हैं।पटरी के नीचे बिछी गिट्टी की परत को साफ करने में मशीनों ने बड़ा फर्क पैदा किया है। यही गिट्टी पानी निकालने, कंपन कम करने और पटरी को मजबूत बनाए रखने का काम करती है। लेकिन समय के साथ ट्रेनों के लगातार वजन और कंपन से ये पत्थर टूटकर पाउडर जैसे हो जाते हैं। इससे गिट्टी की परत जाम हो जाती है और वह ठीक से काम नहीं कर पाती।इसलिए गिट्टी की सफाई की जाती है, ताकि पटरी फिर से सही हालत में आ जाए। यह काम एक लाख किलोमीटर से ज्यादा रेल पटरियों पर किया जा चुका है और ज्यादातर काम मशीनों से हुआ है। इसी तरह पटरी की ऊपरी सतह की खराबी दूर करने के लिए भी एक लाख किलोमीटर से ज्यादा रेल की ग्राइंडिंग की गई है। इससे ट्रेन का सफर ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित हुआ है।हर साल ट्रेनों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए ट्रेनों के बीच रखरखाव के लिए मिलने वाला समय कम होता जा रहा है। ऐसे में मशीनों की मदद से कम समय में ज्यादा काम हो जाता है और ट्रेन सेवाएं भी प्रभावित नहीं होतीं। लेकिन सुरक्षा सिर्फ पटरी पर नहीं, बल्कि वहां भी जरूरी है जहां ट्रेनें लाइन बदलती हैं। इसलिए भारतीय रेलवे ने पटरी बदलने के साथ कई दूसरे सुधार भी किए हैं। करीब 17,500 किलोमीटर तक सुरक्षा के लिए बाड़ लगाई गई है, खासकर उन जगहों पर जहां ट्रेनें 110 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा रफ्तार से चलती हैं। इससे लोगों और जानवरों के पटरी पर आने की घटनाएं कम होती हैं।जहां ट्रेनें एक लाइन से दूसरी लाइन पर जाती हैं, वहां 36,000 नए और मजबूत स्विच लगाए गए हैं और 7,500 खास तरह के क्रॉसिंग लगाए गए हैं। ये ज्यादा समय तक चलते हैं और ट्रेन को बिना झटके के गुजरने देते हैं। 2019 से चौड़े और भारी स्लीपर लगाए जा रहे हैं, जिससे पटरी ज्यादा मजबूत रहती है, खासकर गर्मियों में। पुलों पर भी मजबूत स्लीपर लगाए गए हैं और यार्ड के अंदर लंबी वेल्ड वाली पटरियां बिछाई गई हैं। इससे पूरा रेलवे नेटवर्क और मजबूत हुआ है।रेल पटरियों के आधुनिकीकरण का सबसे साफ असर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ने की क्षमता के रूप में दिखाई देता है।130 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार के लिए तैयार रेल पटरी का हिस्सा पहले सिर्फ 6 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर करीब 23 प्रतिशत हो गया है। इसी तरह 110 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार वाली पटरी पहले करीब 40 प्रतिशत थी, जो अब 80 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इससे सफर का समय कम हुआ है, ट्रेनें ज्यादा समय पर चल रही हैं और वंदे भारत एक्सप्रेस जैसी तेज ट्रेनें चलाना आसान हुआ है।इन सुधारों का असर सुरक्षा पर भी दिखा है। 2014-15 में 135 बड़े रेल हादसे हुए थे, लेकिन 2025-26 में यह संख्या घटकर सिर्फ 16 रह गई। यानी हादसे लगभग 89 प्रतिशत कम हो गए। हर 10 लाख किलोमीटर चलने वाली ट्रेनों पर हादसों की दर भी 0.11 से घटकर 0.01 हो गई है। यह लगभग 90 प्रतिशत सुधार है। खास बात यह है कि ट्रेनों और यात्रियों की संख्या बढ़ने के बावजूद हादसे कम हुए हैं।अब रेलवे ने एक नई ऑनलाइन व्यवस्था भी शुरू की है, जिसे ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम(टीएमएस) कहा जाता है। इसमें पटरी की जांच, ट्रेन के सफर की गुणवत्ता और पटरी की हालत से जुड़ी सारी जानकारी एक जगह मिल जाती है। इससे रेलवे को जल्दी समझ आ जाता है कि कहां काम करने की जरूरत है और समय रहते सुधार किया जा सकता है।बारह साल पहले भारत की 60 प्रतिशत रेल पटरियां 110 किलोमीटर प्रति घंटे से कम रफ्तार तक ही सीमित थीं। रेल पटरी टूटने की घटनाएं आम थीं और ज्यादातर रखरखाव हाथ से किया जाता था। आज स्थिति बदल चुकी है। अब करीब 80 प्रतिशत रेल नेटवर्क 110 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे ज्यादा रफ्तार संभाल सकता है। रेल और वेल्ड टूटने की घटनाएं 90 प्रतिशत तक कम हो गई हैं और करीब 1,800 ट्रैक मशीनें काम कर रही हैं।लाखों यात्रियों और रेल माल ढुलाई पर निर्भर कारोबारों के लिए इन बदलावों का बड़ा असर पड़ा है। अब सफर ज्यादा आरामदायक हुआ है, यात्रा का समय कम हुआ है और रेलवे नेटवर्क पहले से ज्यादा भरोसेमंद बना है। काम अभी पूरा नहीं हुआ है, लेकिन अब तक हुई प्रगति यह दिखाती है कि लगातार मेहनत और निवेश से कितना बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)कहिथें वेद पुरान, हवय शुभ मुहुरत अक्ती।करना चाही दान, बढ़य सतयुग के शक्ती।।पावन तीज तिहार, बिहावँय पुतरी पुतरा।सुग्घर साज-सँवार, नवा पहिरावँय लुगरा।।भरे सकोरा टाँग दव, घाम मा पंछी मरथें ।मिटय भूख अउ प्यास हर, खा लँय दाना जी भर के।।करसी भर के राख, पी लँय प्यासा पानी।बइठ जुड़ा लँय छाँव, पुन्न मिलय हर दानी।।गर्मी भर बइसाख, भोंभरा अब्बड़ तीपय।कान तिपावय झाँझ, लपट जब आगी झींपय।बेटी दुखिया होय ता, कर दव आज बिहाव जी।भुँखहा ला कौरा खवा, लेही तोरे नाव जी ।।अवतारी भगवान, परशुराम ल कहिथे जी।शुक्ल पक्ष बैशाख, तीज बड़ पावन रहिथे जी ।लिये अवतरण खास, विष्णु के रूप जनाथे।अक्षय मिलथे पुण्य, काज मंगल करवाथे।शुभ तिथि लेके आय हे, अक्ती सुघर तिहार हा।मुहुरत बने बिहाव के, माड़े शुभ संस्कार गा।।होही गंगा स्नान, दीन के आँसू पोंछव।सफल जिंदगी मान, मदद ला तीरथ सोंचव।।भेदभाव सब मेट, भाव समता के जागय।होय दरिद्रता दूर, शोक दुख जग ले भागय।।करज चुका माटी सबो, कारज जग-कल्यान कर।झोली मा भर दे खुशी, मरत जीव मा प्रान भर।।
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मेरी जापान डायरी- 2 : डॉ. अभया जोगलेकर
जापान ने अपने राष्ट्र निर्माण के दौरान बहुत सी लड़ाइयां देखी हैं, मेइजी शासन से लेकर, ताइशो, शोवा काल में जापान के लोगों ने बहुत सहन किया है। सन् 1886 में मेइजी के पुनः स्थापना के बाद यहां आधुनिकीकरण हुआ। साथ ही सैन्यवाद का उदय भी। जापान के लोग मूलतः सैनिक प्रवृति के ही हैं कर्मठ। यह गुण उन्हें सबसे अलग बनाता है। इनका जुझारूपन इनके दैनिक क्रियाकलापों में दिखता है, यही बात जब आप कभी जापान घूमने जाएंगे, तो आप भी महसूस करेंगे।
जापान के लोगों की जिस बात ने मेरे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ी, वह है वहां की अनुशासित जीवनशैली और स्वच्छता की संस्कृति। जापान में नियम केवल कागजों पर नहीं, बल्कि लोगों के स्वभाव में रचे-बसे हैं।
1. जीवन का मूल मंत्र: अनुशासन
जापान में रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनुशासन का पालन करना उतना ही स्वाभाविक क्रिया है, जितना सांस लेना। दुकान में सामान खरीदते समय, बिल पेमेंट करते समय, मेट्रो स्टेशनों पर कतारों में अपनी बारी का शांति से इंतज़ार करना हो या सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों की सुविधा का ध्यान रखते हुए धीमी आवाज़ में बात करना, यह सब जापानी सभ्यता का अभिन्न हिस्सा है।
2. नियमों का पालन : एक राष्ट्रीय चरित्र
जापान के लोगों को देखकर मैंने यह स्पष्ट समझा कि संस्कार घर से ही प्रारंभ होते हैं। इसी सामूहिक सोच के कारण वहां का हर नागरिक अपने आसपास के वातावरण को साफ़ और स्वच्छ रखता है। उनका मानना है कि साफ़ और व्यवस्थित वातावरण रखना, उनकी भी जिम्मेदारी है क्योंकि ये पूरे समाज की साझा संपत्ति है। विदेशों में बगीचों, पब्लिक टॉयलेट्स में और सार्वजनिक स्थानों पर सफाई कर्मचारी नहीं होते क्योंकि लोग कचरा करना अपनी नैतिकता के विरुद्ध मानते हैं। यह जन- जागरूकता का वह उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां हर व्यक्ति देश को बेहतर बनाए रखना अपनी जिम्मेदारी समझता है।
हर बार की यात्राओं के समान इस यात्रा ने मुझे फिर याद दिलाया कि अनुशासन का अर्थ केवल सख़्त पाबंदियां नहीं समझें, बल्कि इसे परस्पर सम्मान, आत्म-नियंत्रण और राष्ट्र के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझें। - -हमारी जनगणना–हमारा विकास’ के संकल्प के साथ छत्तीसगढ़ तैयारआर्टिकल-रमेश जायभाये, उपनिदेशक, पत्र सूचना कार्यालयक्या आपने कभी सोचा है कि आपके घर की छोटी-सी जानकारी—जैसे पानी, बिजली या परिवार के सदस्यों का विवरण—देश के विकास में कितना बड़ा योगदान दे सकती है? दरअसल, हर नागरिक की दी गई जानकारी मिलकर ही भारत के भविष्य की दिशा तय करती है।इसी कड़ी में वर्ष 2027 की जनगणना एक खास पड़ाव बनने जा रही है। यह केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि बदलते भारत की एक नई कहानी है—एक ऐसी कहानी जिसमें हर नागरिक की भागीदारी है। इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल अंदाज़ में होगी, जो इसे पहले की सभी जनगणनाओं से अलग और अधिक आधुनिक बनाती है।छत्तीसगढ़ में इस महाअभियान को लेकर तैयारियाँ तेज़ी से पूरी की जा रही हैं। वातावरण ऐसा है मानो कोई बड़ा जनउत्सव आने वाला हो—और वास्तव में, यह एक ऐसा अभियान है जिसमें हर व्यक्ति की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।कहानी शुरू होती है इतिहास से…भारत में जनगणना की शुरुआत 1872 में हुई थी और 1881 से इसे पूरे देश में व्यवस्थित रूप से लागू किया गया। स्वतंत्रता के बाद 1951 में पहली जनगणना आयोजित हुई, जिसने देश के विकास की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई।अब वर्ष 2027 की जनगणना इस ऐतिहासिक यात्रा का आधुनिक रूप है। यह न केवल देश की वर्तमान स्थिति का आकलन करेगी, बल्कि भविष्य की योजनाओं की नींव भी तैयार करेगी।छत्तीसगढ़ में यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होगी—पहला चरण अप्रैल-मई 2026 में और दूसरा फरवरी-मार्च 2027 में आयोजित किया जाएगा।राज्य के लिए संदर्भ तिथि 1 मार्च 2027 (रात 12 बजे) निर्धारित की गई है, जिसके आधार पर प्रत्येक व्यक्ति की गणना की जाएगी।अब आपकी बारी: खुद करें अपनी जनगणना!इस बार जनगणना की सबसे रोचक और उपयोगी सुविधा है—स्व-गणना (Self-Enumeration)।अब आप स्वयं अपने घर और परिवार की जानकारी ऑनलाइन भर सकते हैं। 16 अप्रैल से 30 अप्रैल 2026 के बीच???? https://se.census.gov.inपोर्टल पर जाकर मोबाइल नंबर और OTP के माध्यम से लॉगिन कर यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है।आपसे परिवार के सदस्यों की संख्या, उनकी आयु, शिक्षा, व्यवसाय और घर की सुविधाओं से जुड़े कुछ सरल प्रश्न पूछे जाएंगे। पूरी जानकारी भरने के बाद आपको एक SE ID प्राप्त होगी।जब प्रगणक आपके घर आएंगे, तो केवल यह ID दिखानी होगी और आपकी जानकारी सत्यापित कर ली जाएगी—यानी बार-बार जानकारी देने की आवश्यकता नहीं होगी।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनगणना के दौरान किसी भी प्रकार के दस्तावेज़ दिखाने की आवश्यकता नहीं होती। आप जो जानकारी देंगे, वही दर्ज की जाएगी।स्व-गणना के प्रति लोगों का रुझान भी तेजी से बढ़ रहा है—देशभर में लाखों परिवार इस सुविधा का उपयोग कर चुके हैं, जो इस डिजिटल पहल की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है।स्मार्ट तकनीक, सटीक आंकड़े और भरोसेमंद प्रक्रियाइस बार जनगणना पूरी तरह तकनीक के सहारे संचालित होगी। प्रगणक मोबाइल ऐप के माध्यम से डेटा दर्ज करेंगे, जिससे काम तेज़ और अधिक सटीक होगा।साथ ही, आधुनिक GIS आधारित डिजिटल मैपिंग का उपयोग कर हर क्षेत्र और गणना ब्लॉक को स्पष्ट रूप से चिन्हित किया जा रहा है, ताकि कोई भी घर या व्यक्ति छूट न जाए।डेटा के बेहतर प्रबंधन और निगरानी के लिए उन्नत डिजिटल सिस्टम का उपयोग किया जा रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और व्यवस्थित बनी रहती है।एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में, इस बार जाति संबंधी आंकड़ों का भी समावेश किया जाएगा, जो दशकों बाद समाज की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करेगा।जनगणना में समाज के हर वर्ग को शामिल करने का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसी के तहत बेघर व्यक्तियों की गणना भी अलग से, विशेष अभियान के माध्यम से की जाती है, ताकि कोई भी नागरिक इस प्रक्रिया से वंचित न रह जाए।और जहाँ तक आपकी जानकारी की सुरक्षा का सवाल है—यह पूरी तरह गोपनीय रहती है। इसे किसी अन्य विभाग या एजेंसी के साथ साझा नहीं किया जाता।छत्तीसगढ़ तैयार, अब आपकी भागीदारी जरूरीछत्तीसगढ़ में इस अभियान के लिए बड़े पैमाने पर तैयारियाँ की गई हैं। शहरों से लेकर गाँवों तक, हर क्षेत्र में जनगणना टीम सक्रिय रहेगी, ताकि कोई भी परिवार छूट न जाए।नागरिकों की सुविधा के लिए टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर 1855 भी जारी किया गया है, जहाँ किसी भी प्रकार की जानकारी या सहायता प्राप्त की जा सकती है।लेकिन इस पूरे अभियान की असली ताकत है—आपकी भागीदारी।जब आप सही जानकारी देते हैं, तो आप केवल एक फॉर्म नहीं भरते, बल्कि अपने क्षेत्र के विकास में योगदान देते हैं। आपकी दी गई जानकारी से ही तय होता है कि कहाँ नई सड़क बनेगी, कहाँ स्कूल खुलेगा और कहाँ स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है।आखिर में एक छोटी-सी बात…जनगणना एक आईना है, जिसमें देश खुद को देखता है।इस बार यह आईना डिजिटल है—तेज़, सटीक और आधुनिक।और इसमें जो तस्वीर दिखेगी, उसे बनाने में आपका भी योगदान होगा। तो आइए, इस जनगणना अभियान का हिस्सा बनें—स्व-गणना करें, सही जानकारी दें और देश के विकास की कहानी में अपनी भूमिका निभाएं।
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यादें-आशा भोंसले
आलेख- मंजूषा शर्मादिग्गज गायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को 92 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपनी आवाज से हिंदी ही नहीं बल्कि कई भाषाओं के गानों को अमर बना दिया। उनके निधन की खबर लगते ही आज सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर उनके ही गाये गाने सुनाई दे रहे हैं। आज हम उनके गाये एक गाने की चर्र्चा कर रहे हैं, जो मेरा भी पसंदीदा है- गाने के बोल हैं- मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है। यह फिल्म इजाज़त में शामिल किया गया था, जो वर्ष 1987 में प्रदर्शित हुई थीं। इस फिल्म के लिए आशा भोंसले को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।गाने के बोल सुनकर साफ पता चल जाता है कि ऐसा गाना और कोई नहीं, सिर्फ गुलजार साहब ही लिख सकते हैं। दरअसल यह एक नज़्म है। इस गाने के लिए गुलजार साहब को भी राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।पूरा गाना है-मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैंसावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे हैंऔर मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी हैंवो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दोपतझड़ हैं कुछ, हैं ना ...पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहटकानों में एक बार पहन के लौटाई थीपतझड़ की वो शांख अभी तक कांप रही हैंवो शांख गिरा दो, मेरा वो सामान लौटा दोएक अकेली छतरी में जब आधे आधे भीग रहे थेआधे सूखे, आधे गिले, सुखा तो मैं ले आई थीगिला मन शायद, बिस्तर के पास पडा होवो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दोएक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिलगीली मेहंदी की खुशबू, झूठमूठ के शिकवे कुछझूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दोसब भिजवा दो, मेरा वो सामन लौटा दोएक इजाजत दे दो बसजब इस को दफऩाऊंगीमैं भी वही सो जाऊंगी.....गुलजार साहब इतनी सादगी और सरलता से हर बात कह देते हैं कि लगता है , जैसे कोई अपनी ही कहानी बयां कर रहा है। उनकी लेखन की यह सादगी जैसे रूह को छू लेती है। गुलजार साहब द्वारा कही हुई सीधी सी बात भी आंखों में एक सपना बुन देती है ..जिस सहजता व सरलता से वे कहते हैं वो गीत की इन पंक्तियों में दिखाई देती है।फिल्म इजाजत का गाना मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास है, आशा भोसले का सबसे पसंदीदा गाना हुआ करता था। एक इंटरव्यू में आशा भोसले ने कहा था कि ये गाना पंचम (आर. डी . बर्मन) के साथ उनके खूबसूरत रिश्ते की एक बानगी है।। आशा ताई बताती थींं कि जब ये गाना गुलजार साहब ने लिखा था, तो पंचम दा ने कहा था कि पहली बार ऐसा होगा कि कोई गाना अपने बोल की वजह से अखबार की सुर्खियां बनेगा।गुलज़ार साहब और पंचम दा की जोड़ी ने एक से बढक़र एक गीत दिए हैं। जब गुलज़ार साहब - मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है.. नज्म को लिखकर पंचम दा के पास लेकर गए और बोले इस पर गाना बनाना है तो पंचम दा ने कहा यार कल से टाइम्स ऑफ़ इंडिया लेकर आ जाना और बोलना इस न्यूज़ पर भी गाना बनाओ । पहले तुम्हारा गाना तो समझ आए। लेकिन उन्होंने गाने की रुह को समझा और एक प्यारी सी धुन भी बना दी। यह गाना सुनकर ऐसा लगता है जैसे जि़न्दगी से जि़न्दगी कुछ कहना चाहती है या अपना दिया कुछ उधार वापस चाहती है, जैसे कुछ कहीं फिर से छूट गया है और एक कसक तथा कुछ पाने की एक उम्मीद शब्दों में ढल जाती है।शायद उस वक्त का यह पहला ऐसा गाना था, जिसमें कोई तुकबंदी नहीं थी । सही मायने में यह नॉन रिमिंग लिरिक्स था। गाने के पाश्र्व में बजता म्यूजिक सॉफ्ट है। इसमें संतूर का इस्तेमाल हुआ है जिसे उल्हास बापट ने बजाया है। उल्लास , वर्ष 1978 से पंचम दा की म्यूजिक टीम से जुड़ गए और 1942 टु लव स्टोरी फिल्म तक साथ रहे। इजाजत के गाने में उल्लास बापट ने कमाल का संतूर वादन किया है। गाने में पंचम दा का ट्रेंड साफ झलकता है। कुछ इसी प्रकार का म्यूजिक फिल्म मौसम में मदन मोहन साहब ने भी तैयार किया था।फिल्म इजाजत सुबोध घोष की लिखी बांगला कहानी पर आधारित है जिसकी पटकथा गुलजार ने लिखी और निर्देशन भी उन्हीं का था। इसमें नसीरुद्दीन शाह, रेखा, अनुराधा पटेल के अलावा शशि कपूर ने भी काम किया। इस गाने में रेखा और नसीर नजर आते हैं। नसीर, माया(अनुराधा पटे) का लिखा खत पढक़र पत्नी रेखा को सुनाते हैं-एक दफा वो याद है तुमको, बिन बत्ती जब साईकिल का चालान हुआ थाहमने कैसे भूखे प्यासे बेचारों सी एक्टिंग की थी,हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी दे कर भेज दिया थाएक चवन्नी मेरी थी, वो भिजवा दो....इसके बाद यह गाना पाश्र्व में बजता है और अनुराधा पटेल गाते हुए अपने प्रेमी से कहती हैं- कि उसने भले ही उसका भौतिक सामान लौटा दिया है, लेकिन अब वह उसके तमाम वो अहसास भी वापस कर दें, जो उसके साथ बिताए क्षणों के साक्षी रहे हंै। यह गाना एक प्रकार से फिल्म की पूरी कहानी का ही निचोड़ है। गाने के अंत में माया कहती हैं-एक इजाजत दे दो बसजब इस को दफऩाऊंगीमैं भी वही सो जाऊंगी.....पूरी कहानी नसीर-रेखा और अनुराधा पटेल के बीच घूमती है। अनुराधा पटेल यानी माया अपने नाम के अनुरूप एक माया है, जो नसीर की प्रेमिका रहती है, लेकिन नसीर और रेखा की शादी हो जाती है। दोनों की खुशहाल शादीशुदा जिदंगी है। जब भी माया उनकी जिदंगी के बीच आती है, पारिवारिक जीवन में तनाव आ जाता है। आखिरकार एक दिन रेखा, नसीर को छोडक़र चली जाती है और दूसरी शादी कर लेती है। उधर , माया यानी अनुराधा भी आत्महत्या करने का प्रयास करती है और एक दिन हादसे में उसकी मौत हो जाती है। यह फिल्म सामान्तर फिल्म जगत का हिस्सा थी और एक खास वर्ग ने ही उसे पसंद किया था।मेरा कुछ सामान, नाम से गुलजार साहब ने बाद में अपने गानों का एक अलबम भी निकाला जिसे वर्ष 2005 में सारेगामा कंपनी ने रिलीज किया था। वहीं आशा भोंसले के 75 जन्मदिन पर भी इसी कंपनी ने जो अलबम जारी किया था, उसका नाम भी मेरा कुछ सामान, रखा गया था जिसमें यह गाना शामिल था। मई 2011 में गुलजार की कहानियों पर आधारित जिन नाटकों का मंचन मुंबई और दिल्ली में हुआ था, उस श्रृंखला का नाम भी मेरा कुछ सामान- रखा गया था। -
-लता मंगेशकर के प्रशंसक संगीतकारों को आशा ने कभी निराश नहीं किया
-आलेख- प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)
जादुई आवाज की मलिका आशा भोसले का निधन संगीत की दुनिया में एक और खालीपन छोड़ गया है। 92 साल की उम्र में भी वे बड़ी जिंदादिल और चंचल थीं। यह खूबी उनकी गायिकी में भी झलकती थी। लता मंगेशकर की बहन होना और फिर उनकी छाया से अलग होकर विविधता भरा मुकाम हासिल करना, किसी भी नई गायिका के लिए नामुमकिन था लेकिन आशा भोसले ने इसे चुनौती माना और सफलता के उच्च शिखर तक पहुंची।
आशा को बरसों-बरस लता की छोटी बहन के तौर पर जाना जाता रहा। जाहिर है एक गायिका के रूप में उन्हें अपनी मौलिक पहचान बनाने में बड़ी दिक्कतें आईं। 1940 के दशक में जब आशा ने पाश्र्व गायन की दहलीज पर कदम रखा, तब लता मंगेश्कर अपनी पहचान बना चुकी थीं। उस वक्त संगीतकार नौशाद की तूती बोलती थी। नौशाद के गाने की शुरुआत लता से ही होती थी। आशा भोसले उस वक्त की चर्चित गायिका शमशाद बेगम और गीता दत्त से बहुत प्रभावित हुर्इं । नौशाद ने आशा को मौका यही सोचकर दिया कि वह भी लता की तरह गाने में असर पैदा कर पाएंगी, लेकिन आशा ने लता दीदी की नकल करने की बजाय अपनी पहचान को महत्व दिया। बाद में आशा नौशाद की मुख्य गायिका बन गई और उनके संगीत निर्देशन में उन्होंने अनगिनत हिट गाने गाये। नौशाद ने आशा की आवाज में पहला गाना तब रिकॉर्ड करवाया, जब उन्हें आशा पर भरोसा नहीं था। वहीं लता के लिए समर्पित संगीतकार सज्जाद और सी. रामचंद्र ने भी जब आशा को मौका दिया तो उन्हें निराश नहीं होना पड़ा। सज्जाद तो लता के बिना ‘रुखसाना’ फिल्म बनाना ही नहीं चाहते थे। पर बाद में इस फिल्म के गानों को उन्होंने आशा से गवाया और फिर खुद सज्जाद सभी से आशा की तारीफ करने लगे। इस फिल्म में आशा-किशोर का युगल गीत ‘यह चार दिन बहार के’ उस वक्त काफी लोकप्रिय हुआ।
संगीतकार अनिल विश्वास के आशा के लिए शब्द थे- ‘आशा की आवाज देह के साथ उपस्थित होती है तो लता की आवाज आत्मा के साथ’ । संगीतकार अनिल विश्वास तो अपने रिकॉर्डिंग रूम में लता के अलावा किसी को देखना नहीं चाहते थे, लेकिन वे भी आशा के मुरीद हो गए। इस बारे में आशा ने कहा था-‘अनिल दा के साथ काम करते समय उन्हें बड़ा डर लग रहा था। उन्हें भी दिल की गहराइयों में डूबकर आत्मा से सुर निकालना पड़ा।’ संगीतकार सी. रामचंद्र लता के प्रशंसक होने के साथ-साथ उनके काफी करीबी थे। आशा ने कभी सोचा ही नहीं था कि उनके साथ काम करने का मौका मिलेगा। सी. रामचंद्र ने जब आशा के सामने ‘सोजा रे चंदा सोजा’ (फिल्म-आशा) का शास्त्रीय गीत गाने की पेशकश की तो वे आश्चर्य में पड़ गईं। इस गाने से आशा को एक नया मुकाम हासिल हुआ।
संगीतकार रोशन के लिए भी लता ही पसंदीदा गायिका बनी रहीं। हालांकि उस वक्त तक आशा के कई एकल और युगल गीत हिट हो चुके थे। कहा जाता है कि उस दौर में रोशन गायिका राजकुमारी या गीता दत्त से भी गाना गवाने के बारे में सोच सकते थे, पर आशा के बारे में नहीं। उन्हें इस बात का भी अंदाज नहीं था कि ‘दिल ही तो है’ का यमन राग में लयबद्घ हिट कव्वाली ‘निगाहें मिलाने को जी चाहता है’ आशा इतनी बखूबी गाएंगी। बाद में रोशन ने आशा की काबिलियत को पहचाना और उन्हें कई मौके दिए। ‘ताजमहल’ की कव्वाली ‘चांदी का बदन सोने की नजर’ आज भी भुलाएं नहीं भूलती।
मदन मोहन एक ऐसे संगीतकार थे जो लता के पर्याय माने जाते रहे। सच कहें तो अगर उनके संगीत में लता की आवाज निकाल दी जाए तो कुछ भी नहीं बचेगा। मदन मोहन के संगीत में आशा ने वही गाने गवाये जिन्हें लता ने गाने से मना कर दिया। लता और आशा की आवाज का फर्क उन्होंने फिल्म ‘अदालत’ की इस गाने में बखूबी बताया- ‘जा जा रे जा साजना, काहे सपनों में आये जाके देस पराए...’ नरगिस के लिए लता की गंभीर और दर्दभरी आवाज का इस्तेमाल और चुलबुली सह नायिका के लिए आशा की आवाज। ‘अश्कों से तेरी हमने तस्वीर बनाई है’ गीत के लिए मदन मोहन ने आशा की काफी तारीफ की।
1984 में फिल्म उत्सव में भी इसी तरह का प्रयोग लक्ष्मीकांत - प्यारे लाल ने किया। फिल्म का एक हिट गीत -मन क्यों बहका री बहका, में उन्होंने लता-आशा की जोड़ी बनाई। दोनों बहनों की अलग गायकी के अंदाज ने इस गाने को यादगार बना दिया।
संगीतकार शंकर जयकिशन की सफलता में लता का बहुत बड़ा हाथ था। उन्होंने आशा की आवाज या तो बच्चों के लिए इस्तेमाल की या तेज गति से गानों के लिए जैसे- ‘श्री 420’ का ‘मुड़-मुड़ के न देख’ गीता जब शंकर-जयकिशन ने ‘करोड़पति’ का ‘हाय! सावन बन गए नैन’ गीत आशा को गाने दिया तो इसके पीछे उनकी लता से चल रही अनबन ही मुख्य वजह थी। यह गीत आशा के कालजयी गीतों में से एक माना जाता है। लता से उखड़ी यह संगीतकार जोड़ी फिर आशा के साथ ही बंधकर रह गई।
संगीतकार सलिल चौधरी का संगीत आशा को बेहद पसंद था पर अन्य संगीतकारों की तरह सलिल चौधरी के लिए आशा दूसरी पसंद रहीं। संगीतकार खय्याम की हस्ती लता से ही थी, लेकिन आशा ने भी उन्हें हिट गाने दिए। लता के प्रशंसक खय्याम ने जब फिल्म उमराव जान के संगीत की कमान संभाली तो सभी ने सोचा कि लता ही उनकी मुख्य गायिका होंगी, लेकिन खय्याम ने आशा का चुनाव करके सबको हैरत में डाल दिया। इस फिल्म की गजलों में एक नई आशा लोगों के सामने आई। खय्याम ने आखिर आशा में कैसे यह चमत्कार पैदा किया, यह सभी के लिए एक बड़ा आश्चर्य था। इस फिल्म के लिए आशा ने राष्टï्रीय पुरस्कार जीता।
गुलजार की फिल्म ‘इज्जत’ में आशा की कलात्मक गायिकी लोगों के सामने आई। ‘मेरा कुछ सामान’ गीत आशा ने इतनी खूबसूरती से गाया कि यह आशा का भी पसंदीदा बना गया। इस गाने की मुरकियां सुनते ही बनती हैं। इस फिल्म के लिए भी आशा ने राष्टï्रीय पुरस्कार जीता। आशा भोंसले का जिक्र संगीतकार ओ.पी. नैयर के बिना अधूरा है। नैयर के संगीत में आशा ने एक से बढक़र एक गाने दिये। लता से खटपट ओ. पी. नैयर को आशा के इतना करीब ले आई कि वे आशा के बिना अपने संगीत की कल्पना भी नहीं करते थे।
पॉप की दुनिया में आर.डी. बर्मन ने आशा की आवाज का अच्छा इस्तेमाल किया, लेकिन उन्होंने ‘मेरा कुछ सामान’ जैसे गाने भी गवाकर आशा की काबिलीयत की सही परख भी की। आशा पंचम दा की जीवन संगिनी भी बनी और पंचम दा के संगीत को आशा ने जो सुर दिए, वह शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। पंचम के साथ शादी उन्हें उनके पिता और संगीतकार एस.डी. बर्मन के संगीत निर्देशन से जरूर दूर ले गईं। एस.डी. बर्मन का साथ आशा ने वर्ष1957 के बाद हमेशा दिया। बर्मन दा वर्ष 1963 में बिमल राय की फिल्म बंदिनी के लिए लता को वापस बुलाने वाले थे, लेकिन उन्होंने अपना विचार बदला और आशा पर अपनी सारी आशाएं लगा दीं। ‘अब के बरस भेज भइयां को बाबुल’ गाने में आशा ने अपनी सारी प्रतिभा उड़ेल दी। ‘ज्वैलथीफ’ के गीत ‘रात अकेली है’ के लिए दादा आशा की तारीफ करते नहीं थकते थे। - विशेष लेख : डॉ. दानेश्वरी संभाकर, उप संचालकरायपुर ।छत्तीसगढ़ में वर्ष 2026 को “महतारी गौरव वर्ष” के रूप में मनाते हुए महिलाओं के सम्मान, स्वाभिमान और आर्थिक सशक्तिकरण को नई दिशा दी जा रही है। विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार की योजनाएं अब जमीनी स्तर पर प्रभावी परिणाम दे रही हैं, जिसका स्पष्ट प्रतिबिंब आंकड़ों में दिखाई देता है।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा कि महतारी गौरव वर्ष महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का व्यापक अभियान है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने बजट में महिलाओं और बच्चों के पोषण एवं स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए आंगनबाड़ी संचालन के लिए 800 करोड़ रुपए, पूरक पोषण आहार के लिए 650 करोड़ रुपए तथा कुपोषण मुक्ति व पोषण अभियान के लिए 235 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, जो आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ और सशक्त बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण निवेश है।महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ने कहा कि राज्य में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महतारी वंदन योजना एक मील का पत्थर साबित हुई है। 10 मार्च 2024 को प्रारंभ इस योजना के तहत लगभग 70 लाख महिलाओं को प्रतिमाह 1 हजार रुपए की सहायता मिल रही है। अब तक 26 किस्तों के माध्यम से 16 हजार 881 करोड़ रुपए से अधिक राशि सीधे लाभार्थियों के खातों में अंतरित की जा चुकी है, वहीं इस योजना के लिए 8 हजार 200 करोड़ रुपए का बजट प्रावधान राज्य सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।उन्होंने बताया कि बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए प्रस्तावित रानी दुर्गावती योजना के तहत 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने पर 1 लाख 50 हजार रुपए की सहायता दी जाएगी, जिसके लिए 15 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।राज्य में महिलाओं के लिए आधारभूत सुविधाओं का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। महतारी सदनों के निर्माण के लिए 75 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, जिसके अंतर्गत अब तक 368 सदनों को स्वीकृति दी जा चुकी है और 137 का निर्माण पूर्ण हो चुका है। साथ ही 500 नए आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण के लिए 42 करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं, जिससे ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में सेवाओं की पहुंच और मजबूत होगी।मातृत्व सुरक्षा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के अंतर्गत 3 लाख 73 हजार से अधिक पंजीयन दर्ज किए गए हैं तथा 235 करोड़ रुपए से अधिक की राशि का भुगतान किया जा चुका है। वर्ष 2023-24 में जहां 1 लाख 75 हजार से अधिक पंजीकरण हुए, वहीं 2024-25 में यह संख्या बढ़कर 2 लाख 19 हजार से अधिक हो गई। वर्ष 2025-26 में फरवरी तक 2 लाख 4 हजार से अधिक पंजीयन हो चुके हैं, जो निर्धारित लक्ष्य का 93 प्रतिशत से अधिक है।पोषण अभियान में भी राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। पोषण माह 2024 के दौरान प्रति केंद्र प्रदर्शन में प्रदेश को प्रथम स्थान तथा कुल गतिविधियों में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। वहीं न्योता भोज जैसे नवाचारों के तहत 9 हजार 700 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 1 लाख 83 हजार से अधिक बच्चों को लाभ मिला।मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने बताया कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्व-सहायता समूहों को रेडी-टू-ईट जैसे कार्यों से जोड़ा जा रहा है तथा लखपति दीदी योजना के माध्यम से उन्हें व्यवसायिक अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। उज्ज्वला योजना के तहत लगभग 38 लाख महिलाएं लाभान्वित हो रही हैं, जिससे उन्हें स्वच्छ ईंधन की सुविधा मिली है। वहीं सखी वन स्टॉप सेंटरों की संख्या 27 से बढ़ाकर 34 कर दी गई है, जहां 14 हजार 300 से अधिक प्रकरणों में से 8 हजार 900 से अधिक का निराकरण किया जा चुका है।स्पष्ट है कि “महतारी गौरव वर्ष” केवल एक प्रतीकात्मक पहल नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देने वाला अभियान है। विष्णु देव साय और लक्ष्मी राजवाड़े के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में महिलाएं अब विकास की धुरी बनकर उभर रही हैं और राज्य को नई दिशा दे रही हैं।
- (उद्योग व श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन के जन्मदिन के अवसर पर विशेष )छगन लाल लोन्हारेउप संचालक जनसम्पर्करायपुर /मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने जिस स्पष्ट नीति के साथ श्रमिकों और उद्योगों के समन्वित विकास को प्राथमिकता दी है, वह आज ठोस परिणामों के रूप में सामने आ रही है। श्रम विभाग की योजनाओं में यह भावना स्पष्ट झलकती है कि श्रमिक केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि समाज की आधारशिला हैं। उनके जीवन में स्थायित्व, सम्मान और सुरक्षा लाना ही सच्चे विकास का संकेत है। 12 अप्रैल का यह विशेष अवसर उद्योग तथा श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन के समर्पण, कार्यक्षमता और जनसेवा की भावना को याद करने का दिन है। आपके कुशल नेतृत्व से ही छत्तीसगढ़ प्रगति, समृद्धि और समान अवसरों का आदर्श राज्य बनकर उभरा है।2026 रजत जयंती वर्ष में छत्तीसगढ़ के विकास की वर्तमान यात्रा केवल योजनाओं और घोषणाओं की कहानी भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे नेतृत्व की कथा है जिसने श्रमिक, युवा, उद्यमी और समाज के हर वर्ग को साथ लेकर आगे बढ़ने का संकल्प लिया है। इस परिवर्तनकारी दौर में उद्योग व श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनका कार्य केवल प्रशासनिक दक्षता तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता और दूरदर्शिता का जीवंत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ सरकार ने 25 वर्ष की अल्प आयु में उद्योग के क्षेत्र में जो एक नया इतिहास रचने का संकल्प लिया है वह किसी से छिपा नहीं है। उद्योग के क्षेत्र में आज छत्तीसगढ़ की अपनी एक अलग पहचान है। नई उद्योग नीति (2024-2030) में छत्तीसगढ़ के समावेशी विकास पर जोर दिया गया है।श्रमिकों के सशक्तिकरण की दिशा में उठाए गए कदमों में सबसे प्रेरणादायक पहल श्रमिकों के बच्चों को उत्कृष्ट विद्यालयों में निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना है। यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि परिवर्तन का वह मार्ग है जिससे कि आने वाली नई पीढ़ी ज्ञान और अवसरों के माध्यम से अपना सुनहरा और सुरक्षित भविष्य स्वयं गढ़ सके। आज के संदर्भ में श्रमिक परिवारों के बच्चों का राज्य के प्रतिष्ठित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करना, एक नए छत्तीसगढ़ की तस्वीर प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही मेरिट में आने वाले विद्यार्थियों को लाखों रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान करना सरकार की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें प्रतिभा का सम्मान सर्वाेपरि है। यह न केवल उन बच्चों के लिए गौरव का क्षण है, बल्कि पूरे श्रमिक समाज के लिए आत्मविश्वास का स्त्रोत भी है।उद्योग और श्रम विभाग से आर्थिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पिछले दो वर्षों में सैकड़ों करोड़ रुपये सीधे श्रमिकों के खातों में हस्तांतरित किए गए हैं, जिससे न केवल पारदर्शिता बढ़ी है, बल्कि सरकार की योजनाओं का वास्तविक लाभ भी सुनिश्चित हुआ है। प्रतिदिन हजारों श्रमिकों को विभिन्न योजनाओं का लाभ मिलना इस बात का प्रमाण है कि शासन की नीतियां धरातल पर प्रभावी रूप से लागू हो रही हैं। श्रमिकों के जीवन को अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने के लिए आवास सहायता, शहीद वीर नारायण सिंह श्रम अन्न योजना, दुर्घटना में त्वरित आर्थिक सहयोग जैसी पहलें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से ’श्रम अन्न योजना’ के अंतर्गत मात्र 5 रुपये में गरम और पौष्टिक भोजन। ’श्रम अन्न योजना’ के अंतर्गत मात्र 5 रुपये में गरम और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना, एक मानवीय और संवेदनशील शासन का परिचायक है। औद्योगिक विकास के क्षेत्र में भी मंत्री लखनलाल देवांगन के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने नई ऊंचाईयों को छुआ है। औद्योगिक विकास नीति 2024-30 के माध्यम से राज्य में निवेशको को प्रोत्साहित करने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। करोड़ों रुपये के निवेश प्रस्ताव, सैकड़ों नए उद्योगों की स्थापना और हजारों युवाओं को रोजगार मिलना इस नीति की सफलता को प्रमाणित करता है।नवा रायपुर में देश का पहला एआई डाटा सेंटर स्थापित करने की दिशा में बढ़ता कदम, सेमीकंडक्टर और आईटी जैसे उभरते क्षेत्रों में निवेश, तथा स्टार्टअप नीति का क्रियान्वयन ये सभी पहलें छत्तीसगढ़ को पारंपरिक अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ाकर आधुनिक तकनीकी युग में स्थापित कर रही हैं। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना को भी नई दिशा देने वाला है। प्रशासनिक सुधारों के क्षेत्र में ई-निविदा प्रणाली और सिंगल विंडो सिस्टम जैसे कदमों ने पारदर्शिता को बढ़ाया है जिससे निवेशकों का विश्वास मजबूत हुआ है और राज्य में व्यापार करने की प्रक्रिया सरल बनी है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ आज निवेशकों के लिए एक आकर्षक गंतव्य बनता जा रहा है।सामाजिक समावेशन को छत्तीसगढ़ सरकार ने अपनी विकास यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन, कामकाजी महिलाओं के लिए हॉस्टल और दूरस्थ क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की योजनाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। सामाजिक समावेश नही किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति का आधार होता है।उद्योग तथा श्रम मंत्री श्री लखनलाल देवांगन ने अपने गंभीर व दूर-दृष्टि सोच एवं विभागीय दायित्वों के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि यदि नेतृत्व में संवेदनशीलता और स्पष्ट दृष्टि हो, तो विकास केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाता है। वहीं मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय सरकार के मार्गदर्शन में यह परिवर्तन और अधिक सशक्त और व्यापक रूप ले रहा है।
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विशेष लेख : मुख्यधारा में लौटे माओवादियों का शिक्षा पर भी विशेष ध्यान
रायपुर । जिन हाथों ने कभी बंदूक थामकर हिंसा की मार्ग अपनाया था, अब वहीं हाथ अपने हुनर का कमाल दिखा रहे हैं। भानुप्रतापपुर के पास ग्राम चौगेल के पुनर्वास केन्द्र में प्रशिक्षण प्राप्त आत्मसमर्पित नक्सलियों द्वारा हुनर दिखाते हुए काष्ठ कला से नेम प्लेट, छत्तीसगढ़ शासन का ‘लोगो’, ग्राम पंचायतों के लिए बोर्ड, बच्चों के लिए की-रिंग सहित अन्य सजावटी सामग्री तैयार की जा रही है, साथ ही कपड़े का थैला, कार्यालयों के लिए बस्ता भी तैयार किया जा रहा है। सरकार द्वारा घोषित नक्सल पुनर्वास नीति के तहत कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन कांकेर द्वारा आत्मसमर्पित नक्सलियों को कुशल और दक्ष बनाने का सार्थक प्रयास किया जा रहा है। यहां पर उन्हें काष्ठशिल्प के साथ ही इलेक्ट्रिशियन, ड्रायविंग, सिलाई, राजमिस्त्री जैसे पाठ्यक्रमों का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। कभी नक्सली गतिविधियों में संलिप्त रहे युवक-युवतियॉ अब विभिन्न व्यवसाय में दक्ष हो रहे हैं, ताकि वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होने के बाद आजीविकामूलक गतिविधियों से जुड़कर सम्मानपूर्वक जीवन निर्वाह कर सकें।मुख्यधारा में लौटे माओवादियों का शिक्षा पर भी विशेष ध्यानचौगेल कैंप बना कौशल प्रशिक्षण केंद्रवर्षों से लाल आतंक के साए में हिंसा का दंश झेल रहा बस्तर संभाग अब विकास की ओर आगे बढ़ रहा है। शासन द्वारा नक्सल मुक्त बस्तर घोषित किया जा चुका है। हिंसा की राह त्यागकर मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को सरकार कौशल विकास का प्रशिक्षण दे रही है, ताकि वे सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर सकें। आत्मसमर्पित नक्सलियों को पुनर्वास नीति-2025 के अंतर्गत भानुप्रतापपुर विकासखंड के पास ग्राम चौगेल (मुल्ला) कैम्प में विभिन्न सृजनात्मक और रोजगारमूलक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कभी बीएसएफ का कैम्प रहा चौगेल (मुल्ला) का यह कैम्प अब हुनर सिखाने वाला गढ़ बन चुका है। यहां पर जिला प्रशासन द्वारा मुख्यधारा में लौटे 40 आत्मसमर्पित माओवादियों को अलग-अलग पाठयक्रमों जैसे- काष्ठ शिल्प, इलेक्ट्रिशियन, सिलाई, ड्राइविंग, राजमिस्त्री इत्यादि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, साथ ही उनकी शिक्षा पर भी विशेष ध्यान दी जा रही है। पढ़ने के लिए पाठ्य सामग्री, पुस्तकें, पेन-पेंसिल दिए गए हैं तथा पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षकों की व्यवस्था भी की गई है। स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा आत्मसमर्पित नक्सलियों का नियमित रूप से स्वास्थ्य परीक्षण कर आवश्यकतानुसार दवाईयां भी दी जाती हैं। कैम्प में मनोरंजनात्मक गतिविधियां जैसे कैरम, वाद्य यंत्र, विभिन्न प्रकार के खेल भी आयोजित किया जाता है। चौगेल पुनर्वास केंद्र में राजमिस्त्री, इलेक्ट्रिशियन, वाहन चालक के साथ ही कांकेर में घुड़सवारी का भी प्रशिक्षण दिया जा चुका है। वर्तमान में सिलाई मशीन, काष्ठ शिल्प एवं असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। स्वरोजगार के लिए सशक्त बनाने हेतु कृषि विभाग, मत्स्य पालन विभाग, उद्यानिकी, पशुधन विकास विभाग के साथ ‘बिहान’ के द्वारा एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन भी किया गया है।प्रशिक्षण उपरांत नियोजन करने वाला पहला जिला बना कांकेरपुनर्वास केंद्र में प्रशिक्षण उपरांत नक्सली पीड़ित एवं आत्मसमर्पित नक्सलियों को रोजगार से जोड़ने वाला कांकेर पहला जिला बन चुका है। कलेक्टर श्री निलेशकुमार महादेव क्षीरसागर ने अपने हाथों से तीन नक्सली पीड़ित और एक आत्मसमर्पित नक्सली को निजी क्षेत्र में नौकरी के लिए नियुक्ति पत्र सौंपा, इनमें पुनर्वासित सगनूराम आंचला एवं नक्सल पीड़ित रोशन नेताम, बीरसिंह मंडावी और संजय नेताम शामिल थे। इन सभी को निजी फर्म का नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया, जहां उन्हें 15 हजार रूपए प्रतिमाह मानदेय और अन्य प्रकार की वित्तीय सुविधाएं प्राप्त होंगी। इन्होंने चौगेल कैम्प में असिस्टेंट इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण प्राप्त किया था तथा उन्हें निजी क्षेत्र में नियोजित किया गया है। मुख्यधारा में लौटकर प्रशिक्षण के उपरांत रोजगार प्रदान करने के मामले में उत्तर बस्तर कांकेर पहला जिला है। निजी क्षेत्र में नौकरी मिलने पर खुशी व्यक्त करते हुए माओवाद पीड़ित श्री बीरसिंह मंडावी ने कहा कि ग्राम मुल्ला (चौगेल) के कैम्प में पुनर्जीवन मिला है, जहां निःशुल्क प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल एवं पारंगत बनाया गया, वहीं प्रशिक्षण के बाद जिला प्रशासन द्वारा रोजगार भी उपलब्ध कराया जा रहा है। - 0- मेरी जापान डायरी- डा. अभया जोगेलेकररायपुर। हम सब केवल अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और संघर्षों में इतने उलझ जाते हैं, जीवन की सरल सुंदरता को भूल जाते हैं। जीवन केवल दौड़ने का नाम नहीं, महसूस करने का भी नाम है। प्रकृति की सुंदरता, अपने भीतर की शांति और उन क्षणों का आनंद जो हमें वास्तव में जीवित महसूस कराते हैं। यह सब मैंने जापान में महसूस किया, क्योंकि यहां आकर मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला।थॉमस कुक के साथ हमारी जापान यात्रा की 22 से होकर 31 मार्च तक थी। 22 मार्च की सुबह जब टोक्यो की गलियों में कदम रखा, तो महसूस हुआ कि यहां की हवा में एक अजीब सी ताजगी थी, जैसे हर सांस में कोई नई शुरुआत छिपी हो। सड़कों के किनारे खिलते चेरी ब्लॉसम (जापानी लोग इसे सकुरा कहते हैं) पेड़ों ने पूरे शहर को गुलाबी और सफेद रंगों से रंग दिया था। ऐसा लग रहा था मानो आसमान ने खुद धरती पर उतरकर फूलों की चादर बिछाई हो।हर पंखुड़ी हवा में तैरती हुई किसी कहानी का हिस्सा लग रही थी। बच्चे नौजवान, बूढ़े और हम जैसे सैलानी इस अद्भुत नज़ारे को देख रहे थे। हमारे गाइड ने बताया इन पेड़ों पर पहले गुलाबी रंग के फूल लगते हैं। यही बाद में सफ़ेद रंग में बदल जाते है और अंत में सफ़ेद फूलों के झड़ने के बाद इनमें हरी पत्तियां आती हैं। कुछ पेड़ गुलाबी, कुछ सफ़ेद और कुछ ऐसे पेड़ जिनमें पट्टियां आ रही थी, ये दृश्य देखने में मजा आ रहा था। इन पेड़ों के नीचे बच्चे खेल रहे थे और हम जैसे उत्साही लोग सेल्फी लेकर यादें संजोने का काम कर रहे थे और वहां के बुजुर्ग शांत मन से उस सुंदरता को निहार रहे थे। यह सिर्फ एक मौसम का नजारा नहीं था, यह जीवन का उत्सव था। एक तरह से क्षणभंगुरता में भी सुंदरता खोजने का प्रतीक।यूएनई पार्क, दागोजी टेम्पल, हकोने, क्योटो और हिरोशिमा में बैठकर जब उन फूलों को गिरते देखा, तो मन में केवल एक ही विचार आया शायद यही “अल्टीमेट ब्लॉसम” है। वह क्षण जब फूल अपनी पूरी सुंदरता में खिलता है और फिर बिना किसी पछतावे के हवा में बिखर जाता है। जीवन भी तो कुछ ऐसा ही है... खिलना, मुस्कुराना, और फिर समय के साथ सहजता से आगे बढ़ जाना।उन सभी स्थानों में जहां- जहां हमने सकुरा को खिलते हुए देखा... सुबह हो या शाम, जब सूरज का उदय हो रहा हो या फिर सूरज ढल रहा था और चेरी ब्लॉसम की पंखुड़ियां सुनहरी रोशनी में चमक रही थीं, तब महसूस हुआ कि जापान सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि एक भावना है सादगी, अनुशासन और क्षणिक सुंदरता की भावना।यह अध्याय मेरे सफर की शुरुआत था, जहां हर फूल ने मुझे सिखाया कि सुंदरता स्थायी नहीं होती, पर उसकी यादें हमेशा दिल में खिली रहती हैं। जीवन के भाग दौड़ में कुछ पल अपने लिए अपनों के बीच संजोने का अवसर सदा यादगार रहेगा।--
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)राजनीति है एक अखाड़ा, आजा तू भी दाँव लगा ले।चाटुकारिता की चटनी से, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।अनपढ़ अँगूठा छाप चलेगा, जोड़-तोड़ में होशियार हो।अहंकार मक्कारी भर-भर, शेर भीतर रँगा सियार हो।गिरगिट जैसे रंग बदलकर, धोखेबाजी की कला दिखा ले।।चाटुकारिता की चटनी से, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।पड़े जरूरत तुरत गधे को, अपना वह बाप बना ले।स्वार्थ-सिद्धि होती है जिसमें, झुककर एकाध लात खा ले ।झिझक माँगने में हो कैसी, माँग-माँग कर काम बढ़ा ले।।चाटुकारिता की चटनी से, जीवन का स्वाद बढ़ा ले।।बिन पेंदी का लोटा बनकर, लुढ़के जिधर भी फायदा हो।सांठगांठ रखता गुंडों से, बदतमीज बेकायदा हो।बेशर्मी का लगा मुखौटा, सिक्कों में ईमान बिका ले।।चाटुकारिता की चटनी खा, जीवन को स्वादिष्ट बना ले।।
- गीत-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)बदले-बदले सुर गीतों के,लेकिन बोल पुराने हैं।गाँव वही जाना पहचाना,लोग हुए अनजाने हैं ।।नहीं कटोरी सब्जी की अब,आती-जाती खिड़की से।नहीं पड़ोसी चाचा-मामा,भय न किसी की झिड़की से।सीमित होते गए दायरे,दोस्त हुए बेगाने हैं।।सूनी हैं बाड़ी अमराई,नहीं मिले सब्जी ताजी।त्योहारों की रौनक फीकी,नहीं ताश की है बाजी।हँसी-खुशी सुख मेल-जोल के,मेले नहीं ठिकाने हैं।।दास बने सब सुख-सुविधा के,नहीं काम कर से होता।नहीं स्नेह सहयोग समन्वय,गाँव उपेक्षित हो रोता।सूने-सूने घर के आँगन,भरे हुए मयखाने हैं।।
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-डॉ. नीरज गजेंद्र
भारतीय पौराणिक परंपरा में त्याग और लोककल्याण के अनेक उदाहरण मिलते हैं, किंतु ऋषि दधीचि की कथा उन सबमें अद्वितीय है। यह एक पौराणिक प्रसंग नहीं, मनुष्य को यह समझाने वाला गहन आध्यात्मिक संदेश है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य स्वयं के लिए जीना नहीं, समाज और सृष्टि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करना है।
ऋषि दधीचि का उल्लेख प्रमुख रूप से ऋग्वेद, भागवत पुराण और महाभारत में मिलता है। इन ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार उस समय असुरों का अत्याचारी राजा वृत्रासुर इतना शक्तिशाली हो गया था कि देवताओं को भी पराजित कर चुका था। देवताओं के स्वामी इन्द्र सहित सभी देवता संकट में पड़ गए।
देवताओं ने सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु से समाधान पूछा। विष्णु ने बताया कि वृत्रासुर का वध उस अस्त्र से संभव है जो महान तपस्वी दधीचि ऋषि की हड्डियों से बनाया जाएगा। देवताओं के सामने यह एक कठिन स्थिति थी किसी ऋषि से उसके शरीर का दान कैसे मांगा जाए।
जब देवता दधीचि के आश्रम पहुंचे और उनसे विनम्रता से अपनी समस्या बताई, तब ऋषि दधीचि ने बिना किसी संकोच के अपनी हड्डियां दान करने की सहमति दे दी। उन्होंने कहा कि यदि मेरे शरीर का उपयोग लोककल्याण के लिए हो सकता है, तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा। इसके बाद उन्होंने योगबल से अपना शरीर त्याग दिया। उनकी हड्डियों से देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा ने वज्र बनाया, जिससे इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया और संसार में पुनः संतुलन स्थापित हुआ।
यह कथा एक वीरगाथा नहीं, भारतीय धर्म और दर्शन का गहन सिद्धांत प्रस्तुत करती है। ऋषि दधीचि ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि मनुष्य का शरीर भी तभी सार्थक है जब वह समाज के काम आए।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो यह कथा हमें अहंकार से ऊपर उठने का संदेश देती है। मनुष्य प्रायः अपने शरीर, संपत्ति और पद को ही अपना सर्वस्व मान बैठता है। किंतु भारतीय दर्शन कहता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत। जब यह समझ विकसित हो जाती है, तब त्याग कठिन नहीं रह जाता। दधीचि ने इसी सत्य को जीकर दिखाया।
यदि इस कथा को आधुनिक संदर्भ में देखें, तो इसका सबसे बड़ा संदेश अंगदान और परोपकार की भावना में दिखाई देता है। आज चिकित्सा विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि किसी व्यक्ति के अंग कई अन्य लोगों को नया जीवन दे सकते हैं। जिस प्रकार दधीचि की हड्डियों से बना वज्र समस्त देवताओं की रक्षा का कारण बना, उसी प्रकार आज किसी व्यक्ति का अंगदान कई परिवारों के लिए आशा की किरण बन सकता है।
इतिहास में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां किसी व्यक्ति के त्याग ने पूरे समाज की दिशा बदल दी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक सामाजिक आंदोलनों तक, हर युग में कुछ ऐसे लोग रहे जिन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधा को त्यागकर समाज के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। दधीचि की कथा इन सभी त्यागों का आध्यात्मिक आधार प्रतीत होती है।
इस कथा का एक और गहरा संदेश है कि सच्ची शक्ति तप, ज्ञान और त्याग से उत्पन्न होती है। दधीचि की हड्डियां साधारण नहीं थीं; वे वर्षों की तपस्या, आत्मसंयम और आध्यात्मिक शक्ति का परिणाम थीं। इसलिए उनसे बना वज्र इतना प्रभावी हुआ। यह हमें बताता है कि व्यक्ति की आंतरिक साधना ही उसकी वास्तविक शक्ति होती है।
आज जब समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों, स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और नैतिक संकट से गुजर रहा है, तब दधीचि की कथा एक प्रकाशस्तंभ की तरह सामने आती है। यह हमें याद दिलाती है कि सभ्यता की असली प्रगति तकनीक या संपत्ति से नहीं, त्याग और करुणा से होती है।
- छत्तीसगढ़ी कहानी-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)सावित्री हर होत बिहनिया उठ के अंगना कुरिया मनला बहार डारिस अउ नहा धो के ओनहा मन ला तको फटकार के छत मा सुखो के आगे । कंघी करत करत कुरिया डाहर झाँकिस , अभी दुनो लइका निंदिया रानी के कोरा मा मस्त माते रिहिन। नोनी रानी हर बारह बछर के रहिस अउ नानचुन बाबू ल ए साल नौ बछर हो जाही। ओखर गोंसइया सरवन हर घलो खटिया म करवट बदलत सुते रिहिस । आज ऊंखर छुट्टी ए त जम्मो झन अराम ले उठहीं, फेर महतारी मन के का छुट्टी अउ का डिप्टी। सबो दिन एक बरोबर लागथे, स्कूल,आफिस के छुट्टी रहिथे पेट ल तो सबो दिन भोजन चाही । हाँ फेर टाइम म करे के ओतेक हड़बड़ी नइ राहय, सावित्री ल ओखर गोंसइया हर देरी ले उठे बर कहिथे फेर सालों के आदत परे कइसे छूटही । नींद ह अपन टाइम म खुलेच जाथे।सावित्री हर सोझे नामे के सावित्री नोहय। अपन सत ले सत्यवान के परान यमराज ले मांग के लवइया सावित्री ले ओखर पत हर कोनो जिनिस म कमती नोहय । ओहर अपन गोसइया ले अबड़ मया करय, हारी बीमारी म बिकट सेवा करय । सास ससुर, घर परिवार के बड़ तोरा जतन करय तेखर पाय के जम्मो नता रिश्तेदार ओला बड़ मया करयँ । फेर कोनो के जिनगी हर पूरा नइ राहय , कोनो ल तन के दुख त कोनो ल मन के । सबके जिनगी म एकाध ठन कमी रहि जाथे। ज इसे गोड़ के पनही ल मुड़ म नइ पहिर सकयँ वइसनहेसरवन हर कतनो मया दय मइके के पूर्ति नइ कर सकय। छत्तीसगढ़ के बहिनी महतारी मन बर भादो के महीना हर खुशहाली लेके आथे काबर कि भादो के तृतीया म हरितालिका तीजा के तिहार आथे। एमा मइके ले बाप भाई मन ब्याहता बहिनी, फूफू ल लेहे बर जाथें । उमन मइके म निराहार बिना अन्न जल के उपास रहिथें अउ शंकर पार्वती के पूजा कर के अपन सुहाग ल अमर बनाय बर प्रार्थना करथें। दूसर दिन चौथ के भिनसरहे नहा धो पूजा पाठ करके मइके के नवा लुगरा पहिर के फरहार करथें। कका,बड़ा नाते रिश्तेदार घर तको फरहार करे के नेवता आथे। सबो बहिनी , फूफू संगे संग खाये पिये जाथें, बचपन के गोठ करथें, संगी जहुँरिया के सुरता करथें। अपन अतीत ल फेर जीथें। आजकल के भाई भौजी मन ए मरम ल नइ जानै , नेंग जोग ल फोकट के खर्चा कहिके बोझा मानथें। हजारों रूपिया गहना कपड़ा बर फूँक दिहीं फेर बहिनी ल देत खानी ऊँखर हाथ नइ खुलय । फेर ए घर बर तीजा हर त बिक्कट दुख के कारन बन जाथे।सावित्री अउ सरवन नानपन के संगी एके पारा म रहँय। एके स्कूल म संगे संग पढ़ें जाँय । दुनो परिवार म आना जाना घलो रिहिस। नान्हे पन के दोस्ती हर कब मया के रूप धर लीसा कोनो गम ना पाइन । ऊंखर संगी जहुंरिया मन तको नइ जानिंन दुनों झन के अंतस म का चुरत हे। सरवन के नौकरी लगे के बाद जब दुनों झन के घर मा बिहाव के गोठ बात होय लागिस तब ऊमन अपन घर म मया अउ बिहाव के गोठ ल गोठियाइन। आगबबूला होगे सावित्री के बाबूजी –” अइसनहा गोठियाय के तैं हिम्मत कइसे करे ? हमन मालगुजार अउ ओ बिसउहा हमर नौकर । ओहर मोर समधी बनही, मर जहूँ फेर ए गजब तमाशा नइ होन दंव “। बाबूजी हर अपन जिद म अड़े रिहिस , जात-पात के सुरसा हर सरवन-सावित्री के मया ल खाय बर मुँह फार दे रिहिस । सरवन अउ सावित्री बालिग होगे रिहिन भाग के बिहाव कर लिन। बाबूजी हर त भरे समाज म कहि दिस “आज ले मर गे सावित्री मोर बर “। बाप बर बहुतसरल रहिथे ए कहना , काबर के ओहर नौ महीना ओला अपन कोख म नइ धरे रहय । माँ हर बपरी अब्बड़ कलप-कलप रोइस –” मोर एक ठिन मयारू बेटी , चार भाई के बाद आय रिहिस । सबके जोरा करइया, एक ठिन गलती करिस तो ओखर सब गुण ल भुला देव । कतेक सउँख रिहिस बेटी के सुग्घर बिहाव करतेंव , बपरी ल अकेल्ला छोड़ दिस । सगा समाज बेटी के खुशी ले बड़े होगे । कोन आही सेवा करे,अपनेच खून काम आही । हाय रे ,मोर दुलउरीन बेटी ।”गौंटिया बाड़ा ले कपड़ा लत्ता अउ दिगर जरुरत के समान लेहे बर नौकर-चाकर रायपुर आत-जात रहँय। महतारी के मन नइ मानय, बेटी बर घर के दूध-दही ,साग भाजी , कपड़ा लत्ता कुछु कांही एक झन विश्वास पात्र जून्ना नौकर तिर भेजत राहय। ए गोठ ल सावित्री के बाबू ल कोनो दुश्मन बता दिस तो ओहर बिक्कट चिल्लाईस– “ तोला बड़ मया हे बेटी के त जा घर छोड़ के , उहें रहिबे “।अतेक बछर होगे बिहा के आये ए घर मा । सास-ससुर, ननद,देवर , लइका बाला सबके तोरा ल करेंव। फेर मोर कोनो मान नइहे। सब निर्णय खुदेच लेथें ,कभू मोर अंतस के पीरा ल नि समझिन। बेटी हर बनेच करिस,अइसन जीवन साथी खोजिस जउन ओखर मन ल समझिस, जउन जिंदगी भर ओखर कदर करही , मया करही । सावित्री के माँ हर बड़बड़ा के रहिगे।रिश्ता के मरजाद रखे बर कतनो महतारी अपन मन ल मार के रहि जाथें। सावित्री के माँ हर कइसनहो करके तीजा आय त बेटी बर लुगरा खच्चित भेजवातिस। साल भर मन ल मार के रहि जाय फेर तीजा म मन नइ मानय। दू बछर होगे बाप के कलेजा न इ पिघलिस। माँ हर जब ले सुने रिहिस सावित्री सरवन के घर बेटी आय हे , ओखर खुशी के ठिकाना नइ रिहिस । नतनीन ल देखे के सउँख हर ओला अतेक हिम्मत दिस के ए तीजा म ओहर बेटी के घर जाय के मन बना लिस। घर म गोठियाय ले कोनो चिटपोट नइ करिन। भाई मन तको लुका-लुका बहिनी ल भेंटें जांय फेर बाप के आघू म बोले के कोनो हिम्मत ना करँय। मां हर सावित्री तिर अपन जाय के गोठ कहिस त सावित्री के बाबू जी हर धमकाइस -” तैं उहाँ जाबे त मोर मरे मुख देखबे। “ कोन जानी गौंटनिन के मन म का रिहिस। तीजा के लुगरा लेहे बर जाथंव कहिके रायपुर जाय बर निकलिस । सोलह श्रृंगार करके मन भर के समान बेटी दमाद, नतनिन बर बिसाइस अउ बेटी के घर गिस। कतेक बछर के बाँधे मया आँसू के धार बन के बोहाय लागिस। मन भर दुनो झन दुख सुख गोठियाइन। बेटी ल खुश देख के दाई के जी जुड़ा गे । लहुटती खानी रद्दा के बड़े तरिया तिर गाड़ी ल रुकवाइस । नौकर मन ल थिराय बर कहिके एती ओती पठो दिस। फेर चुप्पे तरिया म उतर के जल समाधि ले लिस । गाँव भर गोहार परगे। सावित्री के बाबू हर ओखर लहाश ल देख के मूर्छा खाके गिर गे। होश आवय तो छाती पीट-पीट रोवय पछतावय । “ काबर अतेक बड़ कदम उठाए ,मैं मूरख अपन रुतबा, रुपिया पइसा अउ उच्च जात के घमंड म अपन घर के सत्यानाश कर डारेंव। तैं ए उमर ममोला अकेल्ला छोड़ के कइसे चल दे । तैं कहिते त अपन अहंकार ल छोड़ के महूं तोर संग सावित्री घर चल देतेंव..।” जम्मो झन इही गोठियात रिहिन अब का फायदा पछताय के ओखर प्रान के चिरैया हर त उड़ागे।सावित्री के तो जइसे जान निकलगे,बड़ मुश्किल से सरवन हर ओला सँभालिस , लइका के मुँह ल देख के सँभलगे नइते उहू पगला जाय रहितिस । सावित्री के माँ के जाय ले कई बेर ओखर बाबूजी हर ओला देवाय भेजिस फेर सावित्री नइ गिस । ओखर नाती नतनिन ले ओला दूरिहा नइ करिस । उमन ममाघर आथे जाथें, ममा मामी घलो आथें। हर बछर तीजा म लुगरा आथे फेर सावित्री ओला छुवय नहीं। एकेच ठन लुगरा ल पहिर के तीजा के दिन फरहार करथे जेला देहे बर ओखर माँ हर अपन जान दे दिस । तीजा के ओ लुगरा म सावित्री हर अपन माँ ले भेंट करथे साल म एक घं । महतारी के ममता भरे छुअन, मया अउ दुलार भरगे हे ओ लुगरा मा, ओखर प्रान समा गये हे ओ तीजा के लुगरा मा ।
- • धनंजय राठौर, संयुक्त संचालक /जयंत देवांगन, संयुक्त संचालकरायपुर/ छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में खेल, पर्यटन और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘बस्तर हेरिटेज मैराथन 2026’ का आयोजन रविवार 22 मार्च को करने जा रही है। यह राज्य का अब तक का सबसे बड़ा रनिंग इवेंट होगा, जिसकी शुरुआत जगदलपुर के ऐतिहासिक लालबाग मैदान से होगी और समापन विश्वप्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात पर होगा। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस रूट पर दौड़ते हुए प्रतिभागियों को बस्तर की अद्भुत वादियों और सांस्कृतिक पहचान का अनूठा अनुभव मिलेगा।मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने इस आयोजन को छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय बताते हुए कहा कि बस्तर हेरिटेज मैराथन केवल खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि राज्य की समृद्ध परंपरा, प्राकृतिक संपदा और जनभागीदारी का उत्सव है। उन्होंने कहा कि ‘बस्तर दौड़ेगा, देश जुड़ेगा’ के संदेश के साथ यह आयोजन न केवल फिटनेस को बढ़ावा देगा, बल्कि बस्तर को राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती से स्थापित करेगा। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य ऐसे आयोजनों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को अवसर देना, रोजगार सृजन को बढ़ावा देना और क्षेत्रीय विकास को गति देना है।मैराथन में 42 किलोमीटर (फुल मैराथन), 21 किलोमीटर (हाफ मैराथन), 10 किलोमीटर और 5 किलोमीटर (फन रन) की श्रेणियां रखी गई हैं, ताकि हर आयु वर्ग और फिटनेस स्तर के लोग इसमें भाग ले सकें। प्रतिभागियों के लिए कुल 25 लाख रुपये की आकर्षक पुरस्कार राशि निर्धारित की गई है। पंजीकरण शुल्क मात्र 299 रुपये रखा गया है, जबकि बस्तर संभाग के सातों जिलों के प्रतिभागियों के लिए यह पूरी तरह निःशुल्क है, जिससे स्थानीय स्तर पर अधिकतम लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।प्रतिभागियों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मैराथन मार्ग पर व्यापक व्यवस्थाएं की गई हैं। पूरे रूट पर नियमित अंतराल पर रिफ्रेशमेंट पॉइंट्स (आरपीएन) स्थापित किए जाएंगे, जहां एनर्जी ड्रिंक्स और पानी की उपलब्धता रहेगी। इसके अलावा मेडिकल सपोर्ट, इमरजेंसी सेवाएं और सुव्यवस्थित रूट मैनेजमेंट भी सुनिश्चित किया गया है ताकि प्रतिभागियों को सुरक्षित और सुगम अनुभव मिल सके। इस आयोजन को और यादगार बनाने के लिए प्रत्येक प्रतिभागी को फिनिशर मेडल, ई-सर्टिफिकेट और प्रोफेशनल रनिंग फोटोग्राफ्स प्रदान किए जाएंगे। साथ ही जुम्बा सेशन और लाइव डीजे जैसे आकर्षक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे, जिससे प्रतिभागियों में उत्साह और ऊर्जा बनी रहे।‘रन फॉर नेचर, रन फॉर कल्चर’ (प्रकृति के लिए दौड़ो, संस्कृति के लिए दौड़ो) की थीम पर आधारित यह मैराथन बस्तर की प्राकृतिक धरोहर और जनजातीय संस्कृति को देशभर के सामने प्रस्तुत करने का एक सशक्त माध्यम बनेगी। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने देशभर के खिलाड़ियों, फिटनेस प्रेमियों और पर्यटकों से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेने की अपील करते हुए कहा कि यह अवसर न केवल दौड़ने का है, बल्कि बस्तर को करीब से जानने और उसकी विरासत को महसूस करने का भी है। इच्छुक प्रतिभागीhttps://bastarheritage.run/registrationलिंक के माध्यम से या आधिकारिक पोस्टर में दिए गए क्यूआर कोड को स्कैन कर अपना पंजीकरण करा सकते हैं।मुख्यमंत्री ने कहा कि यह आयोजन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘फिट इंडिया’, ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ और देश में पर्यटन को बढ़ावा देने के विजन से प्रेरित है। प्रधानमंत्री ने हमेशा भारत की सांस्कृतिक विविधता और स्थानीय विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने पर जोर दिया है। बस्तर हेरिटेज मैराथन उसी सोच को आगे बढ़ाने का एक प्रयास है, जहां खेल, संस्कृति और प्रकृति एक साथ जुड़ते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार बस्तर को देश के प्रमुख पर्यटन और स्पोर्ट्स डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह के आयोजनों से न केवल युवाओं में फिटनेस के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। बस्तर के कारीगरों, कलाकारों और छोटे-छोटे व्यवसायों को भी इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा।मुख्यमंत्री श्री साय ने देशभर के खिलाड़ियों, फिटनेस प्रेमियों और पर्यटकों से इस ऐतिहासिक आयोजन में भाग लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि वह देश के हर कोने से युवाओं और नागरिकों को आमंत्रित करते हैं कि वे बस्तर आएं, यहां की प्रकृति, संस्कृति और ऊर्जा को महसूस करें और इस ऐतिहासिक मैराथन का हिस्सा बनें।
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-लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे
- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)20 मार्च विश्व गौरैया दिवस पर एक बाल-सजल
रूठी हमसे क्यों गौरैया ।
निशदिन आती नहीं मड़ैया ।।भूख-प्यास से व्याकुल हो क्या ।कब से किया न ता ता थैया ।।दाना लेकर आई हूँ मैं ।पानी लेकर आते भैया ।।मेरी छत पर नीड़ बनाना ।वहाँ आम की शीतल छैया ।।देखो पंखे से बच रहना ।उड़ मत ,आना पैया-पैया ।।मनभावन तुम खेल दिखाना ।पानी में कर छप्पक-छैया ।।बच्चों का मैं ध्यान रखूँगी ।जैसे रखती मेरी मैया ।। - डॉ. नीरज गजेंद्रअक्सर हम अपनी जिंदगी में आए संघर्षों को समस्या मान लेते हैं। जीवन में समस्याओं का आना स्वाभाविक है। लेकिन असली संकट तब पैदा होता है जब हम समस्या के साथ-साथ उसके समाधान से भी दूरी बना लेते हैं। हम समस्या से भागने लगते हैं। उसे टालने लगते हैं। या यह मान लेते हैं कि इसका कोई रास्ता नहीं है। दरअसल यही मानसिकता हमें कमजोर बनाती है।भारतीय दर्शन और धर्मग्रंथों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने जीवन की हर समस्या को एक अवसर के रूप में देखने की दृष्टि दी है। वेद, पुराण और उपनिषद ये पूजा-पाठ के ग्रंथ नहीं हैं, यह हमारे मार्गदर्शक हैं। इनमें बार-बार यह संदेश मिलता है कि समस्या से डरे बिना ही उसके समाधान की दिशा में आगे बढ़ें।सबसे प्रसिद्ध उदाहरण भगवद्गीता का है। जब महाभारत के युद्ध में अर्जुन अपने ही परिजनों और गुरुओं को सामने देखकर विचलित हो गए थे, तब उन्होंने अपने धनुष-बाण नीचे रख दिए। उनके सामने समस्या युद्ध नहीं नैतिक और मानसिक संकट थी। उस समय श्रीकृष्ण ने उन्हें भागने का नहीं, समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया। गीता का मूल संदेश यही है कि जीवन के संघर्षों से भागना समाधान नहीं है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि परिस्थितियां चाहे जितनी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। यह शिक्षा आज के आधुनिक जीवन में भी उतनी ही प्रासंगिक है। जब हम अपने दायित्वों से बचने लगते हैं, तब समस्या और बड़ी हो जाती है।इसी तरह ऋग्वेद में एक अत्यंत महत्वपूर्ण विचार मिलता है चरैवेति चरैवेति, अर्थात निरंतर चलते रहो। यह संदेश भौतिक यात्रा का नहीं, जीवन के संघर्षों में आगे बढ़ने का संकेत है। ऋग्वेद का यह भाव हमें बताता है कि ठहर जाना या हार मान लेना जीवन का मार्ग नहीं है। समस्या आए तो उससे सीखते हुए आगे बढ़ते रहना ही जीवन की सच्ची साधना है।ये कथाएं हमें एक गहरी मनोवैज्ञानिक सच्चाई बताती है। अक्सर समस्या बाहर नहीं हमारे मन के भीतर होती है। हम अपनी शक्ति को भूल जाते हैं और यह मान लेते हैं कि हम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन जैसे ही हमें अपनी क्षमता का विश्वास मिलता है, समस्याएं छोटी लगने लगती हैं।अगर आधुनिक जीवन की बात करें तो आज का मनुष्य तकनीक, सुविधा और संसाधनों के बावजूद मानसिक तनाव से घिरा हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि हम समस्याओं का सामना करने के बजाय उनसे बचने की आदत बना चुके हैं। सोशल मीडिया, मनोरंजन और भागदौड़ भरी जीवनशैली हमें कुछ समय के लिए समस्या से दूर तो कर देती है, लेकिन समाधान नहीं देती।भारतीय आध्यात्मिक परंपरा हमें यह सिखाती है कि समस्या से भागना नहीं चाहिए, भीतर छिपे संदेश को समझना चाहिए। उपनिषद में कहा गया है कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका भय और भ्रम है। जब मनुष्य अपने भीतर के डर को जीत लेता है, तब वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकता है।आज के युवा और समाज के लिए यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगर हम अपने व्यक्तिगत जीवन, समाज और राष्ट्र के स्तर पर देखें तो अधिकांश समस्याओं का समाधान हमारे पास ही मौजूद है। जरूरत सही दृष्टि और साहस की है।आध्यात्म हमें यही सिखाता है कि जीवन में आने वाली हर चुनौती हमें मजबूत बनाने के लिए आती है। आधुनिकता हमें साधन देती है, लेकिन अध्यात्म हमें दिशा देता है। जब ये दोनों एक साथ चलते हैं, तभी जीवन संतुलित और सफल बनता है।इसलिए यह समझना जरूरी है कि समस्या से भागना समाधान नहीं है। असली साहस यह है कि हम उसका सामना करें, उससे सीखें और आगे बढ़ें। भारतीय संस्कृति का सार भी यही है कि जीवन के संघर्षों को स्वीकार कर उन्हें साधना में बदल देना। और शायद यही भारतीय दर्शन का सबसे बड़ा संदेश है समस्या जीवन का अंत नहीं, समाधान की शुरुआत होती है।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)छन्न पकैया छन्न पकैया, हर-हर के दिन आगे।सुन्ना होगे गली चौक मन, घर मा सबो धँधागे।।छन्न पकैया छन्न पकैया,किसम-किसम के भाजी।मन नइ भाय तेलहा-फुलहा, कढ़ी अमटहा खा जी।।छन्न पकैया छन्न पकैया, स्वाद अनोखा घोरे।नूनचरा लाई बरी संग, खाथन बासी बोरे।।छन्न पकैया छन्न पकैया, तरिया नदी सुखावय।चुचुवावत हे खरा पसीना, मुँह घलो चोपियावय।।छन्न पकैया छन्न पकैया, नोहर होगे पानी।चिट-चिट चिट-चिट जरत भोंभरा, तीपत हावय छानी।।
- आलेख- प्रशांत शर्माकुछ समय पहले ओडिशा जाने का मौका मिला। पुरी की यह मेरी पहली यात्रा थी। यहां महाप्रभु जगन्नाथ के अद्भुत दर्शन ने मन को आनंदित कर दिया। काफी समय से इच्छा थी वहां जाने की, पर कोई ना कोर्ई अडंगा आ ही जाता था, कहते हैं ना भगवान का जब तक बुलावा नहीं आए, उनके दर्शन नहीं हो पाते।ओडिशा में वैसे तो बहुत से दर्शनीय और पर्यटन स्थल हैं, लेकिन यदि आपकी इतिहास के पन्नों में झांकने में रुचि है, तो भुवनेश्वर के पास स्थित उदयगिरि और खंडगिरि की दो पहाडिय़ां आपको रोमांचित कर सकती हैं। इन गुफाओं को देखने के बाद इसके बारे में और जानने की जिज्ञासा हो गई। ये गुफाएं ओडीशा क्षेत्र में बौद्ध धर्म और जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाती हैं।इसके इतिहास को जानने की जिज्ञासा ने पुराने रिकार्ड खंगालने पर मजबूर कर दिया। मिले आंकड़ों के अनुसार हाथीगुम्फा शिलालेख में इन गुफाओं का वर्णन कुमारी पर्वत के रूप में आता है। पहले कटक या कट्टाका गुफाओं के नाम से जानी जाने वाली उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं की खोज 19वीं शताब्दी में युवा ब्रिटिश अधिकारी एंड्रयू स्टर्लिंग ने की थी। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इन गुफाओं की गणना कराई और इन वस्तुओं के आधार पर इनके अलग-अलग नाम रखे।ऐसा कहा जाता है कि जैन भिक्षु घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे। बारिश के मौसम में उनके निवास के लिए ही प्राचीन ओडिशा यानी कलिंग के नरेश खारावेला ने (209-170 ईसा पूर्व के बीच) इसका निर्माण कराया था। वे जैन धर्म को मानने वाले थे। इतिहास गवाह है कि अशोक सम्राट ने नरेश खारावेला को युद्ध में हरा दिया था। कलिंग विजय के बाद जब अशोक का शासन हुआ और राजा खारावेला की सभी संपत्तियों पर उनका अधिकार हो गया, तो धीरे-धीरे जैन धर्म के स्थान पर बौद्ध धर्म का प्रभाव बढऩे लगा।ये दोनों गुफाएं लगभग दो सौ मीटर के अंतर पर हैं और एक दूसरे के सामने हैं। उदयगिरि में गुफाओं की संख्या है 18 और खंडगिरि में 15। गुफाओं के निर्माण के दौरान इस बात का ख्याल रखा गया है कि सूर्य की रौशनी प्रत्येक कक्ष के दरवाजे तक पहुंचे और यहां पर उजाला रहे। वहीं चांदनी रात में भी गुफाओं के अंदर तक रौशनी देखी जा सकती है। प्रत्येक गुफा में एक छोटे नहर के माध्यम से जल का स्रोत आता था; प्रत्येक गुफा में संचार के लिए छेद थे, दीपक जलाने के लिए जगह थी और फर्श थोड़ा झुका हुआ था ताकि वह सिरहाने का काम कर सके। इनमें से कई गुफाओं में एक ऊपरी कक्ष था, जहाँ माना जाता है कि भिक्षु गहन ध्यान में लीन होते थे।उदयगिरि गुफाओं की बात करें तो सीढ़ीनुमा पत्थरों पर चलते-चलते 18 गुफाओं के दर्शन हो जाते हैं। सभी गुफाएं एक दूसरे से काफी अलग हैं और सबका अपना अलग महत्व और नाम है। गुफा संख्या 1, रानीगुम्फा यानी रानी की गुफा है जो दो मंजिला है। यह गुफा ध्वनि संतुलन की विशिष्टता के लिए प्रसिद्ध है और समझा जाता है कि इसका प्रयोग मंत्रोच्चार के लिए और नाट्य प्रदर्शनों के लिए किया जाता है। यहां पर रथ पर सवार सूर्य देवता की भी मूर्ति है। नीचे वाली मंजिल के दायें भाग में एक कक्ष है जिसके तीन प्रवेश स्थल हैं और खंभों वाला बरामदा है। प्रवेश स्थल पर दो संतरियों की मूर्तियों सहित इसमें कुछ सुंदर वास्तुकला के दृश्य हैं।केन्द्रीय भाग में चार कक्ष हैं। यहां पर नरेश के विजय अभियान और उनकी यात्रा को दर्शाया गया है। यहां पर रक्षकों के कक्ष हैं जिन्हें पहाड़ी से गिरते झरनें, फलों से लदे वृक्षों, वन्य जीवों, बानरों और कमल-ताल में अठखेलिया करते हाथियों की मूर्तियों से सजाया गया है। ऊपर की मंजिल में छह कक्ष हैं।गुफा संख्या दो बाजाघर गुम्फा कहलाती है, जहां सामने दो विशाल स्तंभ हैं और अंदर एक और स्तंभ है। गुफा संख्या तीन को छोटा हाथी गुम्फा कहते हैं। गुफाएं संख्या पांच, छह, सात और आठ जय-विजय गुम्फा, पनासा गुम्फा, ठकुरानी गुम्फा और पातालपुरी गुम्फा के नाम से प्रसिद्ध है। पांचवीं और सातवीं गुम्फाएं दो मंजिला हैं। इनमें चित्रकारी और पक्षियों आदि के चित्र हैं। गुफा संख्या नौ, मंचापुरी और स्वर्गपुरी गुफाएं हैं, वे भी दो मंजिला हैं । गुफा संख्या दस गणेश गुम्फा है। जम्बेश्वर गुम्फा की संख्या 11 है। गुफा संख्या 12, कम ऊँचाई वाली और दो दरवाजों वाली व्याघ्र गुम्फा है। गुफा संख्या 13 सर्प गुम्फा है, जो बहतु ही छोटी है। अन्य गुफाओं में गुफा संख्या 14- हाथी गुम्फा, गुफा संख्या 15-धनागार गुम्फा, गुफा संख्या 16- हरिदास गुम्फा, गुफा संख्या 17, जगम्मठ गुम्फा और गुफा संख्या 18- रोसई गुम्फा है।वहीं खंडगिरि में गुफा संख्या 1 और 2 को तातोवा गुम्फा कहा जाता है। दोनों गुफाओं के प्रवेश द्वार पर दो द्वारपालों की आकृतियाँ, साथ ही दो शेरों और दो बैलों की आकृतियाँ बनी हुई हैं। गुफा संख्या 3 से 6 को अनंत गुम्फा, तेंतुली गुम्फा, खंडगिरि गुम्फा और ध्यान गुम्फा के नाम से जाना जाता है। गुफा संख्या 7 को नवमुनि गुम्फा कहा जाता है, जिसमें शासन देवियों और जैन धर्म के नौ तीर्थंकरों की अद्भुत मूर्तियां हैं। ऐसा माना जाता है कि ये मूर्तियां 11वीं शताब्दी में कलिंग में सोमवंशी राजवंश के शासनकाल के दौरान बनाई गई थीं। गुफा संख्या 8, जिसकी कोठरियों की दीवारों पर 25 जैन तीर्थंकरों के चित्र अंकित हैं, को भारभुजी गुम्फा कहा जाता है। तृसूला गुम्फा, अम्भिका गुम्फा और ललतेंदु केशरी गुम्फा को क्रमश: 9, 10 और 11 गुफाओं के रूप में क्रमांकित किया गया है। गुफा संख्या 12, 13 और 15 को कोई नाम नहीं दिया गया है।इन गुफाओं के कक्ष तक पहुंचते-पहुंचते और इन्हें करीब से जानते -जानते कब पूरा दिन गुजर गया, पता ही नहीं चला। लेकिन इसे और जानने की उत्सुकता पूरे दिन भर बनी रही। उत्कृष्ट शिल्प कौशल और प्राचीन इतिहास को दर्शाने वाले ब्राह्मी भाषा में अंकित शिलालेखों से परिपूर्ण यह स्थान इतिहास प्रेमियों के लिए एक खजाना है। यदि आप उदयगिरि और खंडगिरि गुफाओं की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो यहां पर्याप्त समय लेकर जाइये। इसके हर कोने का अपना इतिहास है, असीम सुकून और शांति है।
- -लेखिका- डॉ. दीक्षा चौबे- दुर्ग ( वरिष्ठ साहित्यकार और शिक्षाविद)“ सुनो! आज हमारी संस्था महिला दिवस पर कुछ विशिष्ट सफल महिलाओं को सम्मानित करने जा रही है तो आज मुझे देर हो जाएगी, तुम खाना खा लेना “ दिया ने अपने पति अमन से कहा।“ हूँ…जरूर , पर यह बताओ महिला दिवस क्या प्रबुद्ध व विशिष्ट महिलाओं के लिए ही है या सबके लिए? “ अमन ने सफाई करती रमिया और खाना बनाती केतकी की ओर इशारा करते हुए पूछा।“ ओह ! मैंने यह क्यों नहीं सोचा ? दिया ने अपने पर्स से पाँच-पाँच सौ के नोट निकाल कर रमिया, केतकी को देते हुए कहा –” आप दोनों शाम को अपने परिवार के साथ कुछ खा लेना और हाँ शाम की छुट्टी ..महिला दिवस की शुभकामनाएं ।” दोनों के खिले चेहरे देखकर दिया को महिला दिवस की सार्थकता अब महसूस हुई।
- आलेख- अन्नपूर्णा देवी, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रीअंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हुए, हम न सिर्फ भारत की महिलाओं की उपलब्धियों, बल्कि उनकी दृढ़ता, पालन-पोषणकारी, दृढ़ निश्चयी और परिवर्तनकारी अदम्य भावनाओं का भी सम्मान करते हैं। महिला दिवस महज कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं है, बल्कि यह इस बात की पुष्टि है कि भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका परिधि में नहीं, बल्कि केंद्र में रही है। हमारी महिलाएँ केवल संस्थानों और बोर्डरूम तक सीमित नहीं हैं; वे आंगनों, खेतों, प्रयोगशालाओं, कक्षाओं, सुरक्षा बलों और प्रशासनिक तंत्र में नेतृत्व का एक नया अध्याय रच रही हैं।उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के क्षेत्रों में वे नई पहचान गढ़ रही हैं। रक्षा सेवाओं में महिला अधिकारी विशिष्ट सेवाएँ दे रही हैं-लड़ाकू विमान उड़ाने से लेकर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रशिक्षण प्राप्त करने तक, वे नए क्षितिज का विस्तार कर रही हैं।समूचे ग्रामीण भारत में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी करोड़ों महिलाएँ स्थानीय अर्थव्यवस्था को सशक्त बना रही हैं। वे आर्थिक स्वतन्त्रता की नींव पर सामूहिक समृद्धि का सृजन कर रही हैं। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वैश्विक स्तर पर नए मानक स्थापित कर रहा है। यह साबित करता है कि जमीनी स्तर का नेतृत्व समावेशी और प्रभावशाली, दोनों ही है। वैश्विक खेल मंच पर, उत्कृष्टता और दृढ़ता का प्रदर्शन करते हुए भारतीय महिलाएँ लगातार देश को गौरवान्वित कर रही हैं।इतिहास साक्षी है कि भारतीय नारी का सामर्थ्य कोई नई बात नहीं है। रानी लक्ष्मीबाई ने निडर होकर अपने देश की रक्षा की। सावित्रीबाई फुले ने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती देकर बेटियों की शिक्षा में अग्रणी भूमिका निभाई। देवी अहिल्याबाई होलकर ने बुद्धिमत्ता एवं करुणा से जन कल्याण को शासन के केन्द्र में रखा। नीतिगत सुधार और दृढ़ संकल्प की उनकी विरासत आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है।आज, यह अमिट विरासत सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने के निरंतर प्रयासों में परिलक्षित होती है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में, महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि विकास की अग्रदूत के रूप में मान्यता दी गई है। “महिला-नेतृत्व वाला विकास” आज एक सशक्त नीतिगत-दृष्टि है, जो बजट, कार्यक्रमों और संस्थागत सुधारों में परिलक्षित होती है। महिला दिवस हमें याद दिलाता है कि उत्सव को बदलाव के रूप में साकार करना होगा। प्रत्येक महिला- चाहे वह किसी निगम का नेतृत्व करती हो, वर्दी में सेवा करती हो, खेत में पसीना बहाती हो, छोटा उद्यम चलाती हो या घर पर अपने परिवार का भरण-पोषण करती हो, मोदी सरकार उसका अभिनंदन करती है।हमारी प्राचीन सभ्यतागत परंपरा में नारी शक्ति का सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, यह हमारे अस्तित्व का मूल आधार है। वह परंपरा की धरोहर को सहेजती है और बदलाव की बयार को नेतृत्व देती है। उसके व्यक्तित्व में करुणा का सागर भी है और साहस का अडिग शिखर भी; वह जहाँ एक ओर नैतिक मूल्यों की मर्यादा में बंधी है, वहीं दूसरी ओर अपने सपनों को उड़ान देने के लिए उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी है। बहुआयामी भूमिकाओं को एक साथ साधने का उसका कौशल सदियों से भारतीय नारी की जीवन-शैली का अभिन्न हिस्सा रहा है। वह अपनी जिम्मेदारियों को सहज भाव से ओढ़ती है, धैर्य के साथ परिवार की नींव को सींचती है और अपने 'शांत नेतृत्व' से समाज को एक नई दिशा और शक्ति प्रदान करती है।समाज की हर दृश्यमान उपलब्धि के पीछे एक आधारशक्ति अनवरत कार्य करती है-'देखभाल की अर्थव्यवस्था' (Care Economy)। यह वह मौन ऊर्जा है जो भारत के अस्तित्व को हर पल संबल प्रदान करती है। यह उस माँ का समर्पण है, जो सूर्योदय से पूर्व अपनों के लिए चूल्हा सुलगाती है और फिर जीविका की चुनौतियों की ओर निकल पड़ती है। यह उस पत्नी की अटूट निष्ठा है, जो कठिन से कठिन समय में भी परिवार की नींव को दरकने नहीं देती। यह उस बेटी का निःस्वार्थ भाव है, जो दिनभर की थकान के बाद भी रात के पहर अपने वृद्ध माता-पिता के सिरहाने बैठती है। यह शक्ति किसी यश या प्रशंसा की आकांक्षी नहीं है; वह तो बस कर्तव्य की उस अविरल धारा की तरह है, जो बिना शोर मचाए सृजन करती रहती है।ऐतिहासिक रूप से, महिलाओं के योगदान का एक विशाल हिस्सा- विशेषकर अवैतनिक देखभाल (Unpaid Care), अनौपचारिक श्रम और सामुदायिक सेवा- पारंपरिक आर्थिक गणनाओं की परिधि से बाहर रहा है। किंतु इस हकीकत को पहचानते हुए,मोदी सरकार ने हमेशा देखभाल के इस ‘अदृश्य पहलू' को कम करने, उसे सामाजिक मान्यता देने और उसके न्यायसंगत पुनर्वितरण पर बल दिया है। सरकार का दृष्टिकोण देखभाल से जुड़ी सेवाओं को पेशेवर स्वरूप प्रदान कर उन्हें समावेशी विकास के एक नए 'इंजन' के रूप में रूपांतरित करना है।भारत में महिला श्रम शक्ति सहभागिता दर (FLFPR) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़ा भारतीय महिलाओं की बढ़ती आकांक्षाओं और आर्थिक गतिविधियों में उनके बढ़ते प्रभुत्व का सूचक है। सवैतनिक कार्यों में महिलाओं की यह भागीदारी न केवल घरेलू समृद्धि का आधार बनती है, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाती है।आर्थिक सर्वेक्षण इस वास्तविकता को रेखांकित करता है कि यदि हम 'अवैतनिक देखभाल' के बोझ को कम कर सकें और इन सेवाओं को एक व्यावसायिक स्वरूप प्रदान करें, तो महिला रोजगार के परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। भारतीय 'केयर इकोनॉमी' वर्तमान में ही लाखों लोगों की आजीविका का संबल है, और आने वाले दशक में इसमें रोजगार सृजन की अपार संभावनाएँ हैं।यही कारण है कि केंद्रीय बजट 2026-27 में 'केयर इकोनॉमी' को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया गया है। 'महिलाओं के नेतृत्व में विकास' (Women-led Development) के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता ऐतिहासिक 'जेंडर बजट' में स्पष्ट झलकती है, जिसका आवंटन अब तक के उच्चतम स्तर-5 लाख करोड़ रुपये से अधिक पर पहुँच गया है। सरकार के समग्र दृष्टिकोण के अंतर्गत, हम 1.5 लाख देखभालकर्ताओं के कौशल विकास में निवेश कर रहे हैं, कामकाजी महिला छात्रावासों का विस्तार कर रहे हैं और आंगनवाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाकर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल सुनिश्चित कर रहे हैं। साथ ही, स्वास्थ्य एवं पोषण प्रणालियों के समन्वय को भी सशक्त किया जा रहा है। ये सभी प्रयास एक स्पष्ट राजनीतिक और नैतिक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं- जब महिलाओं को आवश्यक सहयोग और मंच मिलता है, तो संपूर्ण अर्थव्यवस्था की गति तीव्र हो जाती है।सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थिति संहिता जैसे वैधानिक ढांचे शिशु देखभाल केंद्रों और श्रमिक कल्याण के प्रावधानों को सुदृढ़ करते हैं। ये सुधार एक गहरे सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं- शिशु देखभाल सहायता कोई गौण विकल्प या सुविधा मात्र नहीं, बल्कि यह आर्थिक न्याय का एक अनिवार्य संरचनात्मक आधार है।हमारी सरकार महिलाओं और बच्चों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के केन्द्र में रखती है, जो देश की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। अतः उनका सर्वांगीण कल्याण एक अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता है। वर्ष 2050 तक वरिष्ठ नागरिकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। इससे परिवार के भीतर भी देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियाँ बढ़ेंगी। साथ ही, करोड़ों बच्चों को उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक वर्षों के दौरान- जब सीखने की क्षमता और भविष्य की उत्पादकता की नींव रखी जाती है- व्यवस्थित प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, सुदृढ़ पोषण और स्वास्थ्य सहायता की नितांत आवश्यकता होगी।तेजी से होते शहरीकरण, प्रवासन और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने हमारी पारंपरिक सामाजिक सहायता प्रणालियों को बुनियादी रूप से बदल दिया है। अनौपचारिक ढांचों पर बढ़ते दबाव के कारण अब सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण शिशु देखभाल व पारिवारिक सेवाओं की आवश्यकता अनिवार्य होती जा रही है। संगठित और सामुदायिक सेवाओं की यह मांग केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों (Tier-2 & 3 Cities) और ग्रामीण जनपदों में भी तीव्रता से उभरेगी।देखभाल की अर्थव्यवस्था में निवेश एक साथ कई राष्ट्रीय लक्ष्यों को मजबूत करता है। इससे महिला श्रमशक्ति की भागीदारी बढ़ती है, बाल विकास के परिणाम सुधरते हैं, बुजुर्गों का कल्याण सुनिश्चित होता है और गरिमापूर्ण रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं। देखभाल प्रणालियों के संस्थागत और पेशेवर होने से महिलाएँ सशक्त होती हैं, परिवारों को स्थिरता मिलती है और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को गति प्राप्त होती है।जैसे-जैसे भारत 'अमृतकाल' से 'विकसित भारत @2047' की ओर बढ़ रहा है, हम इस परिवर्तनकारी सत्य को स्वीकार कर रहे हैं कि सामाजिक बुनियाद को सुदृढ़ किए बिना विकास को टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता-और केयर इकॉनमी ही वह अनिवार्य आधार है।इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर, हम देखभाल के अदृश्य श्रम को सम्मान देने और उसे संस्थागत रूप से सशक्त करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं। 'महिलाओं के नेतृत्व वाले विकसित भारत' का हमारा दृष्टिकोण केवल बोर्डरूम एवं संस्थानों में महिलाओं की भागीदारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सशक्त देखभाल प्रणालियों पर आधारित है, जो महिलाओं के विकल्पों, गरिमा और आर्थिक सामर्थ्य का विस्तार करती हैं।
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विशेष लेख : ‘डॉ. दानेश्वरी संभाकर उप संचालक, जनसंपर्क विभाग
रायपुर । मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ आज महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है। मातृशक्ति के सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए राज्य सरकार ने इस वर्ष को ‘महतारी गौरव वर्ष’ के रूप में मनाने की घोषणा की है। यह पहल केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं है, बल्कि महिलाओं को राज्य की विकास यात्रा के केंद्र में स्थापित करने का सशक्त संकल्प है।विश्वास से निर्माण और अब गौरव की ओरमुख्यमंत्री श्री साय ने अपने कार्यकाल के पहले वर्ष को ‘विश्वास वर्ष’ के रूप में शासन-प्रशासन और जनता के बीच भरोसे की पुनर्स्थापना को समर्पित किया। इसके बाद दूसरे वर्ष को भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में ‘अटल निर्माण वर्ष’ के रूप में मनाते हुए अधोसंरचना विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं को नई गति दी गई। अब तीसरा वर्ष ‘महतारी गौरव वर्ष’ के रूप में माताओं और बहनों को समर्पित किया गया है, जिसमें राज्य की अधिकांश योजनाओं का केंद्रबिंदु महिलाएं होंगी। यह क्रम सरकार की संवेदनशील और समावेशी विकास की सोच को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।महतारी वंदन योजना : आत्मसम्मान और आर्थिक सुरक्षा का आधारछत्तीसगढ़ सरकार की महतारी वंदन योजना आज महिला सशक्तिकरण का मजबूत स्तंभ बन चुकी है। इस योजना के तहत प्रदेश की लगभग 70 लाख विवाहित महिलाओं को प्रतिमाह 1,000 रुपये की सहायता सीधे उनके बैंक खातों में प्रदान की जा रही है। अब तक 15 हजार 595 करोड़ रुपये से अधिक की राशि डीबीटी के माध्यम से महिलाओं को दी जा चुकी है। हाल ही में 24वीं किस्त के रूप में 68 लाख से अधिक महिलाओं को 641 करोड़ रुपये की राशि प्रदान की गई।यह नियमित आर्थिक सहयोग महिलाओं के आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ ही उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बना रहा है। कई महिलाएं इस राशि को केवल घरेलू खर्च तक सीमित न रखकर स्वरोजगार और छोटे व्यवसायों में निवेश कर रही हैं।संघर्ष से स्वावलंबन तक : रोहनी पटेल की प्रेरक कहानीबालोद जिले के ग्राम खैरडीह की श्रीमती रोहनी पटेल इसका एक प्रेरणादायक उदाहरण हैं। पति की असमय मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई थी। घर में वृद्ध सास की देखभाल और कॉलेज में पढ़ रहे दो बच्चों की पढ़ाई की चिंता उनके लिए बड़ी चुनौती थी।ऐसे कठिन समय में महतारी वंदन योजना उनके लिए उम्मीद की किरण बनकर आई। योजना से मिलने वाली राशि को उन्होंने सावधानीपूर्वक बचत कर अपने खेत में सब्जी उत्पादन का कार्य शुरू किया। बीज, खाद और कृषि सामग्री की व्यवस्था कर उन्होंने पूरी मेहनत से खेती की।आज श्रीमती रोहनी पटेल अपने खेत में उगाई गई ताजी सब्जियों को स्थानीय बाजारों में बेचकर नियमित आय अर्जित कर रही हैं। इस आय से वे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर रही हैं और बच्चों की पढ़ाई भी निर्बाध रूप से जारी है। उनका यह प्रयास गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुका है।बिहान से बदली जिंदगी : ‘लखपति दीदी’ बनीं श्रीमती माहेश्वरी यादवबलौदाबाजार-भाटापारा जिले के ग्राम कोरदा की श्रीमती माहेश्वरी यादव भी महिला सशक्तिकरण की एक प्रेरक मिसाल हैं। पहले उनका जीवन सामान्य गृहिणी की तरह घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित था। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया।समूह के सहयोग और परिवार के समर्थन से उन्होंने गांव में एक छोटी किराना दुकान शुरू की। अपनी मेहनत और बेहतर प्रबंधन के बल पर यह दुकान धीरे-धीरे गांव में भरोसेमंद केंद्र बन गई। आज इस दुकान से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग 1 से 1.5 लाख रुपये की आय हो रही है और वे ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं। इससे उनके बच्चों की शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।आधुनिक तकनीक से नई पहचान : ‘ड्रोन दीदी’ सुश्री सीमा वर्माबिलासपुर जिले के मस्तूरी क्षेत्र की सुश्री सीमा वर्मा ने भी यह साबित किया है कि अवसर और प्रशिक्षण मिलने पर महिलाएं आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में भी नई पहचान बना सकती हैं।स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने पहले मशरूम उत्पादन का कार्य शुरू किया और बाद में ड्रोन संचालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। शासन की सहायता से उन्हें ड्रोन सेट, जनरेटर और ई-वाहन उपलब्ध कराया गया।आज सीमा वर्मा किसानों के खेतों में ड्रोन के माध्यम से कीटनाशक छिड़काव कर रही हैं और इस कार्य से उन्हें सम्मानजनक आय प्राप्त हो रही है। गांव में लोग उन्हें स्नेहपूर्वक ‘ड्रोन दीदी’ के नाम से जानते हैं।बजट में महिला कल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकताराज्य सरकार ने महिला एवं बाल विकास विभाग के लिए 8 हजार 245 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है।आंगनबाड़ी एवं पोषण योजनाओं के लिए 2 हजार 320 करोड़ रुपये, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के लिए 120 करोड़ रुपये, मिशन वात्सल्य के लिए 80 करोड़ रुपये तथा रानी दुर्गावती योजना के लिए 15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।इसके अतिरिक्त 750 नए आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्माण के लिए 42 करोड़ रुपये और 250 महतारी सदनों के निर्माण के लिए 75 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। यह बजटीय प्रावधान महिलाओं और बच्चों के समग्र विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमा की सुदृढ़ व्यवस्थामहिला सुरक्षा के क्षेत्र में भी राज्य ने प्रभावी तंत्र विकसित किया है। वन स्टॉप सेंटर, 181 महिला हेल्पलाइन और डायल 112 के माध्यम से संकट की स्थिति में त्वरित सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। सुखद सहारा योजना के अंतर्गत 2 लाख 18 हजार से अधिक विधवा एवं परित्यक्ता महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की जा रही है।स्वावलंबन से नेतृत्व तकप्रदेश में 42 हजार से अधिक महिला स्व-सहायता समूहों को रियायती ऋण प्रदान कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाया गया है। रेडी-टू-ईट कार्य महिला समूहों को सौंपे जाने से उन्हें स्थायी आय का स्रोत मिला है। इसके साथ ही डिजिटल सखी, दीदी ई-रिक्शा, सिलाई मशीन सहायता, मिनीमाता महतारी जतन योजना और लखपति दीदी जैसी पहलें महिलाओं को नए आजीविका अवसर प्रदान कर रही हैं।महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े के अनुसार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उन्हें सुरक्षित तथा सम्मानजनक वातावरण प्रदान करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।विकसित छत्तीसगढ़ की सशक्त आधारशिलामुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप ‘छत्तीसगढ़ अंजोर विजन 2047’ के माध्यम से राज्य को समावेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को अनिवार्य तत्व माना गया है।‘महतारी गौरव वर्ष’ केवल एक प्रशासनिक पहल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का व्यापक अभियान है। यह वर्ष छत्तीसगढ़ में मातृशक्ति के सम्मान, आत्मविश्वास और नेतृत्व को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प लेकर आया है। आज प्रदेश की महिलाएं आत्मनिर्भरता, नवाचार और नेतृत्व के साथ विकास की नई कहानी लिख रही हैं। यही सशक्त मातृशक्ति विकसित और समृद्ध छत्तीसगढ़ की सबसे मजबूत आधारशिला बनेगी। - -प्रशांत शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)बॉलीवुड में पहले होली पर खूब गाने बना करते थे। आजकल ये ट्रेंड कम होता जा रहा है। आज यदि होली पर गाने बनते भी हैेंं तो यादगार नहीं रह पाते। पुराने होली गानों में एक गाना- अरे जा रे हट नटखट ..... आज भी खूब बजता है। यकीन मानिये 67 साल पहले इसे रिलीज किया गया था और आज भी इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है।साल 1959 में निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम ने एक फिल्म बनाई थी 'नवरंग' , जिसमें कथानक के अनुसार काफी गाने शामिल किए गए थे। उन्हीं में से एक गाना था- अरे जा रे हट नटखट....। यह सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि पर्दे पर रची गई एक ऐसी कलाकारी है जिसे आज के दौर की तकनीक और बड़े बजट वाली फिल्में भी मात नहीं दे सकतीं हैं। सी. रामचंद्र के संगीत निर्देशन में तैयार इस गाने में आशा भोंसले और महेंद्र कपूर ने अपनी आवाजें दीं। फिल्म की नायिका संध्या , जो वी. शांताराम की पत्नी थीं , ने गाने में नायक और नायिका , दोनों का किरदार निभाया और ऐसे मदमस्त होकर क्लासिकल डांस किया कि लोग बस देखते ही रह गए। गाने में संध्या ने एक पल में राधा का नखरा दिखाया और अगले ही पल कृष्ण की नटखट लीला भी दिखा दी।निर्देशक शांताराम चाहते थे कि संध्या एक असली हाथी की चाल और उसकी थाप के साथ तालमेल बिठाकर डांस करें। यह काफी जोखिम भरा था। पर एक्ट्रेस संध्या शांताराम ने इसका भी तोड़ निकाल लिया। उन्होंने इस गाने की शूटिंग से पहले कई हफ्तों तक उस हाथी के साथ वक्त बिताया। वे खुद उसे खाना खिलातीं, पानी पिलातीं और घंटों उससे बातें करतीं। जब हाथी उन्हें अपना दोस्त समझने लगा और उनके इशारों को पहचानने लगा, तब जाकर कैमरे के सामने उसे लाया और इस तरह से एक कालजयी गाना बन गया।अरे जा रे हट नटखट" मुख्य रूप से राग भैरवी पर आधारित है, जिसमें कोमल स्वरों (रे, ग, ध, नी) का प्रयोग किया गया है। संगीतकार सी. रामचंद्र द्वारा रचित इस गीत में शास्त्रीय रागदारी के साथ-साथ गुजराती लोक संगीत और लोक धुनों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। गाने की शुरुआत में जो बोल हैं - अटक-अटक झटपट पनघट पर....संगीतकार सी. .रामचंद्र ने खुद गाया था। उन्होंने चितलकर के नाम से हिन्दी फिल्मों में काफी गाने गाए हैं।






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