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मुंबई. रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची महंगाई के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने 2025 में छह मौद्रिक नीति समीक्षाओं में चार में अपनी प्रमुख नीतिगत दरों में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसे अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘दुर्लभ रूप से संतुलित आर्थिक दौर' करार दिया। मल्होत्रा ने फरवरी में अपने पहले नीति बयान से ही वृद्धि को समर्थन देने के लिए दरों में कटौती की शुरुआत की थी। इसके बाद जून में भी उन्होंने 0.50 प्रतिशत की बड़ी कटौती की, क्योंकि कम महंगाई से नीति में ढील देने की गुंजाइश बनी। नौकरशाह से केंद्रीय बैंक के गवर्नर बने मल्होत्रा ने पद संभालने के एक वर्ष पूरे होने पर मौजूदा स्थिति को भारत के लिए ‘दुर्लभ रूप से संतुलित आर्थिक दौर' करार दिया, जिसमें अमेरिका के शुल्क और भू-राजनीतिक बदलाव जैसे प्रतिकूल कारकों के बावजूद वृद्धि दर आठ प्रतिशत से ऊपर रही और महंगाई एक प्रतिशत से नीचे रही। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आगे चलकर वृद्धि की रफ्तार कुछ नरम पड़ेगी और महंगाई बढ़कर आरबीआई के चार प्रतिशत के लक्ष्य के करीब पहुंचेगी। चालू कीमतों पर जीडीपी वृद्धि कम रहने को लेकर चिंताओं के बीच मल्होत्रा ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के कदम वास्तविक जीडीपी के आधार पर तय होते हैं, जो महंगाई घटाने के बाद सामने आती है। वास्तविक महंगाई के आंकड़े आरबीआई के अनुमानों से काफी कम रहे, जिससे केंद्रीय बैंक की पूर्वानुमान क्षमता को लेकर कुछ सवाल उठे। इस पर डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि आकलन में किसी तरह का प्रणालीगत पक्षपात नहीं है। दर कटौती और उधारी लागत में गिरावट की स्पष्ट अपेक्षाओं के चलते आरबीआई के कदम से बैंकों को झटका लगा। शुद्ध ब्याज मार्जिन (एनआईएम) में कमी और मुख्य आय में गिरावट से बैंक प्रभावित हुए। हालांकि, अर्थव्यवस्था में पर्याप्त नकदी सुनिश्चित करने और खास तौर पर नियामकीय ढील जैसे कदमों ने असर को कुछ हद तक कम किया। पूरे साल नियामकीय ढील के लिए कई उपाए किए गए। अक्टूबर की मौद्रिक नीति घोषणा इसका चरम रही, जिसमें 22 नियामकीय उपाय शामिल थे, जिनमें कुछ उपाए आमतौर पर सतर्क माने जाने वाले आरबीआई जैसे संस्थान के लिए असामान्य थीं। इनमें बैंकों को भारतीय कंपनियों द्वारा वैश्विक अधिग्रहणों के लिए वित्तपोषण की अनुमति देना शामिल है। मल्होत्रा का जोर ग्राहकों के प्रति संवेदनशीलता और शिकायतों का तेजी से समाधान करने पर रहा है, जो उनके कई भाषणों और टिप्पणियों में झलकता है। आरबीआई ने 2025 में अपने 90 वर्ष पूरे किए और इस साल उसके लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रुपया का डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर से नीचे फिसलना रहा। केंद्रीय बैंक का कहना है कि उसका बाजार में हस्तक्षेप किसी स्तर को बचाने के लिए नहीं, बल्कि उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए होता है। इसके बावजूद घरेलू मुद्रा के कमजोर होने के बीच आरबीआई ने वर्ष के पहले नौ महीनों में 38 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार बेचा। विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये का प्रबंधन आगे भी केंद्रीय बैंक के लिए चुनौतीपूर्ण बना रहेगा।
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नयी दिल्ली. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने रिलायंस एआई घोषणा पत्र का मसौदा पेश किया। इसमें समूह को कृत्रिम मेधा आधारित उन्नत प्रौद्योगिकी उद्यम बनाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई गई है। साथ ही छह लाख से अधिक कर्मचारियों की उत्पादकता में दस गुना सुधार करने तथा भारत की अर्थव्यवस्था पर 10 गुना प्रभाव डालने का लक्ष्य रखा गया है। कृत्रिम मेधा (एआई) को मानव इतिहास का सबसे प्रभावशाली तकनीकी विकास बताते हुए अंबानी ने कहा कि तेल से लेकर खुदरा और दूरसंचार तक फैला यह समूह भारत की एआई क्रांति का नेतृत्व करना चाहता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने देश के डिजिटल रूपांतरण का नेतृत्व किया था। समूह का घोषित संकल्प 'हर भारतीय के लिए आसानी से एआई' उपलब्ध कराना है, जिसमें सुरक्षा, भरोसा और जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए सभी व्यवसायों में एआई को गहराई से समाहित किया जाएगा। उन्होंने कहा, ''रिलायंस में हमने खुद को कृत्रिम मेधा आधारित उन्नत प्रौद्योगिकी कंपनी में बदलने की राह पर कदम बढ़ाया है। इस संकल्प को आगे बढ़ाने के लिए हमने रिलायंस एआई घोषण पत्र का मसौदा तैयार किया है। यह मसौदा कार्ययोजना का मार्गदर्शक है।'' घोषणा पत्र का भाग-एक आंतरिक रूपांतरण पर केंद्रित है, जिसमें एआई को किसी तकनीकी परियोजना के बजाय काम करने के नए तरीके के रूप में देखा गया है। रिलायंस परिणामों और 'एंड-टू-एंड' कार्य प्रवाह के इर्द-गिर्द संचालन को पुनर्गठित करने की योजना बना रही है, जिसे साझा डिजिटल मंच और मजबूत प्रशासन का समर्थन मिलेगा। एआई और एजेंटिक ऑटोमेशन का उपयोग दोहराए जाने वाले काम को खत्म करने, निर्णय प्रक्रिया को बेहतर बनाने तथा गुणवत्ता और गति बढ़ाने में किया जाएगा। इसके साथ ही स्पष्ट मानवीय जवाबदेही बनी रहेगी। भाग-दो में इस नजरिये को भारत के व्यापक एआई रूपांतरण तक आगे बढ़ाया गया है। अंबानी ने कहा, ''मेरा मानना है कि जैसे हम एआई के जरिए अपने कार्यप्रवाह की गति, दक्षता, गुणवत्ता और परिणामों में 10 गुना सुधार ला सकते हैं, वैसे ही अपने व्यवसायों और परोपकारी पहलों के माध्यम से भारत पर भी 10 गुना प्रभाव डाल सकते हैं।'' उन्होंने कर्मचारियों से रिलायंस के विभिन्न व्यवसायों - जियो के 50 करोड़ से अधिक उपभोक्ता आधार और देश के सबसे बड़े खुदरा नेटवर्क से लेकर ऊर्जा, सामग्री, जीवन विज्ञान, वित्तीय सेवाएं, मीडिया और परोपकार - में एआई के उपयोग पर सुझाव देने को कहा। उन्होंने स्वदेशी एआई हार्डवेयर, रोबोटिक्स और क्रॉस-डोमेन अनुप्रयोगों में अवसरों की ओर इशारा किया, ताकि दक्षता, स्थिरता और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिल सके। दस्तावेज को नारे के बजाय कार्य-मार्गदर्शक बताते हुए अंबानी ने सभी कर्मचारियों से 10 से 26 जनवरी के बीच सुझाव देने को कहा। उन्होंने कहा कि यह घोषणा पत्र 'नया रिलायंस और नया भारत' बनाने की साझा प्रतिबद्धता बनेगा।
- मुंबई. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोमवार को कहा कि वह वित्तीय उत्पादों एवं सेवाओं की गलत बिक्री रोकने के लिए वित्तीय संस्थानों पर लागू होने वाले विज्ञापन, विपणन और बिक्री से संबंधित व्यापक नियम जारी करेगा। केंद्रीय बैंक की तरफ से जारी 'भारत में बैंकिंग के रुझान और प्रगति 2024-25 रिपोर्ट' में यह बात कही गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई ने कहा कि गलत वित्तीय उत्पादों की बिक्री के मामले ग्राहकों और पूरे वित्तीय क्षेत्र दोनों के लिए गंभीर परिणाम होते हैं। आरबीआई ने यह भी कहा कि वह ऋण की वसूली करने वाले एजेंटों और वसूली से जुड़े संचालन संबंधी मौजूदा निर्देशों की समीक्षा कर रहा है और उन्हें एकीकृत रूप में जारी करने का प्रस्ताव है। डिजिटल एवं साइबर धोखाधड़ी के मामलों से निपटने के लिए रिजर्व बैंक संबंधित मंत्रालयों और अन्य हितधारकों के साथ काम कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, विनियमित संस्थाओं को मजबूत आंतरिक नियंत्रण, सभी स्तरों पर शिकायत निवारण अधिकारी तैनात होने और डिजिटल वित्तीय साक्षरता बढ़ाने की दिशा में काम करने की जरूरत है। रिजर्व बैंक ने हाल में दो प्रमुख डिजिटल पहल शुरू की हैं। संभावित फर्जी खातों की पहचान और प्रणालीगत सीख के लिए म्यूलहंटर.एआई को 23 बैंकों में लागू किया गया है। इसके अलावा एआई-आधारित मंच 'डिजिटल भुगतान आसूचना मंच (डीपीआईपी)' भी काम कर रहा है जो जोखिमपूर्ण लेनदेन को चिन्हित कर फर्जीवाड़े की रोकथाम में मदद करता है। आरबीआई ने यह भी कहा कि अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन में ग्राहक की सीमित जिम्मेदारी संबंधी 2017 के निर्देशों की समीक्षा की जा रही है। यह कदम नए भुगतान चैनलों, डिजिटल लेनदेन की बढ़ती मात्रा और बदलते धोखाधड़ी प्रतिरूप को ध्यान में रखते हुए ग्राहक सुरक्षा को मजबूत करेगा। रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2024-25 के आंकड़े भी साझा किए गए हैं। इसके मुताबिक, रिपोर्ट किए गए धोखाधड़ी मामलों की कुल संख्या घट गई, लेकिन इसमें शामिल राशि बढ़ गई। आरबीआई ने कहा, "इसका मुख्य कारण 122 मामलों की दोबारा जांच होनी थी जिनमें कुल 18,336 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी शामिल थी। उच्चतम न्यायालय के मार्च 2023 के निर्णय का अनुपालन सुनिश्चित किया गया।" विवरण के मुताबिक, कार्ड और इंटरनेट धोखाधड़ी की घटनाएं कुल मामलों का 66.8 प्रतिशत रहीं, जबकि राशि के हिसाब से ऋण से जुड़ी धोखाधड़ी 33.1 प्रतिशत रही। निजी क्षेत्र के बैंकों की कुल मामलों में 59.3 प्रतिशत हिस्सेदारी रही जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने धोखाधड़ी राशि में 70.7 प्रतिशत योगदान दिया। आरबीआई ने कहा कि इसकी नियामकीय एवं पर्यवेक्षण नीतियां आगे भी साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम, ग्राहक सुरक्षा, जलवायु जोखिम जागरूकता और वित्तीय स्थिरता पर केंद्रित रहेंगी।
- नई दिल्ली। काफी समय बाद भारतीय रेलवे से जुड़े शेयरों में एक बार फिर मजबूती देखने को मिली है। पिछले पांच कारोबारी सत्रों के दौरान रेलवे सेक्टर के शेयरों में तेज बढ़त दर्ज की गई, जिससे इस सेक्टर से जुड़ी आगामी केंद्रीय बजट से पहले निवेशक रेलवे सेक्टर में दोबारा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इसके साथ ही कंपनियों की कमाई को लेकर संकेत भी बेहतर नजर आ रहे हैं, जिससे शेयरों में खरीदारी बढ़ी है। गौरतलब है कि वर्ष 2025 के दौरान रेलवे शेयर लंबे समय तक दबाव में रहे। जुलाई 2024 में सेक्टर के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद शेयरों में गिरावट आई थी। उस समय ऊंचे वैल्यूएशन और सरकारी समर्थन को लेकर कमजोर उम्मीदों के चलते कई शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई थी।हालिया तेजी से यह संकेत मिलता है कि निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे लौट रहा है। इसके पीछे यात्री किराए में बढ़ोतरी, बजट से जुड़ी सकारात्मक उम्मीदें और कुछ कंपनियों से संबंधित बेहतर खबरें प्रमुख वजह मानी जा रही हैं। इस तेजी में ज्यूपिटर वैगन्स के शेयर सबसे आगे रहे, जिनमें महज पांच कारोबारी सत्रों में करीब 37% की बढ़त दर्ज की गई। रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) के शेयरों में लगभग 27% और इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन (आईआरएफसी) के शेयरों में 20% से अधिक की तेजी देखने को मिली।इसके अलावा इरकॉन इंटरनेशनल, टीटागढ़ रेल सिस्टम्स, रेलटेल कॉर्पोरेशन, टेक्समैको रेल एंड इंजीनियरिंग, राइट्स और बीईएमएल जैसी रेलवे से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में भी अच्छी बढ़त दर्ज की गई। हालांकि, इस उछाल के बावजूद अधिकांश रेलवे स्टॉक अपने पुराने उच्च स्तर से अब भी नीचे बने हुए हैं।रेलवे शेयरों में आई इस तेजी के पीछे एक अहम कारण भारतीय रेलवे द्वारा 26 दिसंबर से यात्री किराए में की गई बढ़ोतरी भी है। वित्त वर्ष 2026 के दौरान यह दूसरी बार है, जब यात्री किराए में संशोधन किया गया है। लंबी दूरी की यात्रा में सामान्य, मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के किराए में प्रति किलोमीटर 1 से 2 पैसे की वृद्धि की गई है, जबकि लोकल और उपनगरीय ट्रेनों के किराए में कोई बदलाव नहीं किया गया है।इस किराया वृद्धि से भारतीय रेलवे को चालू वित्त वर्ष में करीब 600 करोड़ रुपए की अतिरिक्त आमदनी होने की उम्मीद है। वर्तमान में यात्री ट्रेन सेवाएं घाटे में चल रही हैं, क्योंकि किराया लागत से करीब 45% कम है। इस घाटे की भरपाई माल ढुलाई से होने वाली आय से की जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किराए में यह बदलाव रेलवे की आय बढ़ाने, घाटे को कम करने और वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में सहायक साबित होगा।
- नई दिल्ली। भारत ने 2025 में (नवंबर तक) अब तक सबसे अधिक 44.51 गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी है, जो कि पिछले साल की समान अवधि में जोड़ी गई 24.72 गीगावाट की क्षमता से काफी अधिक है। यह जानकारी केंद्र सरकार की ओर से सोमवार को दी गई।केंद्र सरकार ने कहा कि देश में स्थापित कुल रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता नवंबर 2025 में 253.96 गीगावाट थी, जो कि पिछले साल नवंबर 2024 में स्थापित 205.52 गीगावाट क्षमता के मुकाबले करीब 23 प्रतिशत ज्यादा है। देश ने समीक्षा अवधि में 34.98 गीगावाट रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता जोड़ी है। यह आंकड़ा पिछले साल की समान अवधि में 20.85 गीगावाट था।नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने कहा कि देश में जनवरी 2025 में स्थापित सोलर एनर्जी क्षमता के आंकड़े ने 100 गीगावाट का आंकड़ा पार किया था। नवंबर 2025 तक स्थापित सोलर एनर्जी क्षमता बढ़कर 132.85 गीगावाट हो गई है। इसमें पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 41 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। नवंबर 2024 में देश में स्थापित सोलर एनर्जी क्षमता 94.17 गीगावाट थी।विंड एनर्जी क्षमता में भी काफी बढ़ोतरी हुई है, पिछले साल इसी अवधि के 3.2 गीगावाट की तुलना में 5.82 गीगावाट की क्षमता जोड़ी गई है। विंड एनर्जी की स्थापित क्षमता मार्च 2025 में 50 गीगावाट का आंकड़ा पार कर गई थी। नवंबर 2025 में विंड एनर्जी की स्थापित क्षमता 53.99 गीगावाट तक पहुंच गई है, जो नवंबर 2024 के 47.96 गीगावाट की तुलना में 12.5 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी है।सीओपी-26 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुसार, सरकार 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता तक पहुंचने के लिए काम कर रही है। भारत में जून 2025 में गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता की हिस्सेदारी कुल स्थापित ऊर्जा क्षमता में 50 प्रतिशत हो गई थी, जो पेरिस समझौते के तहत अपने नेशनल डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन (एनडीसी) के तहत तय 2030 के लक्ष्य से पांच साल पहले है।
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नयी दिल्ली. खनन और विनिर्माण क्षेत्रों के मजबूत प्रदर्शन से नवंबर महीने में देश के औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर दो साल के उच्च स्तर 6.7 प्रतिशत पर पहुंच गयी। यह जानकारी सोमवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों में दी गई। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के आंकड़ों के मुताबिक, औद्योगिक उत्पादन को मापने वाला औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) नवंबर, 2024 में पांच प्रतिशत बढ़ा था। इससे पहले औद्योगिक उत्पादन का उच्च स्तर नवंबर, 2023 में 11.9 प्रतिशत दर्ज किया गया था।
त्योहारों से पहले देश में मांग और खपत को बढ़ावा देने के लिए कई उपभोक्ता वस्तुओं पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरों में 22 सितंबर 2025 से कटौती की गई थी। इससे जीएसटी दरों में कमी का लाभ उठाने के लिए विनिर्माण ऑर्डरों में तेजी आई। इसके साथ एनएसओ ने अक्टूबर 2025 के लिए औद्योगिक उत्पादन वृद्धि के आंकड़े को भी संशोधित किया है। अक्टूबर के लिए आईआईपी वृद्धि को बढ़ाकर 0.5 प्रतिशत कर दिया गया है जबकि पिछले महीने जारी अस्थायी अनुमान 0.4 प्रतिशत का था। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2025 में विनिर्माण क्षेत्र का उत्पादन आठ प्रतिशत बढ़ा, जो एक साल पहले इसी महीने में 5.5 प्रतिशत था। खनन क्षेत्र का उत्पादन भी नवंबर में 5.4 प्रतिशत बढ़ा जबकि नवंबर 2024 में यह वृद्धि 1.9 प्रतिशत रही थी। हालांकि, बिजली उत्पादन का प्रदर्शन पिछले महीने कमजोर रहा। नवंबर में बिजली उत्पादन में 1.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में इसमें 4.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। नवंबर महीने के आईआईपी आंकड़ों में सुधार से संकेत मिलता है कि औद्योगिक गतिविधियों में खासकर विनिर्माण और खनन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में रफ्तार की वापसी हो रही है। वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल-नवंबर के दौरान देश का औद्योगिक उत्पादन 3.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह आंकड़ा 4.1 प्रतिशत था। विनिर्माण क्षेत्र के तहत 23 में 20 उद्योग समूहों ने नवंबर 2025 में सालाना आधार पर सकारात्मक वृद्धि दर्ज की। इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ''अमेरिकी शुल्क और जुर्माने का असर कुछ विनिर्माण खंडों में दिखाई दे सकता है, जिससे जीएसटी दरों में बदलाव के सकारात्मक प्रभाव का असर कम हो सकता है।'' उन्होंने कहा कि दो महीने के बाद दिसंबर 2025 में बिजली की मांग बढ़ी है, जिससे उस महीने बिजली उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और यह आईआईपी वृद्धि के लिए सकारात्मक संकेत है। नायर ने आगे कहा, ''हमें उम्मीद है कि दिसंबर 2025 में आईआईपी वृद्धि घटकर 3.5 से 5.0 प्रतिशत के दायरे में आ सकती है, क्योंकि तुलनात्मक आधार प्रभाव सामान्य होगा। -
नयी दिल्ली/ जिंदल स्टील ने रायगढ़ स्थित अपने संयंत्र में संरचनात्मक इस्पात की वार्षिक उत्पादन क्षमता को दोगुना करके 24 लाख टन तक पहुंचाने की विस्तार योजना की सोमवार को घोषणा की। नवीन जिंदल समूह की कंपनी ने बयान में रायगढ़ स्थित अपने संयंत्र में संरचनात्मक इस्पात निर्माण क्षमताओं के महत्वपूर्ण विस्तार की घोषणा की। इसके तहत कंपनी 2028 के मध्य तक अपनी मौजूदा संरचनात्मक इस्पात उत्पादन क्षमता को 12 लाख टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) से बढ़ाकर 24 लाख टन प्रति वर्ष कर देगी।'' कंपनी ने कहा कि इस विस्तार से भारत में भारी एवं बेहद-भारी संरचनात्मक इस्पात खंडों की उपलब्धता में काफी वृद्धि होगी और इस क्षेत्र में जिंदल स्टील के नेतृत्व को मजबूती मिलेगी। बयान में हालांकि कंपनी ने विस्तार योजना के मूल्य का खुलासा नहीं किया।
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नयी दिल्ली। बीते सप्ताह देश के तेल-तिलहन बाजारों में ऊंचे भाव पर लिवाली प्रभावित रहने से सरसों तेल-तिलहन के दाम में गिरावट देखी गई जबकि साधारण मांग के कारण सोयाबीन तेल-तिलहन, सटोरियों द्वारा ऊंचा दाम बोले जाने से कच्चा पामतेल (सीपीओ) एवं पामोलीन तेल में सुधार आया। नमकीन बनाने वाली कंपनियों की फुल्की फुल्की मांग के कारण बिनौला तेल के दाम में भी मामूली सुधार रहा। सुस्त कामकाज के बीच मूंगफली तेल-तिलहन के दाम अपरिवर्तित रहे। बाजार सूत्रों ने कहा कि सरकार की ओर से सरसों की बिकवाली की जा रही है जो एक उचित कदम है। क्योंकि सरसों का स्टॉक किसानों, सरकारी संस्थाओं और स्टॉकिस्टों के पास बचा है। आगामी फसल भी आने की तैयारी में है और इसकी खरीद करने के लिए पुराने स्टॉक को बाजार में निकालना जरूरी है। सरसों का हाजिर दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 7-8 प्रतिशत अधिक है। सरसों की नयी फसल कुछ समय में बाजार में आना शुरु हो जाएगी है। मात्रा भले ही कम हो पर इसका असर बाजार पर आता है। इन परिस्थितियों के बीच सरसों तेल-तिलहन के दाम समीक्षाधीन सप्ताह में गिरावट दर्शाते बंद हुए। सूत्रों ने कहा कि दूसरी ओर, सर्दियों के मौसम में स्थानीय स्तर पर सोयाबीन डी-आयल्ड केक (डीओसी) की मांग बढ़ जाती है। इसके अलावा सूरजमुखी (145 रुपये किलो) के मुकाबले सोयाबीन तेल (लगभग 124 रुपये किलो) सस्ता होने से सोयाबीन तेल की मांग भी है। ऐसे में बीते सप्ताह सोयाबीन तेल-तिलहन के दाम में अपने विगत सप्ताहांत के मुकाबले सुधार आया। उन्होंने कहा कि पिछले सप्ताहांत के मुकाबले स्थानीय मांग होने से सोयाबीन तेल-तिलहन में सुधार है मगर हकीकत में एमएसपी से मुकाबले सोयाबीन का दाम कमजोर बना हुआ है। अपने एमएसपी वाले दाम पर सोयाबीन का बाजार ही नहीं है।
सूत्रों ने कहा कि यही हाल मूंगफली का है क्योंकि इसके एमएसपी के हिसाब से बाजार नहीं है और एमएसपी वाले दाम पर मूंगफली कभी खपेगा नहीं। इस परिस्थिति के बीच मूंगफली तेल-तिलहन के दाम पूर्व सप्ताहांत के स्तर पर ही स्थिर बने रहे। उन्होंने कहा कि आयातक एक ओर बैंकों में अपना ऋण साखपत्र (लेटर आफ क्रेडिट या एलसी) घुमाने के लिए लागत से कम दाम पर सोयाबीन डीगम तेल काफी समय से बेचना जारी रखे हैं वहीं दूसरी ओर वे अपना आयकर भी दाखिल कर फायदा दिखाते हैं। इस घाटे का सीधा असर यह होगा कि आगे जाकर आयात और घटेगा और इस गिरावट के असर से बाकी तेल-तिलहन भी दवाब में बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि यह अजीब विरोधाभास है कि जिस देश में खाद्यतेलों की लगभग 60 प्रतिशत की कमी हो, वहां आयातकों को लागत से नीचे दाम पर खाद्यतेल बेचना पड़े। सूत्रों ने कहा कि मलेशिया में सट्टेबाज विगत कुछ कारोबारी सत्रों में पाम-पामोलीन तेल के दाम ऊंचा लगा रहे हैं। वहां स्टॉक रखने की जगह नहीं है।भारत जैसे विशाल उपभोक्ता देश में जाड़े में पाम-पामोलीन की मांग भी घट जाती है लेकिन मलेशिया के कारोबारी फिर भी दाम ऊंचा लगाने में कसर नहीं छोड़ते। इस सट्टेबाजी के कारण पाम-पामोलीन के दाम में सुधार है। उन्होंने कहा कि नमकीन बनाने वाली कंपनियों की हल्की फुल्की मांग के कारण बीते सप्ताह बिनौलातेल के दाम में भी मामूली सुधार है। बीते सप्ताह सरसों दाना 75 रुपये की गिरावट के साथ 6,900-6,950 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। दादरी मंडी में बिकने वाला सरसों तेल 225 रुपये की गिरावट के साथ 14,250 रुपये प्रति क्विंटल, सरसों पक्की और कच्ची घानी तेल का भाव क्रमश: 40-40 रुपये की गिरावट के साथ क्रमश: 2,390-2,490 रुपये और 2,390-2,535 रुपये टिन (15 किलो) पर बंद हुआ। समीक्षाधीन सप्ताह में सोयाबीन दाने और सोयाबीन लूज के थोक भाव क्रमश: 100-100 रुपये के सुधार के साथ क्रमश: 4,800-4,850 रुपये और 4,500-4,550 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुए। इसी प्रकार, दिल्ली में सोयाबीन तेल 125 रुपये के सुधार के साथ 13,550 रुपये प्रति क्विंटल, इंदौर में सोयाबीन तेल 125 रुपये के सुधार के साथ 13,150 रुपये और सोयाबीन डीगम तेल का दाम 135 रुपये के सुधार के साथ 10,325 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। सुस्त कामकाज तथा एमएसपी से काफी नीचा हाजिर दाम रहने के बीच समीक्षाधीन सप्ताह में मूंगफली तेल-तिलहन की कीमतों में स्थिरता देखने को मिली। मूंगफली तिलहन 6,450-6,825 रुपये क्विंटल, मूंगफली तेल गुजरात 15,500 रुपये क्विंटल और मूंगफली साल्वेंट रिफाइंड तेल 2,485-2,785 रुपये प्रति टिन के पूर्व सप्ताहांत के भाव पर स्थिर बने रहे। दूसरी ओर, समीक्षाधीन सप्ताह में सीपीओ तेल का दाम 175 रुपये के सुधार के साथ 11,375 रुपये प्रति क्विंटल, पामोलीन दिल्ली का भाव 100 रुपये के सुधार के साथ 13,100 रुपये प्रति क्विंटल तथा पामोलीन एक्स कांडला तेल का भाव 100 रुपये के सुधार के साथ 12,100 रुपये प्रति क्विंटल पर बंद हुआ। तेजी के आम रुख के बीच, समीक्षाधीन सप्ताह में बिनौला तेल के दाम भी 75 रुपये सुधार के साथ 12,275 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बंद हुए। - नयी दिल्ली। कॉरपोरेट प्रशासन और जवाबदेही में सुधार के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ने कोयला मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह सरकारी कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) की सभी अनुषंगी कंपनियों को 2030 तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराए। सूत्रों ने यह जानकारी दी। इस कदम का मकसद सीआईएल में प्रशासन को सुव्यवस्थित करना, पारदर्शिता बढ़ाना और परिसंपत्ति मौद्रिकरण के जरिए मूल्य सृजन करना है। कोल इंडिया लिमिटेड देश के कुल घरेलू कोयला उत्पादन में 80 प्रतिशत से अधिक का योगदान देती है। उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार कोल इंडिया की सभी अनुषंगी कंपनियों को 2030 तक सूचीबद्ध करने की योजना है। उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि कंपनी के कामकाज को मजबूत बनाने के लिए यह निर्देश सीधे पीएमओ की ओर से दिया गया है। कोल इंडिया अपनी आठ अनुषंगी कंपनियों के माध्यम से परिचालन करती है, जिनमें ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड, भारत कोकिंग कोल लिमिटेड, सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड, वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड, साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड, नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड, महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड को मार्च 2026 तक शेयर बाजार में सूचीबद्ध किया जाना है, जिसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बीसीसीएल के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय रोडशो भी पूरे हो चुके हैं। सूत्रों ने बताया कि भारत कोकिंग कोल लिमिटेड को सूचीबद्ध करने की प्रक्रिया पूरी गति से चल रही है और इसमें किसी प्रकार की रोक या देरी नहीं है।
- नयी दिल्ली । कीमतों में रिकॉर्ड तेजी के साथ निवेशकों के सोना, चांदी में निवेश के लिए आकर्षित होने के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि उपलब्ध विभिन्न निवेश विकल्पों में गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड) एक बेहतर विकल्प है। इसका कारण कम राशि के साथ सोना, चांदी में निवेश, उसके रखरखाव को लेकर कोई झंझट नहीं और कम लेन-देन शुल्क के साथ उच्च तरलता यानी भुनाने की सुविधा है। उनका यह भी कहना है कि यदि आप भौतिक रूप से मूल्यवान धातु को महत्व देते हैं, निवेश के लिए सोने/चांदी के सिक्के/बिस्कुट बेहतर है। चूंकि आभूषण खरीदने में उसे बनाने के शुल्क का भुगतान करना होता है, वह बेहतर विकल्प नहीं है।उल्लेखनीय है कि इस साल अबतक सोने में 82 प्रतिशत जबकि चांदी में 175 प्रतिशत की तेजी आई है। मल्टीकमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) में सोना एक जनवरी को 76,772 रुपये प्रति 10 ग्राम था जो 26 दिसंबर को 1,39,890 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है। वहीं चांदी एक जनवरी को 87,300 रुपये प्रति किलो थी, जो 26 दिसंबर को बढ़कर 2,40,300 रुपये प्रति किलो पहुंच गयी है। निवेश के विकल्पों के बारे में मेहता इक्विटीज लि. के उपाध्यक्ष (जिंस) राहुल कलंत्री ने कहा, ‘‘मूल्यवान धातु में निवेश के लिए उपलब्ध विभिन्न विकल्पों में गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ बेहतर विकल्प है। इसका कारण यह सोना या चांदी को रखने की समस्या के बिना निवेश करने का एक आसान तरीका है। साथ ही यह अत्यधिक तरलता प्रदान करता है।'' हालांकि उन्होंने यह भी कहा, ‘‘जब सोना या चांदी में निवेश की बात करते हैं, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप इसे किस रूप में रखते हैं। यह मूल रूप से आपके ज्ञान और खरीद के सबसे सुविधाजनक साधनों पर निर्भर करता है। अंततः, प्रत्येक व्यक्ति की पसंद उसके व्यक्तिगत लक्ष्यों, उपयोग की आवश्यकताओं और निवेश में बने रहने की अवधि के आधार पर अलग-अलग होगी।''आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स लि. के निदेशक (जिंस और मुद्रा) नवीन माथुर ने कहा, ‘‘उपलब्ध विभिन्न निवेश विकल्पों में से, गोल्ड/सिल्वर ईटीएफ अब तक का सबसे अच्छा निवेश विकल्प है। इसका कारण निवेश के लिए उपलब्ध कम मूल्यवर्ग की इकाइयों, रखरखाव की कोई लागत न होने, अंतर्निहित ईटीएफ के माध्यम से शुद्धता की गारंटी, उच्च तरलता और कम लेनदेन लागत जैसे लाभ हैं।'' गोल्ड/ सिल्वर ईटीएफ निवेश फंड हैं जिनका शेयर बाजारों में शेयरों की तरह कारोबार होता है। इसमें भौतिक रूप से सोना या चांदी खरीदे बिना कीमती धातुओं में निवेश किया जा सकता है। वे भौतिक रूप से सर्राफा (सोना/चांदी) या संबंधित परिसंपत्तियों को रखते हैं और उनकी कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव पर नजर रखते हैं। इसमें म्यूचुअल फंड के जरिये भी निवेश किया जा सकता है। सोने में निवेश भौतिक रूप से मूल्यवान धातु खरीदकर, ईटीएफ, वायदा एवं विकल्प या फिर म्यूचुअल फंड के जरिये किया जा सकता है। विश्लेषकों के अनुसार, प्रत्येक विकल्प के अपने फायदे और नुकसान हैं, इसलिए निवेशकों के लिए यह आकलन करना महत्वपूर्ण है कि कौन सा विकल्प उनके लक्ष्यों के अनुकूल है। भौतिक रूप से मूल्यवान धातु खरीदने के फायदे-नुकसान के बारे में पूछे जाने पर कलंत्री ने कहा, ‘‘यदि आप भौतिक रूप से मूल्यवान धातु को महत्व देते हैं, सोने और चांदी के सिक्के/बिस्कुट बेहतर हैं। ये प्रत्यक्ष स्वामित्व प्रदान करते हैं और मूल्य के एक मजबूत भंडार के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन इसमें रखरखाव, बीमा लागत और कम तरलता यानी भुनाने की समस्या शामिल होती है।''उन्होंने कहा कि चूंकि आभूषण खरीदने में उसे बनाने के शुल्क का भुगतान करना होता है, वह बेहतर विकल्प नहीं है। वायदा एवं विकल्प कारोबार के जरिये निवेश के बारे में कलंत्री ने कहा, ‘‘ये उन अनुभवी निवेशकों के लिए उपयुक्त हैं जो अल्पकालिक अवसरों की तलाश में हैं या जोखिम को कम करने के लिए ‘हेजिंग' करना चाहते हैं, लेकिन ये अधिक जोखिम भरे होते हैं।'' एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘डिजिटल सोना मुख्य रूप से सुविधाजनक होने, कम निवेश राशि, खरीदने और बेचने में आसानी और ऐप-आधारित निर्बाध पहुंच के कारण लोकप्रिय हो रहा है। यह आकर्षण विशेष रूप से युवा निवेशकों के बीच है, जो तकनीक को पसंद करते हैं और पारंपरिक भौतिक सोने की तुलना में डिजिटल संपत्तियों के साथ अधिक सहज हैं। इसमें निवेशक बहुत कम राशि से शुरुआत कर सकते हैं और उसके रखरखाव या शुद्धता को लेकर कोई परेशानी नहीं होती है।'' उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, डिजिटल सोना सेबी द्वारा विनियमित उत्पाद नहीं है। यह आमतौर पर निजी मंचों द्वारा पेश किया जाता है जहां सोना तृतीय-पक्ष ‘वॉल्ट' (तिजोरी) प्रबंधकों के पास रखा होता है, जिसमें जोखिम जुड़े होते हैं।'' कलंत्री ने कहा, ‘‘नियामकीय जोखिमों को देखते हुए, हम निवेशकों को सलाह देते हैं कि वे केवल सेबी (भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड) द्वारा विनियमित उत्पादों के जरिये से ही सोना या चांदी में निवेश करें।'' विश्लेषकों का कहना है कि कुल मिलाकर, इन विकल्पों में विविधतापूर्ण दृष्टिकोण अपनाने से निवेशकों को सुरक्षा, तरलता और वृद्धि क्षमता के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।
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नई दिल्ली। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने शनिवार को कहा कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया है। साथ ही, देश के इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में छह गुना की बढ़ोतरी हुई है। वैष्णव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि केंद्र सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) जैसी स्कीमों के कारण देश का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात बीते 11 वर्षों में आठ गुना बढ़ा है।
उन्होंने कहा कि बड़े स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग के लिए लाई गई पीएलआई स्कीम ने 13,475 करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है और इससे इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में 9.8 लाख करोड़ रुपए का उत्पादन हुआ है और मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ नौकरियों और निर्यात में बढ़त हुई है। वैष्णव ने बताया कि बीते पांच वर्षों में 1.3 लाख से ज्यादा नौकरियां इस सेक्टर में पैदा हुई हैं और इलेक्ट्रॉनिक्स अब भारत की तीसरी सबसे बड़ी निर्यात कैटेगरी है। उन्होंने कहा कि देश शुरू में तैयार प्रोडक्ट्स पर फोकस कर रहा था, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम ने “मॉड्यूल, कंपोनेंट, सब-मॉड्यूल, कच्चे माल और उन्हें बनाने वाली मशीनों के लिए क्षमता बनाने” की तरफ बदलाव को सपोर्ट किया। पोस्ट में कहा गया है कि इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम में 249 आवेदन आए हैं, जो 1.15 लाख करोड़ रुपए के निवेश, 10.34 लाख करोड़ रुपए के उत्पादन और 1.42 लाख नौकरियां पैदा करने का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि यह भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में अब तक का सबसे बड़ी निवेश प्रतिबद्धता है, जो इंडस्ट्री के भरोसे को दिखाता है। वैष्णव ने सेमीकंडक्टर सेक्टर में हुई प्रगति के बारे में भी बताया, और कहा कि दस यूनिट्स को मंजूरी मिल गई है, जिनमें से तीन पहले से ही पायलट या शुरुआती प्रोडक्शन में हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत से फैब्स और एटीएमपी जल्द ही फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने वाली कंपनियों को चिप्स सप्लाई करेंगे।केंद्रीय मंत्री ने कहा, “पिछले दशक में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से 25 लाख नौकरियां पैदा हुईं। यह जमीनी स्तर पर असली आर्थिक विकास है।” उन्होंने कहा, “जैसे-जैसे हम सेमीकंडक्टर और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ाएंगे, रोजगार के अवसर और तेजी से बढ़ेंगे। तैयार प्रोडक्ट्स से लेकर कंपोनेंट्स तक, प्रोडक्शन बढ़ रहा है। एक्सपोर्ट बढ़ रहा है। ग्लोबल कंपनियां भरोसेमंद हैं और भारतीय कंपनियां प्रतिस्पर्धी हैं। नौकरियां पैदा हो रही हैं। यह ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता की कहानी है।” - नई दिल्ली। भारत की जीडीपी वृद्धि दर वित्त वर्ष 26 में 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसकी वजह इलेक्ट्रिसिटी की मांग बढ़ना और खनन एवं निर्माण गतिविधियों में इजाफा होना है। यह जानकारी एक रिपोर्ट में दी गई। आईसीआरए की रिपोर्ट में कहा गया कि वित्त वर्ष 26 की दूसरी छमाही में वृद्धि दर 7 प्रतिशत से कम रहने की उम्मीद है। इसकी वजह प्रतिकूल आधार प्रभाव और निर्यात में कमी होना है। वित्त वर्ष 26 की पहली छमाही में विकास दर 8 प्रतिशत से अधिक थी।रिपोर्ट में उम्मीद जताई गई है कि आरबीआई फरवरी 2026 की पॉलिसी रिव्यू में ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा और भविष्य के फैसले वित्त वर्ष 27 के यूनियन बजट और बदलती महंगाई और वृद्धि दर की गतिशीलता के आधार पर लिए जाएंगे।हालांकि, वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही में अर्थिक गतिविधियां मजबूत रही हैं। इन्हें त्योहारी सीजन के दौरान ब्याज दरों में कटौती और कुछ सेक्टर्स में सीजनल तेजी का फायदा मिला है। रिपोर्ट के मुताबिक, तीसरी तिमाही में त्योहारी मांग और जीएसटी में कटौती का वस्तुओं और सेवाओं की खपत के साथ मैन्युफैक्चरिंग की वॉल्यूम पर सकारात्मक प्रभाव होगा। हालांकि, वित्त वर्ष 26 की दूसरी छमाही में निर्यात में गिरावट देखने को मिल सकती है, जब तक भारत-अमेरिका ट्रेड डील न हो।खुदरा महंगाई दर वित्त वर्ष 26 में कम होकर 2 प्रतिशत के करीब रहने का अनुमान है, जो कि वित्त वर्ष 25 में 4.6 प्रतिशत थी। खुदरा महंगाई दर नवंबर 2025 में बढ़कर 0.7 प्रतिशत हो गई है, जो कि अक्टूबर में 0.3 प्रतिशत थी। इसकी वजह फूड और बेवरेज में अपस्फीति कम होना है।रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 26 में सीमेंट उत्पादन में 6.5-7.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की उम्मीद हैइसके अलावा, रिपोर्ट में कहा गया है कि बारिश से होने वाली रुकावटों के कारण आई कमी के बाद, आने वाले महीनों में खनन एवं निर्माण गतिविधियों के साथ-साथ बिजली की मांग में भी मौसमी तेजी देखने को मिलेगी। रिपोर्ट में कहा गया है, “वित्त वर्ष 26 में सीमेंट उत्पादन में 6.5-7.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। पिछले कुछ सालों में मजबूत वृद्धि के बाद स्टील की मांग में बढ़ोतरी कम होकर 7-8 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। वित्त वर्ष 26 के लिए बिजली की मांग में बढ़ोतरी 1.5-2 प्रतिशत पर धीमी रहेगी।
- नई दिल्ली। छोटे बिजनेस को क्रेडिट एक्सपोजर सालाना आधार पर 16.2 प्रतिशत बढ़कर 46 लाख करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। यह जानकारी शुक्रवार को जारी रिपोर्ट में दी गई। सीआरआईएफ हाई मार्क और सिडबी की रिपोर्ट में कहा गया है कि नीतिगत उपायों और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए सरकारी लोन योजनाओं के समर्थन से सक्रिय लोन खातों में 11.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह संख्या 7.3 करोड़ तक पहुंच गई है।रिपोर्ट में पाया गया कि 5 करोड़ रुपए तक के लोन वाले व्यवसायों में औपचारीकरण तेजी से बढ़ रहा है, जिसमें सितंबर 2025 तक लोन लेने वाले 23.3 प्रतिशत उधारकर्ता नए थे, जबकि उद्यमों के लिए यह आंकड़ा 12 प्रतिशत पर था।रिपोर्ट में बताया गया कि छोटे व्यवसायों के लिए लोन व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है और इसमें सुधार हो रहा है। लोन पोर्टफोलियो का विस्तार जारी है और औपचारीकरण धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, जिसमें अधिक लेंडर्स सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं, जबकि परिसंपत्ति की गुणवत्ता भी अच्छी बनी हुई है।एकल स्वामित्व वाले व्यवसाय इस व्यवस्था में अपना दबदबा बनाए हुए हैं, जो लगभग 80 प्रतिशत लोन और लगभग 90 प्रतिशत उधारकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। सबसे तेजी से बढ़ने वाला वर्ग एकल स्वामित्व वाले व्यवसाय ने 20 प्रतिशत की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की, जो मुख्य रूप से संपत्ति को गिरवी रखकर लिए गए लोन से प्रेरित है।रिपोर्ट में कहा गया है, “निजी बैंक उद्यम को लोन देने में अग्रणी बने हुए हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का स्थान उनके बाद आता है। नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (एनबीएफसी) अपनी उपस्थिति लगातार बढ़ा रही हैं। अब एमएसएमई को दिए गए लोन में उनकी हिस्सेदारी 41 प्रतिशत से अधिक है।” कार्यशील पूंजी लोन कुल बकाया लोन का लगभग 57 प्रतिशत है, जबकि टर्म लोन पूंजीगत व्यय को समर्थन देना जारी रखे हुए हैं।सीआरआईएफ हाई मार्क के अध्यक्ष और सीआरआईएफ इंडिया और दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय प्रबंध निदेशक सचिन सेठ ने कहा, “सितंबर 2025 तक उधारकर्ताओं के कुल आधार का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा एकल स्वामित्व वाले व्यवसायों का है, जो भारत के लघु व्यवसाय ऋण तंत्र का आधार बने हुए हैं। लघु व्यवसायों के विस्तार के साथ-साथ ऋण का विस्तार और क्रमिक औपचारीकरण भी समानांतर रूप से आगे बढ़ रहा है।”रिपोर्ट में बताया गया कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और गुजरात समग्र पोर्टफोलियो आकार में अग्रणी हैं। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में मजबूत वृद्धि देखी जा रही है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पूर्ण लोन जोखिम में सबसे आगे है, जबकि सेवा क्षेत्र में वार्षिक आधार पर 19.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
- नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार शुक्रवार के कारोबारी सत्र में लाल निशान में बंद हुआ। दिन के अंत में बीएसई सेंसेक्स 367.25 अंक या 0.43% की गिरावट के साथ 85,041.45 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 99.80 अंक या 0.38% फिसलकर 26,042.30 के स्तर पर आ गया।बाजार पर दबाव बनाने में आईटी शेयरों की प्रमुख भूमिका रही। निफ्टी आईटी इंडेक्स 1% की गिरावट के साथ बंद हुआ। इसके अलावा ऑटो, पीएसयू बैंक, फाइनेंशियल सर्विसेज, फार्मा, रियल्टी, एनर्जी, प्राइवेट बैंक, इन्फ्रा और कंजप्शन सेक्टर भी लाल निशान में रहे। दूसरी ओर एफएमसीजी, मेटल और कमोडिटीज सेक्टर हरे निशान में बंद हुए।लार्जकैप के साथ-साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी कमजोरी देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 136.90 अंक या 0.23% की गिरावट के साथ 60,314.45 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 13.50 अंक फिसलकर 17,695.10 पर बंद हुआ।सेंसेक्स पैक में टाइटन, एनटीपीसी, एचयूएल, एक्सिस बैंक और अल्ट्राटेक सीमेंट गेनर्स रहे। वहीं बजाज फाइनेंस, एशियन पेंट्स, एचसीएल टेक, टीसीएस, इटरनल, टेक महिंद्रा, पावर ग्रिड, सन फार्मा, भारती एयरटेल, बजाज फिनसर्व, मारुति सुजुकी, आईटीसी, आईसीआईसीआई बैंक, टाटा स्टील, बीईएल, एमएंडएम और एचडीएफसी बैंक लूजर्स में शामिल रहे।वृहद बाजार में भी कमजोरी का माहौल रहा, जहां गिरने वाले शेयरों की संख्या बढ़ने वाले शेयरों से अधिक रही।बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, घरेलू इक्विटी बाजार में गिरावट की वजह साल के अंत में कम ट्रेडिंग वॉल्यूम और हालिया तेजी के बाद मुनाफावसूली रही। इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की लगातार बिकवाली से भी बाजार पर दबाव बना रहा। अमेरिका-भारत के बीच संभावित ट्रेड डील को लेकर बढ़ता इंतजार भी निवेशकों में अनिश्चितता पैदा कर रहा है।शुक्रवार को बाजार की शुरुआत भी कमजोरी के साथ हुई थी। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लाल निशान में कारोबार करते नजर आए थे।
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नई दिल्ली। बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों और अगले साल अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों के चलते हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को सोने और चांदी की कीमतें अपने नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। एमसीएक्स पर फरवरी डिलीवरी वाला सोने का वायदा भाव 0.72 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 1,39,286 रुपए प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, तो वहीं एमसीएक्स सिल्वर मार्च वायदा 4 प्रतिशत से ज्यादा के बढ़त के साथ रिकॉर्ड 2,33,183 रुपए प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गया। यह दोनों कीमती धातुओं में अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है।
खबर लिखे जाने तक सोना 1,39,220 रुपये पर 0.81% और चांदी 2,33,000 रुपये पर 4.12% बढ़ी की तेजी दर्ज हुई। खबर लिखे जाने तक सोना जहां 1,123 रुपए यानी 0.81 प्रतिशत की तेजी के साथ 1,39,220 रुपए प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहे थे, वहीं चांदी 9,210 रुपए यानी 4.12 प्रतिशत की उछाल के साथ 2,33,000 रुपए प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रहे थे।सोने की कीमतों में यह उछाल मुख्य रूप से अमेरिका और वेनेजुएला के बीच बढ़ते तनावों के कारण आया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी सोने की कीमतें बढ़ी हैं और स्पॉट गोल्ड 0.5 प्रतिशत बढ़कर 4,501.44 डॉलर प्रति औंस हो गई। इससे पहले सोना 4,530.60 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच चुका था।व्यापारी उम्मीद कर रहे हैं कि 2026 में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दर में दो बार 0.25 प्रतिशत की कटौती करेगा, क्योंकि महंगाई में कमी आ रही है और श्रम बाजार की स्थिति नरम हो रही है। इसके साथ ही बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण सुरक्षित निवेश की मांग में भी बढ़ोतरी हुई है।अमेरिका और वेनेजुएला के बीच बढ़ते तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और नाइजीरिया में आईएसआईएस के खिलाफ अमेरिकी सेना की कार्रवाई से भू-राजनीतिक तनाव बढ़े हैं। इस महीने अमेरिकी कोस्ट गार्ड ने वेनेजुएला के कच्चे तेल से भरे एक सुपर टैंकर को कब्जे में लिया और वेनेजुएला से संबंधित दो अन्य जहाजों को इंटरसेप्ट करने की कोशिश की, जिससे तनाव और बढ़ गया।मेहता इक्विटी लिमिटेड के कमोडिटी उपाध्यक्ष राहुल कालंत्री ने कहा कि केंद्रीय बैंकों द्वारा खरीदी और लगातार ईटीएफ में पूंजी प्रवाह सोने की कीमतों को समर्थन दे रहे हैं। सोने में 1,36,550 से 1,35,710 रुपए के बीच सपोर्ट है, जबकि 1,38,850 से 1,39,670 रुपए के बीच रेजिस्टेंस है। वहीं सिल्वर में 2,22,150 से 2,20,780 रुपए के बीच सपोर्ट तो 2,25,810 से 2,26,970 रुपए के बीच रेजिस्टेंस है।एक्सपर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय बैंकों की आक्रामक खरीदारी, अमेरिकी फेड द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद, अमेरिकी टैरिफ के प्रभावों को लेकर चिंता, भू-राजनीतिक तनाव और गोल्ड और सिल्वर ईटीएफ में मजबूत निवेश ने इस वर्ष सोने और चांदी की कीमतों को बढ़ावा दिया है। -
नयी दिल्ली. भारतीय खुदरा उद्योग अतीत की बाधाओं को दरकिनार करते हुए मजबूत आधार के साथ 2026 के लिए तैयार है। प्रमुख महानगरों से छोटे व मझाले शहरों की ओर मांग में बदलाव से बेहतर मुनाफे की उम्मीद है। साथ ही देश अब भी दुनिया के तीसरे सबसे बड़े खुदरा बाजार के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखेगा। भारत के करीब 1100 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के खुदरा उद्योग में तेज डिजिटल एकीकरण, छोटे शहरों में विस्तार एवं मजबूत घरेलू मांग, प्रौद्योगिकी-प्रधान व्यवधान एवं गुणवत्ता व मूल्य के प्रति बढ़ती उपभोक्ता अपेक्षाओं के कारण बड़े मॉल का विकास हुआ है। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) सुधार और आयकर राहत जैसी नीतिगत पहल, अच्छी मानसून तथा उच्च न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के साथ उपभोक्ता मांग में सकारात्मक संकेत दे रही हैं। इसके साथ ही, मूल्य खुदरा में तेजी और ‘प्रीमियमाइजेशन' के बढ़ने से 2026 में वृद्धि तेज रहने की संभावना है। उद्योग को बढ़ती किराए की दरों, डिजिटल एवं भौतिक माध्यमों में तीव्र प्रतिस्पर्धा, सभी माध्यमों के अनुभवों का साथ लोने में चुनौतियों के साथ आपूर्ति श्रृंखला की लगातार असफलताएं हालांकि मुनाफे पर दबाव एवं कुशल प्रतिभा की कमी जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। डेलॉयट इंडिया के साझेदार एवं उपभोक्ता उद्योग के प्रमुख आनंद रामनाथन ने कहा कि दोहरे अंकों की वृद्धि के साथ 2026 के लिए खुदरा क्षेत्र की संभावना “अत्यधिक आशाजनक” है। उन्होंने कहा, “ सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 6.4 से 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, मुद्रास्फीति नियंत्रित है और उपभोक्ता भावना मजबूत बनी हुई है। ई-कॉमर्स का विस्तार होगा, छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के अधिक उपभोक्ता ऑनलाइन खरीदारी करेंगे।'' उन्होंने कहा कि ‘क्विक कॉमर्स' और ‘सोशल कॉमर्स' पारंपरिक मॉडल में बाधा डालना जारी रखेंगे, और सभी माध्यमों में परिपक्वता के एकीकृत अनुभव एवं लचीले पूर्ति विकल्प सक्षम करेगी। ‘प्रीमियमाइजेशन और वैयक्तिकरण मध्य और उच्च आय वर्ग के बढ़ने से प्रेरित होगा, जबकि स्थिरता और समावेश ब्रांड के लिए मुख्य भिन्नताएं बनेंगी। उन्होंने साथ ही कहा कि मुनाफा प्रबंधन, आपूर्ति श्रृंखला अनुकूलन एवं नियामक अनुपालन से संबंधित चुनौतियां बनी रहेंगी लेकिन यह क्षेत्र प्रौद्योगिकी तथा उपभोक्ता-केंद्रित पहल के साथ मजबूत और नवाचारी बना रहेगा। एक्सेंचर स्ट्रैटेजी एंड कंसल्टिंग के प्रबंध निदेशक आदित्य प्रियदर्शन ने कहा कि 2025 ने भारत में अधिक औपचारिक एवं डिजिटल रूप से सक्षम खुदरा परिवेश की ओर स्पष्ट और निरंतर बदलाव को दर्शाया। उन्होंने कहा कि जीएसटी में बदलाव जैसे संरचनात्मक सुधार ‘‘ जटिलता कम कर रहे हैं, मूल्य पारदर्शिता बढ़ा रहे हैं'' और खुदरा विक्रेताओं के लिए समान प्रतिस्पर्धा का मैदान तैयार कर रहे हैं। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) दर में कटौती और आयकर राहत ने भी उपभोक्ता भावना को बढ़ावा दिया और वर्ष की अंतिम तिमाही में रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की। उन्होंने कहा, ‘‘ भारत की खुदरा वृद्धि 2026 में संरचनात्मक रूप से मजबूत बनी रहेगी, लेकिन अगला चरण मात्रा के बजाय मुनाफा-केंद्रित होगा। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आरएआई) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी कुमार राजगोपालन ने कहा कि खुदरा क्षेत्र 2026 में 2025 के दौरान हासिल स्थिर गति के साथ प्रवेश करेगा जो उत्साह की बजाय संतुलित और व्यापक वृद्धि को दर्शाता है। वी-मार्ट के प्रबंध निदेशक ललित अग्रवाल ने कहा कि 2025 ब्रांडेड और प्रीमियम खुदरा के लिए अच्छा वर्ष नहीं था, लेकिन मूल्य खुदरा ने अच्छा प्रदर्शन किया। 2025 में मुनाफे के मामले में चुनौतियां रहीं, विशेष रूप से जीएसटी बदलावों के कारण। उन्होंने कहा कि 2026 में खुदरा उद्योग को बढ़ावा मिलेगा जिसमें परिधान, फैशन और अन्य क्षेत्रों में उपभोक्ता खर्च में वृद्धि मदद करेगी। ईवाई इंडिया के उपभोक्ता उत्पाद एवं खुदरा क्षेत्र के राष्ट्रीय प्रमुख परेश पारेख ने कहा कि उद्योग लंबे समय तक ‘मूल्य-केंद्रित वृद्धि' से ‘मात्रा-चालित' पुनर्प्राप्ति की शुरुआती अवस्था में प्रवेश कर रहा है। 2026 आशाजनक दिखाई देता है।
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नयी दिल्ली. देश में पेट्रोल पंप की संख्या 2015 से दोगुना होकर 1,00,000 के पार पहुंच चुकी है। सार्वजनिक क्षेत्र के ईंधन खुदरा विक्रेताओं ने बाजार हिस्सेदारी को बनाए रखने तथा ग्रामीण एवं राजमार्ग क्षेत्रों में ईंधन की पहुंच को और अधिक बढ़ाने के लिए तेजी से पेट्रोल पंप का विस्तार किया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला पेट्रोलियम योजना एवं विश्लेषण प्रकोष्ठ से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, नवंबर के अंत तक देश में 1,00,266 पेट्रोल पंप थे। यह अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। सार्वजनिक क्षेत्र की इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसी), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) जैसी सरकारी कंपनियों के पास 90 प्रतिशत से अधिक पंप हैं। रूस की रोसनेफ्ट समर्थित नायरा एनर्जी लिमिटेड 6,921 पेट्रोल पंप के साथ सबसे बड़ी निजी ईंधन खुदरा विक्रेता है। इसके बाद रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और बीपी के संयुक्त उद्यम के स्वामित्व वाले 2,114 पेट्रोल पंप हैं। शेल के 346 पेट्रोल पंप हैं। पीपीएसी के आंकड़ों के अनुसार, पेट्रोल पंप नेटवर्क 2015 में 50,451 स्टेशन से लगभग दोगुना हो गया है। उस वर्ष, निजी कंपनियों के स्वामित्व वाले 2,967 पेट्रोल पंप कुल बाजार का लगभग 5.9 प्रतिशत थे। वर्तमान में, वे कुल बाजार का 9.3 प्रतिशत हिस्सा हैं। भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पेट्रोल पंप नेटवर्क है। अमेरिका में सबसे बड़ा नेटवर्क है। अमेरिका में पेट्रोल पंप की संख्या के बारे में कोई आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में खुदरा पेट्रोल पंप की संख्या 1,96,643 थी। तब से कुछ पंप बंद हो चुके होंगे। चीन के लिए पिछले साल की एक रिपोर्ट में पेट्रोल पंप की संख्या 1,15,228 बताई गई थी। सिनोपेक की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार वह 30,000 से अधिक चालू पेट्रोल पंप के साथ चीन का सबसे बड़ा ईंधन खुदरा विक्रेता है। चाइना पेट्रोकेमिकल कॉरपोरेशन (सिनोपेक) आकार में हालांकि बड़ी है लेकिन भारतीय बाजार की अग्रणी कंपनी आईओसी के 41,664 पेट्रोल पंप के सामने इसके पेट्रोल पंप की संख्या बहुत कम लगती है। बीपीसीएल का नेटवर्क दूसरे नंबर पर है जिसके 24,605 स्टेशन हैं। इसके बाद एचपीसीएल का स्थान है जिसके 24,418 पेट्रोल पंप हैं।
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नयी दिल्ली. उद्योग मंडल सीआईआई ने सरकार से देश की वृद्धि की गति को बनाए रखने के लिए आगामी बजट में संस्थागत सुधारों और राजकोषीय मजबूती को बढ़ावा देने का बृहस्पतिवार को आग्रह किया। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) ने भारत की वृहद आर्थिक स्थिरता को मजबूत करने के लिए तैयार की गई रणनीति में ये सुझाव दिए। यह रणनीति ऋण स्थिरता, राजकोषीय पारदर्शिता, राजस्व जुटाने और व्यय दक्षता जैसे प्रमुख तत्वों पर आधारित है। सीआईआई के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा, ‘‘ भारत ने उच्च वृद्धि दर, कम मुद्रास्फीति एवं बेहतर राजकोषीय संकेतकों का एक दुर्लभ संगम हासिल किया है। आगामी केंद्रीय बजट को अनुशासित राजकोषीय प्रबंधन एवं गहन संस्थागत सुधारों के माध्यम से इस गति को बनाए रखना होगा।'' वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लोकसभा में 2026-27 का केंद्रीय बजट फरवरी में पेश कर सकती हैं।
सीआईआई ने सरकार को कर चोरी का पता लगाने के लिए अत्याधुनिक विश्लेषण तरीकों का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया। उसने तर्क दिया कि देश को वर्तमान 17.5 प्रतिशत (केंद्र एवं राज्यों को मिलाकर) के कर-जीडीपी अनुपात को बढ़ाने की आवश्यकता है। ‘कर-जीडीपी अनुपात', यह मापने का पैमाना है कि किसी देश के कुल राजस्व (जीडीपी) का कितना हिस्सा सरकार कर के रूप में एकत्रित करती है। बनर्जी ने कहा, ‘‘ देश की विकासात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भारत को अपने कर-जीडीपी अनुपात को बढ़ाने की आवश्यकता है। भारत के विश्व स्तरीय डिजिटल बुनियादी ढांचे से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग कर चोरी का पता लगाने और कर आधार को बढ़ाने में सहायक हो सकता है।'' सीआईआई ने कहा कि कर रिटर्न को उच्च मूल्य के लेन-देन से जोड़ना और अत्याधुनिक विश्लेषण तरीकों का उपयोग करना कर चोरी का वास्तविक समय में पता लगाने में सहायक हो सकता है। साथ ही अनुपालन लागत को भी कम कर सकता है। उद्योग जगत ने ऋण को प्रबंधन योग्य बनाये रखने को सुनिश्चित करने के लिए वित्त वर्ष 2030-31 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के एक प्रतिशत घट-बढ़ के साथ 50 प्रतिशत के लक्ष्य वाले सरकार के कर्ज में कमी की रूपरेखा का पालन करने पर जोर दिया। संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करने के लिए सीआईआई ने राजस्व, व्यय एवं ऋण के लिए तीन से पांच साल के ‘रोलिंग रोडमैप' के साथ मध्यम-अवधि राजकोषीय ढांचे को बहाल करने की सिफारिश की। सीआईआई ने कहा कि केंद्र तथा राज्यों में सार्वजनिक वित्त की गुणवत्ता का आकलन करने और प्रदर्शन को राजकोषीय हस्तांतरण से जोड़ने के लिए एक राजकोषीय प्रदर्शन सूचकांक को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए जिससे सूझ-बूझ से काम करने एवं सुधार-उन्मुख राज्यों को प्रोत्साहन मिले। उद्योग मंडल ने अंतरिम उपाय के रूप में चरणबद्ध विनिवेश करने की सिफारिश की जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में सरकार की हिस्सेदारी को धीरे-धीरे घटाकर 51 प्रतिशत तक लाया जाएगा, बहुमत स्वामित्व बरकरार रखा जाएगा और अंततः समय के साथ इसे 26-33 प्रतिशत तक कम किया जाए। सीआईआई ने साथ ही कहा कि इसके समानांतर पूर्ण निजीकरण के प्रयास जारी रहने चाहिए।व्यय प्रबंधन, विशेष रूप से सब्सिडी सुधार, सीआईआई द्वारा सुझाई गई रणनीति का एक और तत्व है।सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में 813 करोड़ लोग यानी जनसंख्या का 57 प्रतिशत हिस्सा शामिल है। पीडीएस आंकड़े के अद्यतन न होने और ‘कालाबाजारी' होने जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है। उद्योग मंडल ने शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास एवं जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता जैसे उच्च प्रभाव वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देने और निगरानी के लिए डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने का आह्वान किया जिससे बेहतर परिणाम तथा वित्तीय बचत हो सकती है। - नई दिल्ली। भारत के वस्त्र क्षेत्र ने 2025 में निवेश और निर्यात में भारी वृद्धि दर्ज की है, जिसे सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं और व्यापार में आसानी के लिए किए गए आर्थिक सुधारों से बल मिला। सरकार ने विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस 7 पीएम मेगा इंटीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपैरल (पीएम मित्र) पार्कों के निर्माण को मंजूरी दी है, जिनमें प्लग एंड प्ले सुविधा भी शामिल है। इन पार्कों के लिए 4,445 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया है। ये पार्क तमिलनाडु, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में बनेंगे।अब तक 27,434 करोड़ रुपए से अधिक के निवेश समझौते किए जा चुके हैं और 100 प्रतिशत जमीन भी पार्कों के लिए खरीद ली गई है। सभी राज्य सरकारों ने पार्कों के लिए 2,590.99 करोड़ रुपए की लागत से इंफ्रास्ट्रक्चर कार्य शुरू कर दिया है। सरकार ने राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन (एनटीटीएम) की शुरुआत की है, जिसमें 1,480 करोड़ रुपए का निवेश किया जाएगा। इस मिशन का उद्देश्य तकनीकी वस्त्र के उपयोग को बढ़ाना और इसे रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रमोट करना है।वित्त वर्ष 2024-25 में हस्तशिल्प सहित वस्त्र एवं परिधान निर्यात ने 5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और यह 37.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन को गया, जबकि बांग्लादेश, यूएई, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे नए देशों ने भी निर्यात में 20 प्रतिशत योगदान किया। सरकार ने वस्त्र क्षेत्र में जीएसटी की दर को 5 प्रतिशत कर दिया है, जो पहले 12 प्रतिशत थी। यह कदम निर्यात को बढ़ावा देने और कला कारीगरों की मदद करने के लिए उठाया गया है।इस क्षेत्र में वस्त्र व्यापार संवर्धन (टीटीपी) विभाग ने भी भारत की वैश्विक वस्त्र बाजार में उपस्थिति को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई है। 2024 में भारत वस्त्र और परिधान का छठा सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा, जिसमें इस क्षेत्र का भारत के कुल निर्यात में 8.63 प्रतिशत का महत्वपूर्ण योगदान रहा और वैश्विक व्यापार में इसकी हिस्सेदारी 4.1 प्रतिशत रही।भारत का कपास क्षेत्र कृषि अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है, जो 60 लाख किसानों और 400-500 लाख लोगों को रोजगार देता है। 2024-25 के सीजन में निगम ने 525 लाख क्विंटल कपास की खरीद की और 37,450 करोड़ रुपए किसानों को वितरित किए। सरकार ने हस्तशिल्प और हैंडलूम के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जिसमें 11,544 कारीगरों को मुद्रा योजना के तहत लोन दिया गया है। साथ ही, 2.35 लाख लोग सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़ चुके हैं।
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मुंबई. टाटा समूह की एयरलाइन कंपनी एयर इंडिया ने रोम (इटली) के लिए उड़ान सेवाओं को फिर से शुरू करने की घोषणा है। इंडिगो के भी दिल्ली से लंदन, हीथ्रो के लिए अपनी सेवाएं शुरू करने की योजना की घोषणा के साथ, हवाई यात्रियों को अगले वर्ष भारत और यूरोप के बीच बेहतर संपर्क मिलने की उम्मीद है। एयर इंडिया 2020 की शुरुआत तक दिल्ली से इटली की राजधानी के लिए उड़ानें संचालित करती थी। कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण इन्हें निलंबित करना पड़ा था। इंडिगो पहले से ही मुंबई और लंदन हीथ्रो के बीच रोजाना सीधी उड़ानें संचालित करती है और अब लंदन के लिए सप्ताह में 12 उड़ानों का परिचालन करेगी। एयर इंडिया ने घोषणा की कि 25 मार्च, 2026 से एयर इंडिया दिल्ली और रोम (लियोनार्डो दा विंची अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा - फियूमिसिनो) के बीच सप्ताह में चार बार उड़ानें संचालित करेगी। करीब छह वर्ष के बाद यह इटली की राजधानी में विमानन कंपनी की वापसी और उसके बढ़ते यूरोपीय नेटवर्क के और विस्तार का प्रतीक है। एयर इंडिया ने बताया कि रोम से आने-जाने वाली यह सेवा सोमवार, बुधवार, शुक्रवार और रविवार को एयर इंडिया के बोइंग 787-8 विमान द्वारा संचालित होगी। इसमें ‘बिजनेस क्लास' में 18 ‘फ्लैट बेड' और ‘इकॉनमी क्लास' में 238 सीट होंगी। एयर इंडिया के मुख्य वाणिज्यिक अधिकारी निपुण अग्रवाल ने कहा, ‘‘ भारत को दुनिया के और अधिक हिस्सों से जोड़ना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है। भारत और इटली संस्कृति, व्यापार एवं वाणिज्य में गहरी समानताएं साझा करते हैं जिससे एयर इंडिया का रोम में विस्तार करना स्वाभाविक नजर आता है। इस बीच, इंडिगो ने कहा कि वह दो फरवरी से दिल्ली और लंदन (हीथ्रो) के बीच सप्ताह में पांच नई सीधी उड़ानें शुरू करेगी। इन उड़ानों का परिचालन ‘वेट/डैम्प' लीज पर लिए गए बोइंग 787 विमानों द्वारा किया जाएगा। इंडिगो के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) पीटर एल्बर्स ने कहा, ‘‘ यह नई सेवा व्यापार, पर्यटन एवं परिवार एवं मित्रों से मिलने के लिए दोनों शहरों के बीच यात्रा की बढ़ती मांग को पूरा करने में सहायक होगी। इंडिगो अंतरराष्ट्रीय यात्रा को सुगम एवं अधिक सुलभ बनाने के साथ-साथ भारत तथा प्रमुख वैश्विक गंतव्यों के बीच संपर्क को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है।'' विमानन कंपनी ने बताया कि इस नए मार्ग की शुरुआत दिल्ली से अंतरराष्ट्रीय संपर्क के निरंतर विस्तार का प्रतीक है। इससे पहले हाल ही में देनपासर (बाली), क्राबी, हनोई, ग्वांगझू और मैनचेस्टर के लिए उड़ानें शुरू की गई थीं। इंडिगो ने पहले ही जनवरी, 2026 से एथेंस के लिए सीधी उड़ानें शुरू करने की घोषणा कर दी है।
- नयी दिल्ली. पर्याप्त घरेलू नकदी, मजबूत निवेशक विश्वास और सहायक वृहद आर्थिक कारकों से प्रेरित 2025 में रिकॉर्ड 1.76 लाख करोड़ रुपये जुटाकर रिकॉर्ड स्तर छूने वाले आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) बाजार की यह तेजी नए साल में भी जारी रहने की उम्मीद है। वर्ष 2025 की एक बड़ी उपलब्धि स्टार्टअप का सूचीबद्ध होना रहा। इस साल लेंसकार्ट, ग्रोव, मीशो और फिजिक्सवॉला समेत 18 स्टार्टअप सार्वजनिक हुए और संयुक्त रूप से 41,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए। वहीं, 2024 में स्टार्टअप ने 29,000 करोड़ रुपये जुटाए थे। साथ ही, बिक्री पेशकश (ओएफएस) धन जुटाने की गतिविधियों में प्रमुख बना रहा। इसकी 2025 में जुटाई गई कुल पूंजी में करीब 60 प्रतिशत हिस्सेदारी रही। बाजार प्रतिभागी 2026 में आईपीओ गतिविधियों को लेकर आशावादी बने हुए हैं।इक्विरस कैपिटल के प्रबंध निदेशक एवं निवेश बैंकिंग प्रमुख भावेश शाह ने कहा कि नए साल के लिए आईपीओ का परिदृश्य प्रोत्साहक बना हुआ है जिसे आगामी आईपीओ तथा मजबूत क्षेत्रीय विविधता का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने बताया कि 75 से अधिक कंपनियों को पहले ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की मंजूरी मिल चुकी है लेकिन उन्होंने अभी तक अपने निर्गम नहीं शुरू किए हैं जबकि अन्य 100 कंपनियां नियामक स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रही हैं। आगामी आईपीओ में प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, बुनियादी ढांचा, ऊर्जा एवं उपभोक्ता क्षेत्रों के निर्गम शामिल हैं जो व्यापक सहभागिता को दर्शाते हैं। इसमें रिलायंस जियो, एसबीआई म्यूचुअल फंड, ओयो और फोनपे जैसे प्रमुख निर्गमों के शामिल होने की भी संभावना है। ‘आईपीओ सेंट्रल' द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, 2025 में पेश किए गए 103 नए सार्वजनिक निर्गमों ने कुल 1.76 लाख करोड़ रुपये जुटाए। यह 2024 में 90 कंपनियों द्वारा जुटाए गए 1.6 लाख करोड़ रुपये और 2023 में 57 कंपनियों द्वारा जुटाए गए 49,436 करोड़ रुपये से अधिक है। जेएम फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशनल सिक्योरिटीज में प्रबंध निदेशक एवं इक्विटी कैपिटल मार्केट प्रमुख नेहा अग्रवाल ने कहा कि मजबूत घरेलू नकदी और टिकाऊ निवेशक विश्वास ने रिकॉर्ड राशि जुटाने में मदद की। इक्विरस कैपिटल के शाह ने कहा कि भारत की वृहद आर्थिक स्थिरता (जिसमें मजबूत जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि, नियंत्रित मुद्रास्फीति तथा पूर्वानुमेय नीतिगत वातावरण शामिल हैं) ने वैश्विक और घरेलू निवेशकों का विश्वास बढ़ाया। यह तेजी हालांकि पूरे वर्ष समान नहीं रही। बाजार की अस्थिरता, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की कमजोर भागीदारी और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच पहले सात महीनों में प्राथमिक बाजार की गतिविधि सुस्त बनी रही। अगस्त से परिस्थितियों में काफी हद तक सुधार आया क्योंकि वृहद आर्थिक चिंताएं कम हुईं, नकदी मजबूत हुई और शेयर बाजार स्थिर हुए जिससे कंपनियों के सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया तेज हुई। आनंद राठी एडवाइजर्स के निदेशक एवं ईसीएम निवेश बैंकिंग प्रमुख वी. प्रशांत राव ने कहा कि हालांकि आईपीओ की मात्रा बढ़ी लेकिन कोष जुटाने में झुकाव अधिकतर बिक्री पेशकश की ओर रहा। इस वर्ष सूचीबद्ध हुईं कंपनियों में से केवल 23 ने पूरी तरह से नए पूंजी के माध्यम से धन जुटाया, जिनका औसत निर्गम आकार लगभग 600 करोड़ रुपये रहा। इसके विपरीत, 15 कंपनियों ने केवल बिक्री पेशकश के माध्यम से धन जुटाया और 45,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए। बाकी कंपनियों ने दोनों का मिश्रण अपनाया जिसमें बिक्री पेशकश की हिस्सेदारी अधिक रही।
- नयी दिल्ली. वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच निवेश के सुरक्षित विकल्प और चुनिंदा उद्योगों में मांग बढ़ने से इस साल चांदी ने रिटर्न के मामले में परंपरागत निवेश विकल्प सोने और शेयर बाजार को भी पीछे छोड़ दिया है। स्थिति यह हो गई है कि सोने ने जहां करीब 70 प्रतिशत रिटर्न दिया है वहां चांदी 130 प्रतिशत से भी अधिक चढ़ी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत दर में आगे और कटौती की उम्मीदों के बीच चांदी में अगले साल भी 15 से 20 प्रतिशत तक की तेजी बने रहने की उम्मीद है। अखिल भारतीय सर्राफा संघ के अनुसार, दिल्ली में चांदी की कीमत सोमवार को 10,400 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़कर 2,14,500 रुपये प्रति किलोग्राम (सभी करों सहित) के अबतक के उच्चस्तर पर पहुंच गईं। चांदी की कीमत इस साल एक जनवरी को 90,500 रुपये प्रति किलोग्राम थी। इस तरह चांदी में 1,24,000 रुपये यानी 137 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। चांदी में आई तेजी के बारे में आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स लि. के निदेशक (जिंस और मुद्रा) नवीन माथुर ने कहा, ‘‘अंतरराष्ट्रीय हाजिर बाजार में चांदी ने अब तक लगभग 130 प्रतिशत से अधिक रिटर्न दिया है, जबकि इस वर्ष डॉलर के मुकाबले रुपये के पांच प्रतिशत से अधिक की गिरावट के साथ एमसीएक्स वायदा कीमतों में रिटर्न अब तक करीब 138 प्रतिशत तक पहुंच गया है।'' उन्होंने कहा, ‘‘इस उछाल का एक कारण यह है कि निवेशकों का एक हिस्सा सरकारी बॉन्ड एवं मुद्राओं के मुकाबले वैकल्पिक निवेश उत्पादों में निवेश कर रहा है, जिससे सफेद धातु में निवेश की मांग बढ़ी है। औद्योगिक मांग बढ़ने और बाजार में लगातार पांचवें साल आपूर्ति में कमी से भी चांदी के भाव में तेजी आई है।'' मेहता इक्विटीज लि. के उपाध्यक्ष (जिंस) राहुल कलंत्री ने कहा, ‘‘चांदी की कीमतों में उछाल सट्टेबाजी का नहीं बल्कि संरचनात्मक कारकों का नतीजा है। आपूर्ति में लगातार कमी के साथ औद्योगिक मांग बनी हुई है। कृत्रिम मेधा (एआई), ईवी तथा स्वच्छ ऊर्जा जैसे नए क्षेत्रों में बढ़ती मांग कीमत में वृद्धि का प्रमुख कारण है।'' उन्होंने कहा, ‘‘मजबूत औद्योगिक मांग के अलावा, ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड) में निरंतर निवेश, भौतिक रूप से खरीद अधिक होने और निवेशकों के जिंस में निवेश बढ़ाने से भी कीमतों को समर्थन मिला है। एक और संकेत सोने-चांदी की कीमतों के अनुपात में तीव्र गिरावट है, जो जोखिम लेने की बढ़ती प्रवृत्ति को बताती है।'' सोने और चांदी के अनुपात में तीव्र गिरावट का मतलब है कि चांदी की कीमत सोने की कीमतों से अधिक तेजी से बढ़ रही हैं। यह संकेत देता है कि सोने के मुकाबले चांदी के मूल्य में वृद्धि हो रही है और यह निवेश का बेहतर अवसर प्रदान करती है। अगर रिटर्न की बात की जाए तो इस साल सोना ने 19 दिसंबर तक लगभग 72 प्रतिशत का रिटर्न दिया है जबकि इक्विटी बाजार के मामले में निफ्टी 50 और निफ्टी 500 सूचकांक ने क्रमशः 7.0 प्रतिशत और 5.1 प्रतिशत का रिटर्न दिया। मांग और आपूर्ति से जुड़े सवाल के जवाब में माथुर ने चांदी उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले वैश्विक निकाय सिल्वर इंस्टिट्यूट के अनुमान का हवाला देते हुए कहा कि चांदी की आपूर्ति में लगातार पांचवें वर्ष लगभग 9.5 करोड़ औंस (एक औंस बराबर लगभग 31.1 ग्राम) की कमी है। आने वाले वर्षों में चांदी की कीमतों में और अधिक सकारात्मक वृद्धि का कारण यह कमी ही रहेगी। लेकिन औद्योगिक मांग भी 2025 में चांदी की ऊंची कीमतों का एक प्रमुख कारण रही और अगले वर्ष भी चांदी के बाजार को इससे मजबूत समर्थन मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आर्थिक गतिविधियों और महंगाई बनी रहने के साथ सौर उपकरणों एवं इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) जैसे उद्योगों में मांग बढ़ने की संभावना ने चांदी की चमक अगले साल भी बनी रह सकती है और यह सोने की तरह सुरक्षित निवेश विकल्प बनती दिख रही है। अगले साल चांदी की स्थिति के बारे में पूछे जाने पर कलंत्री ने कहा, ‘‘मजबूत औद्योगिक मांग, सीमित आपूर्ति और अनुकूल तकनीकी रुझानों के कारण चांदी का दीर्घकालिक दृष्टिकोण सकारात्मक बना हुआ है। हालांकि, 2026 के लिए 15 से 20 प्रतिशत वृद्धि का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।'' उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, निवेशकों को अस्थिरता और बीच-बीच में होने वाले सुधारों के लिए तैयार रहना चाहिए। किसी भी निवेश संबंधी निर्णय लेने से पहले एक अनुशासित, चरणबद्ध निवेश दृष्टिकोण और पेशेवर वित्तीय सलाह अत्यंत आवश्यक है।'' यह पूछे जाने पर कि वर्तमान में चांदी में निवेश कितना उपयुक्त है, माथुर ने कहा, ‘‘इस वर्ष चांदी में असाधारण रूप से उच्च रिटर्न देखने को मिला है, ऐसे में अगले वर्ष भी इसी तरह के रिटर्न की उम्मीद करना ठीक नहीं है।'' उन्होंने कहा, ‘‘कीमती धातुओं में निवेश 2026 में भी जारी रखना चाहिए लेकिन यह निवेश कीमतों में पांच से आठ प्रतिशत की गिरावट आने पर चरणबद्ध ढंग से ही करना चाहिए। कुल मिलाकर, 2026 की पहली छमाही में मौजूदा स्तरों से 20 से 25 प्रतिशत तक का अतिरिक्त रिटर्न मिलने की उम्मीद की जा सकती है।''
- नयी दिल्ली. सरकार ने कृत्रिम मेधा (एआई) की मदद से तैयार सामग्री के अनिवार्य चिह्वांकन से जुड़े प्रस्तावित नियमों पर उद्योग के साथ परामर्श प्रक्रिया पूरी कर ली है और इससे संबंधित नियम जल्द ही जारी किए जाएंगे। यह जानकारी सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सचिव एस. कृष्णन ने दी। कृष्णन ने कहा कि उद्योग ने इस मुद्दे पर ‘काफी जिम्मेदाराना' रुख अपनाया है और एआई-जनित सामग्री की पहचान (लेबलिंग) अनिवार्य करने से जुड़ी दलीलों को समझता है। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव को लेकर उद्योग की ओर से कोई गंभीर विरोध सामने नहीं आया है। उन्होंने कहा कि उद्योग ने इस पर स्पष्टता की मांग की है कि एआई से किए गए किस स्तर के बदलाव को ‘महत्वपूर्ण' या ‘सारभूत' संशोधन माना जाए और किन तकनीकी सुधारों को सामान्य गुणवत्ता बढ़ाने वाले बदलावों के रूप में देखा जाए। उन्होंने कहा, “हम इन सुझावों के आधार पर सरकार के भीतर अन्य मंत्रालयों से परामर्श कर रहे हैं कि किन बदलावों को स्वीकार किया जाए, कहां संशोधन किया जाए और किन बिंदुओं पर नियमों में सूक्ष्म बदलाव की जरूरत है। यह प्रक्रिया अभी चल रही है और मुझे लगता है कि नए नियम बहुत जल्द सामने आएंगे।” उद्योग की प्रतिक्रियाओं के बारे में पूछे जाने पर कृष्णन ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि वे इसके खिलाफ हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार न तो कंपनियों से किसी तरह का पंजीकरण कराने को कह रही है, न किसी तीसरे पक्ष की मंजूरी अनिवार्य कर रही है और न ही किसी प्रकार का प्रतिबंध लगा रही है। उन्होंने कहा, “उद्योग से केवल यही कहा जा रहा है कि एआई से तैयार सामग्री को चिह्नित किया जाए।कृष्णन ने कहा कि एआई के जरिये किया गया छोटा-सा बदलाव भी उसका अर्थ पूरी तरह बदल सकता है जबकि मोबाइल फोन कैमरे से होने वाले स्वचालित सुधार जैसे कुछ तकनीकी सुधार केवल गुणवत्ता बढ़ाते हैं और तथ्यों को नहीं बदलते। उन्होंने कहा कि सामग्री का सार नहीं बदलने वाले तकनीकी सुधारों को नियमों के दायरे में अनावश्यक रूप से न लाने की ‘वाजिब मांगों' को नियमों में समायोजित किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि सभी प्रकार के संशोधनों को छूट देना समस्या पैदा कर सकता है।सरकार ने अक्टूबर में सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में संशोधन का प्रस्ताव रखा था, जिसमें एआई-जनित सामग्री की स्पष्ट पहचान करने और फेसबुक एवं यूट्यूब जैसे बड़े डिजिटल मंचों की जवाबदेही बढ़ाने की बात कही गई थी। मंत्रालय ने कहा था कि डीपफेक ऑडियो, वीडियो और अन्य कृत्रिम सामग्री के तेजी से प्रसार ने गलत सूचना फैलाने, छवि खराब करने, चुनावों को प्रभावित करने और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे जोखिमों को उजागर किया है।
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नई दिल्ली। टेक कंपनी Google ने भारत में एंड्रॉयड स्मार्टफोन के लिए अपनी Emergency Location Service (ELS) को सक्रिय कर दिया है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जहां इस उन्नत कॉलर लोकेशन तकनीक को 112 इमरजेंसी सेवाओं के साथ पूरी तरह एकीकृत किया गया है।
कंपनी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अब एंड्रॉयड फोन से 112 पर कॉल या SMS करने पर कॉलर की सटीक लोकेशन अपने आप इमरजेंसी रिस्पॉन्डर्स तक पहुंच जाएगी।क्या है Emergency Location Service (ELS)?ELS एंड्रॉयड फोन में पहले से मौजूद एक इन-बिल्ट फीचर है, जो आपात स्थिति में कॉल करने पर कॉलर की सटीक लोकेशन साझा करता है। यह सेवाGPS,Wi-Fi, औरमोबाइल नेटवर्क सिग्नल का उपयोग कर कॉलर की लोकेशन को लगभग 50 मीटर की सटीकता के साथ पहचानती है।यह तकनीक उन हालात में बेहद मददगार साबित होती है, जब आपातकालीन कॉल जुड़ने के तुरंत बाद कट जाती है। ऐसी स्थिति में भी इमरजेंसी सेवाओं को कॉलर की लोकेशन मिल जाती है और मदद जल्दी पहुंचाई जा सकती है।प्राइवेसी और सुरक्षा पर खास जोरGoogle ने स्पष्ट किया है कि ELS सेवा को मजबूत प्राइवेसी सुरक्षा के साथ डिजाइन किया गया है।यह सेवा केवल इमरजेंसी कॉल या SMS के दौरान ही सक्रिय होती है,इसका उपयोग पूरी तरह मुफ्त है,इसके लिए किसी अतिरिक्त ऐप या हार्डवेयर की जरूरत नहीं होती।सबसे अहम बात यह है कि लोकेशन डेटा सीधे उपयोगकर्ता के फोन से इमरजेंसी सेवाओं को भेजा जाता है, और इसे Google द्वारा ना तो संग्रहित किया जाता है और ना ही स्टोर किया जाता है।यूपी में सफल पायलट के बाद हुआ पूर्ण रोलआउटउत्तर प्रदेश में इसे पूरी तरह लागू करने से पहले इस फीचर का कुछ महीनों तक पायलट परीक्षण किया गया, जिसके नतीजे बेहद सकारात्मक रहे।इस दौरान ELS ने 2 करोड़ से अधिक इमरजेंसी कॉल और SMS को सपोर्ट किया,कई मामलों में कॉल कुछ सेकंड में कट जाने के बावजूद कॉलर की लोकेशन सफलतापूर्वक पहचान ली गई।मशीन लर्निंग से मिलती है ज्यादा सटीक लोकेशनयह सिस्टम एंड्रॉयड के मशीन लर्निंग आधारित Fused Location Provider से संचालित होता है, जिससेघर के अंदर,बाहर, याचलते-फिरतेहर स्थिति में सटीक लोकेशन उपलब्ध हो पाती है।किन डिवाइस पर काम करेगी यह सेवा?ELS सेवाAndroid 6.0 और उससे ऊपर के वर्जन वाले सभी संगत एंड्रॉयड डिवाइस पर काम करती है।जैसे ही 112 पर कॉल की जाती है, कॉलर की लोकेशन UP112 कमांड सिस्टम पर तुरंत दिखाई देने लगती है।इसके साथ ही Pertsol द्वारा दी गई रूटिंग इंटेलिजेंस की मदद से यह तय किया जाता है कि पुलिस, मेडिकल या फायर सेवा में से किसे तुरंत भेजना है।इस तकनीक से इमरजेंसी सेवाओं की रिस्पॉन्स टाइम घटेगा और जान बचाने में अहम मदद मिलेगी। - मुंबई. समन्वित राजकोषीय, मौद्रिक और नियामक नीतियों ने अर्थव्यवस्था में मजबूती लाने में मदद की है। हालांकि, यह बाहरी क्षेत्र की चुनौतियों से पूरी तरह अप्रभावित नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक के सोमवार को जारी एक बुलेटिन में यह कहा गया। आरबीआई के दिसंबर बुलेटिन में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि वृहद आर्थिक बुनियाद और आर्थिक सुधारों पर निरंतर ध्यान देने से दक्षता और उत्पादकता में वृद्धि होगी, जिससे तेजी से बदलते वैश्विक परिवेश के बीच अर्थव्यवस्था को उच्च वृद्धि के रास्ते पर मजबूती से बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2025 में वैश्विक व्यापार नीतियों में काफी बदलाव आया है। शुल्क और व्यापार की शर्तों पर द्विपक्षीय स्तर पर पुनर्विचार की दिशा में कदम बढ़ाया गया। अर्थव्यवस्था की स्थिति पर लिखे गए लेख में कहा गया है कि इसका वैश्विक व्यापार प्रवाह और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर प्रभाव अभी भी सामने आ रहा है। इससे वैश्विक अनिश्चितताएं और वैश्विक वृद्धि की संभावनाओं को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। इसमें कहा गया, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी क्षेत्र की चुनौतियों से पूरी तरह अप्रभावित नहीं है। लेकिन समन्वित राजकोषीय, मौद्रिक और नियामक नीतियों ने मजबूती लाने में मदद की है।'' लेख में कहा गया है कि 2025-26 की दूसरी तिमाही में मजबूत घरेलू मांग के समर्थन से भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले छह तिमाहियों में सबसे तेज गति से वृद्धि हासिल की। नवंबर के महत्वपूर्ण आंकड़े (जीएसटी संग्रह, ई-वे बिल आदि) बताते हैं कि समग्र आर्थिक गतिविधियां तेज रही हैं और मांग की स्थिति मजबूत बनी हुई है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति में मामूली वृद्धि हुई, लेकिन यह न्यूनतम संतोषजनक स्तर (दो प्रतिशत) से नीचे बनी हुई है। इसके अलावा, लेख में कहा गया है कि वित्तीय स्थितियां अनुकूल बनी रहीं और वाणिज्यिक क्षेत्र में वित्तीय संसाधनों का प्रवाह मजबूत रहा। कम वस्तु व्यापार घाटा, मजबूत सेवा निर्यात और प्रेषण प्राप्तियों के समर्थन से 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत का चालू खाते का घाटा पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में कम रहा। लेख में कहा गया, ‘‘मजबूत घरेलू मांग के साथ आर्थिक वृद्धि मजबूत रही। मुद्रास्फीति में नरमी ने मौद्रिक नीति को आर्थिक वृद्धि का समर्थन करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश प्रदान की।'' लेख में यह भी कहा गया है कि अप्रैल-अक्टूबर 2025 के दौरान, सकल और शुद्ध दोनों ही मामलों में, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहा। अक्टूबर में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) अच्छा रहा। सिंगापुर, मॉरीशस और अमेरिका का कुल एफडीआई प्रवाह में 70 प्रतिशत से अधिक का योगदान रहा। हालांकि, मुख्य रूप से पूंजी को अपने देश भेजने और अन्य देशों में होने वाले प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) के कारण अक्टूबर में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफपीआई) नकारात्मक रहा। दूसरी ओर, 2025-26 के दौरान अब तक (18 दिसंबर तक), इक्विटी क्षेत्र में मुख्य रूप से पूंजी निकासी के कारण शुद्ध विदेशी निवेश (एफपीआई) में कमी दर्ज की गई। पिछले दो महीनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में वृद्धि के बाद दिसंबर में निवेश नकारात्मक हो गया।लेख में कहा गया, ‘‘भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और घरेलू बाजार के उच्च मूल्यांकन को लेकर निवेशकों की सतर्कता ने हाल के महीनों में भारत में शुद्ध एफपीआई प्रवाह को नरम बनाए रखा।'' इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने, विदेशी पोर्टफोलियो प्रवाह में कमी और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता के दबाव के कारण नवंबर में भारतीय रुपया (आईएनआर) अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ।



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